तेरी मां जिंदा है अभी – सरोज प्रजापति 

2 दिन हो गए थे शर्मा जी के पार्थिव शरीर को हॉस्पिटल में रखें।शर्मा जी व उनकी पत्नी  सरकारी नौकरी में अच्छे पद से रिटायर हुए थे। दोनों का एक ही बेटा था। जो पढ़ लिख ,शादी कर पत्नी के साथ अपना सपना पूरा करने अमेरिका जा बसा था। नौकरी रहते हुए शर्मा जी व उनकी पत्नी एक आध बार ही उसके पास जा सके और रिटायरमेंट के बाद बेटे ने उन्हें  बुलाने की कोई जल्दबाजी ना दिखाई।

वैसे भी शर्मा जी और उनकी पत्नी भी इस उम्र में अपना देश छोड़कर जाने के इच्छुक नहीं थे। कारण था बुढ़ापे में कम ही बुजुर्ग होंगे, जो अपनी जड़ों से कटना चाहें। दूसरा इतने सालों से अलग रहने के कारण बेटे बहू व पोते पोती को  उनसे कोई खास लगाव ना था। इतना उन्होंने एक दो बार वहां जाकर देख लिया था।

हां, जब भी उन्हें कोई जरूरत होती तो पैसों के लिए जरूर फोन कर देते ।चाहे बच्चों की पढ़ाई हो या खुद का बिजनेस! हमेशा उन्होंने अपने माता पिता को एटीएम कार्ड ही समझा था।

आखिर आज तीसरे दिन शर्मा जी का बेटा अपने परिवार सहित पहुंचा और आते ही उसने अपने फ़र्ज़ को पूरा करते हुए, अपने पिता की आत्मा को उनके पार्थिव शरीर से मुक्ति दिला दी। किसी की आंखों में एक आंसू ना था।

चौथे की क्रिया पूरी होते ही मिसेज शर्मा के लाख आग्रह करने के बाद भी उनकी बहू बच्चों सहित अमेरिका वापस लौट गई।

बेटे ने बच्चों की पढ़ाई के नुकसान का बहाना बनाया और बोला “मैं हूं ना, यहां पर तेरहवीं तक!”

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मिसेज शर्मा कुछ नहीं बोली। इस बीच उनका बेटा कई बार उन्हें तेरहवीं के बाद अमेरिका चलने के लिए कह चुका था । साथ ही यह भी कि आप हमारे साथ चले जाओगे तो इतने बड़े घर का क्या करना इसलिए यह प्रॉपर्टी बेच देते हैं। मैंने डीलर से बात कर ली है। मिसेज शर्मा सुनकर भी चुप रहती।

बेटे ने मां के मौन को लगभग उनकी स्वीकृति मान लिया था।



तेरहवीं के बाद बेटे ने साइन करने के लिए कागज आगे कर दिए।

मिसेज शर्मा ने उन पर सरसरी नजर डाली। फिर बेटे की ओर देखते हुए बोली “मैं यही रहूंगी।”

“लेकिन मां, आप यहां अकेले कैसे रहोगी! इस उम्र में आपको एक सहारे की जरूरत है। पापा भी नहीं अब! कौन आपकी देखभाल करेगा !आप हमारे साथ चलिए! अपने परिवार के पास!”

“बेटा इतने सालों से भी तो हम अकेले रहे ही रहे थे और मुझे तुम्हारी देखभाल व सहारे की जरूरत नहीं। वैसे भी अब मैं यहां नहीं रहूंगी!”

“यहां नहीं रहोगे तो फिर कहां रहोगे आप!”

“वृद्धाश्रम!”

“ओल्ड एज होम! दिमाग खराब हो गया है क्या आपका! मेरे होते हुए आप वहां क्यों रहोगे! आपका घर है! परिवार है फिर! लोग क्या कहेंगे! बेटे ने बाप के मरते ही मां को ओल्ड एज होम भेज दिया!”

“बेटा, आज तक तुमने लोगों के कहने की परवाह की है तो फिर आज क्यों!

वृद्ध आश्रम ही अब मेरा परिवार है! शायद तुम्हें नहीं पता, मैं और तेरे पापा अक्सर वहां जाते रहते थे! तेरे पापा बीमारी के बाद भी जो इतने सालों तक जीते रहे। वह उस वृद्ध आश्रम में मिली खुशियों की ही देन है।

तू मेरी फिक्र मत कर। अपना घर परिवार संभाल। हां कभी तुझे किसी चीज की जरूरत हो तो बेहिचक बता देना। तेरी मां जिंदा है अभी!

लेकिन इस घर को बेचने की बात भूल जा ! यह कभी बिकेगा नहीं ! हां गुलजार रहेगा। मेरे बूढ़े मित्रों की हंसी से! उनकी पथराई आंखों में फिर से चमक बिखेरने का यह माध्यम बनेगा। यही तेरे पापा का सपना था।”

अपने बेटे को अनेक प्रश्नों के साथ छोड़ मिसेज शर्मा ने वृद्ध आश्रम के लिए फोन मिला दिया।

 #सहारा 

स्वरचित

सरोज प्रजापति 

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