बबिता जी आज बहुत उदास थीं। किसी काम में मन नहीं लग रहा था। जबसे अपने भाई के बीमार होने की खबर सुनी थी मन बहुत बेचैन था। तभी फोन की घंटी बजी। बबिता जी ने भागकर फोन उठाया।
” ह… हैलो… भाभी , वहां सब कैसे हैं।भईया की तबीयत अब कैसी है ।,,
” बबिता दीदी, आपके भईया को राघव अस्पताल लेकर गया है । शायद भर्ती करना पड़ेगा।,, बोलते हुए भाभी की आवाज़ भर्रा रही थी।
“हो सके तो आप आ जाईए। आपके भईया आपसे मिलना चाहते हैं।,,
” भाभी सब ठीक है ना। मेरा दिल बैठा जा रहा है। ,,
” पता नहीं दीदी भगवान क्या चाहता है। आपके भईया कह रहे थे एक बार मेरी छुटकी को बुला दो। शायद आपसे कुछ कहना चाहते हैं।,,
” जितनी जल्दी हो सके मैं आ रही हूं भाभी। आप चिंता मत करिए। आप अपना और भईया का ध्यान रखना। ,, कहकर बबिता जी ने फोन रखा और अपने बेटे यश को फोन किया।
” बेटा जितनी जल्दी हो सके मेरा हैदराबाद का टिकट बनवा दे। तेरे मामा जी की तबीयत ठीक नहीं है। मुझे उनके पास जाना है ।,,
” ठीक है मां, मैं कोशिश करता हूं आज रात की हीं टिकट बनवाने की। आप फ़िक्र मत करो सब ठीक हो जाएगा।,,
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ट्रेन में बैठी बबिता जी सोंच रही थीं ।कितना मन था इस रक्षाबंधन पर भईया के पास जाने का लेकिन पता नहीं था इस तरह इतनी हड़बड़ाहट में जाना पड़ेगा ।
खिड़की से बाहर झांकते हुए वो अपने अतीत के सागर में गोते लगाने लगीं ।
किस तरह छोटी छोटी बातों पर वो सारे घर को सर पर उठा लेती थी । रक्षाबंधन पर जिद्द करके जबतक भईया से अपना मनपसंद उपहार नहीं ले लेती थी तब तक उनकी कलाई पर राखी नहीं बांधती थी । भईया भी खुशी खुशी उसकी हर फरमाइश पूरी करते थे। मां कहती भी ” तूने इसे सर पर चढ़ा रखा है ।कल को पराए घर जाएगी तो कौन इसकी ज़िद्द पूरी करेगा।,,
इसपर भईया हंसते हुए कहते।” मेरी छुटकी की शादी ऐसे घर में करूंगा जहां इसे किसी चीज की कमी नहीं होगी ।,,
इस बात पर बबिता नाराज होते हुए कहती, ” मुझे नहीं जाना पराए घर। मैं तो इसी घर में रहूंगी । इस घर पर मेरा भी तो हक है ।,,
इन सब बातों को याद करते हुए कब उनकी आंखें बरस पड़ी उन्हें पता ही नहीं चला । साथ की सीट पर बैठे एक युवक ने पूछा , आंटी आप ठीक हैं ना ?,,
” हां बेटा , कुछ नहीं बस यूं हीं कुछ याद आ गया ।,,
आज मायके की दहलीज पर कदम रखते हुए उनका हृदय कांप रहा था ।
“अरे बुआ जी, आप आ गईं? मां और राघव अस्पताल गए हैं ।,, भतीजे राघव की पत्नी रिया ने कहा ।
” तो मैं भी अस्पताल हीं चली जाती हूं ।,,
” बुआ जी आप थक गई होंगी । थोड़ा फ्रेश हो जाईये फिर मैं आपको ले चलूंगी ।,,
“नहीं रिया मुझसे नहीं रूका जाएगा । मुझे अभी हीं भईया के पास जाना है ।,, बबिता जी ने अधीर होते हुए कहा ।
रिया उन्हें अस्पताल ले आई । भईया को देखते हीं वो उनसे लिपट गईं ,” भईया क्या हो गया आपको । ,,
“अरे तूं आ गई छुटकी । ,,
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” हां भईया , आपने बुलाया था तो कैसे नहीं आती ।,,
” लगता है मेरा समय पूरा हो गया है ।,,
” नहीं भईया ऐसा मत कहो , अभी तो अपनी छुटकी से राखी बंधवानी है और मेरा उपहार भी तो देना है। ।,
” हां बहन तेरा अंतिम उपहार देने के लिए हीं तुझे बुलाया है ।,,
” ये क्या बोल रहे हो भईया ? ऐसा मत बोलो ।,,
” छुटकी हमारे इस घर पर तेरा भी हक है । आज वही हक तुझे दे रहा हूं । उन्होंने भाभी की तरफ इशारा किया तो भाभी ने आधी प्रापर्टी के कागज उनकी तरफ बढ़ा दिए ।
” ये ले मैंने आधा घर तेरे नाम कर दिया है ।,,
बबिता जी फफक कर रो पड़ी ,” नहीं भईया ऐसा करके मुझसे मेरा मायका मत छीनो । मुझे ये सम्पत्ती नहीं मेरे भईया चाहिए । आप वादा किजिए की आप जल्दी से ठीक होकर घर आएंगे । इस रक्षाबंधन पर मुझे आपका स्नेह भरा हाथ अपने सर पर चाहिए । आप देंगे ना…?,,
“तूं सच में पगली है री । आज फिर जिद्द कर रही है ।,,
” हां भईया कर रही हूं जिद्द… और आपको पूरी भी करनी होगी ।,,
इतनी बातें करते करते भईया की आंखें मूंद रही थीं । शायद दवाईयों का असर हो रहा था । डाक्टर ने सभी को बाहर जाने के लिए कहा।दो दिनों के बाद सच में भईया की हालत में सुधार आने लगा और वो घर वापस आ गए । सभी बहुत खुश थे। इस रक्षाबंधन भी एक भाई ने अपनी बहन की जिद्द पूरी कर हीं दी।
#बहन
लेखिका : सविता गोयल
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