स्वाभिमानी हूं अभिमानी नहीं – अर्चना खंडेलवाल 

“ये जो तेरा एटीट्यूड है ना!! ये तुझे एक दिन परेशानी में डाल देगा, इस तरह का व्यवहार हर किसी के गले नहीं उतरता है, कुछ दुनियादारी भी होती है, कुछ लाज -शर्म भी होती है, कभी-कभी मन का नहीं हो, हमारी इच्छा ना हो फिर भी हमें वो करना होता है”। अब तेरी शादी की उम्र हो गई है,

अब तो तू बदल जा, वरना ससुराल वालों के साथ तेरा निबाह मुश्किल होगा, हेमा जी ने कॉलेज जा रही बेटी दक्षिता को समझाया। मम्मी,”आप ससुराल वालों का डर बताकर मुझे मत डराया करो, मैं उनके साथ भी निबाह कर लूंगी, सच बोलना, निडरता से जीना, अपने हिसाब अपने सपनो के साथ जीना, गलत है क्या?

“दक्षिता इतना अभिमान ठीक नहीं है, बेटी जब बहू बन जाती है तो अभिमान चूर-चूर हो जाता है”। मम्मी,” आप भी मुझे नहीं समझती हो, मैं स्वाभिमानी हूं अभिमानी नहीं। ” मैं तुझे समझती हूं, पर जब लोग कहते हैं तो डर जाती हूं, सब पूछते हैं कि दक्षिता शादी कब कर रही है? दक्षिता क्या कॉलेज में पढ़ाती ही रहेगी? “माना परिवार अपना होता है, हमें परिवार के लिए भी जीना होता है पर अपनी जिंदगी भी तो होती है,

मम्मी आप मेरी चिंता मत किया करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा”। “कुछ समय बाद दक्षिता की शादी हो गई, दक्षिता सौरभ को पाकर खुश थी, सौरभ भी दक्षिता के बिंदास व्यवहार का कायल हो गया पर साथ रहते-रहते सौरभ को अब दक्षिता का व्यवहार अखरने लगा। “तुम्हें क्या जरूरत थी मिश्रा अंकल से ये कहने की कि गलती उनके बेटे की है, बहू की नहीं, तुम नहीं बोलती तो भी उन्हें पता तो था, कोई अपने बेटे के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकता है”।

“मुझे पता है तो मैंने बोल दिया, क्या सच बोलना गुनाह है, मिश्रा अंकल की बहू बिंदू भाभी को मैंने भी देखा है, वो हर समय परिवार के लिए लगी रहती है, हर वक्त वो सहमी डरी रहती है, उनका बेटा उन्हेंं पूछता ही नहीं है, हर वक्त बस भाभी में ही गलती निकालता रहता है, मैंने ही बिंदू भाभी को समझाया है कि इस तरह जीना भी कोई जीना है, पता है वो भैया बिंदू भाभी पर हाथ भी उठाते हैं, मिश्रा अंकल को सब पता है, फिर भी वो बेटे के ही पक्ष में है”।

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दूसरे दिन सौरभ चिल्लाता हुआ आया ,” बिंदू भाभी ने भैया को तलाक के पेपर भेजे हैं!!! वो ऐसे कैसे कर सकती है?? कहीं तुमने तो नहीं भड़काया है? सौरभ के शक की सुई दक्षिता की तरफ घुम गई। ” मैंने भड़काया नहीं है मैंने उन्हें सही राह दिखाई है, औरत है तो क्या हर अत्याचार को सहेगी? चौबीस घंटे परिवार के लिए जीने वाली औरतों को मिलता क्या है? अपमान और तिरस्कार !!!! अपने मन का कर नहीं सकती है!! अपने सपनों और करियर का बलिदान दे देती है, अपने लिए कहां जीती है औरतें?

आपको पता है बिंदू भाभी स्कूल में पढ़ाती थी, पर ससुराल वालों के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी। बच्चों को पढ़ाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना ही उनके जीवन का उद्देश्य था पर शादी के बाद उनके सपने चकनाचूर हो गये ,वो खुद आत्मनिर्भर नहीं रही। दक्षिता ने चिंता जताकर कहा। तभी सौरभ की मम्मी आ गई,” दक्षिता तुमने ये क्या लगा रखा है? मिश्रा भाईसाहब से हमारे बरसों पुराने रिश्ते हैं और तुम उनका ही घर बिगाड़ रही हो!!

मैंने बिंदू से तुम्हारी दोस्ती करवाई थी ताकि हमारे बच्चे भी आपस में ये व्यवहार कायम रख सकें। तुमने तो मिश्रा जी के घर पर तलाक के पेपर भिजवा दिये!! क्या जरूरत है तुम्हें दूसरों के मामले में टांग अड़ाने की?? अपनी घर गृहस्थी संभालों और सबको चैन से जीने दो’। ” मम्मी जी,” मिश्रा अंकल और बिंदू भाभी कोई दूसरे नहीं है,

वो हमारे अपने हैं, हमें उनके दुःख में शामिल होना चाहिए, बिंदू भाभी कितनी परेशान हैं, उन्होंने मुझे बताया है, मैंने उन्हें कई बार समझाया कि आप भैया को सुधारों पर भैया समझने को तैयार ही नहीं है वो उन्हें अपने पैरों की जूती से ज्यादा कुछ नहीं समझते हैं। ऐसी तिरस्कार की जिंदगी एक औरत कैसे जी सकती है?




वो हमारे पारिवारिक मित्र हैं तो हमें उनकी मदद करनी चाहिए। “सौरभ अपनी पत्नी को समझा और सौरभ की मम्मी कमरे से निकल गई। “दक्षिता ये जो तुम्हारा नेचर है उसे बदलो, ये हमारे घर में झगड़े करवा रहा है, तुम समझती क्यों नहीं हो? समाज को सुधारने का तुमने ठेका ले रखा है क्या? ये तो गनीमत है हमने तुम्हें नौकरी करने की इजाजत दे रखी है,

वरना हम भी तुम्हें मना कर देते तो फिर तुम क्या करती? सौरभ,”बिंदू भाभी के जरिए मुझे आज आप लोगों की मानसिकता भी बहुत जल्दी पता लग गई, तुमने नौकरी की इजाजत देकर मुझ पर कोई अहसान नहीं किया है? मैं आत्मनिर्भर हूं और स्वाभिमान से जीती हूं, तुम शादी ना करते तो मैं कुंवारी नहीं रह जाती!!!

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खूबसूरत पढ़ी-लिखी , पैरों पर खड़ी हूं , कोई ना कोई तो मुझसे शादी जरूर करता, समाज को सुधारने का ठेका किसी ना किसी को तो लेना पड़ता है, हमारे समाज में औरतों की जो दशा है उसे किसी को तो ठीक करना होगा, उसके लिए आगे आना होगा। मेरा मन इन सब बुराईयों को देख नहीं पाता है, अपने सामने हो रहे अन्याय को मैं नजरअंदाज नहीं कर सकती हूं”।

“सौरभ तुम तो पढ़े-लिखे हो, तुम्हारी सोच भी इतनी घटिया हो सकती है? मैं बिंदू भाभी का साथ दूंगी और उन्हें न्याय दिलाकर रहूंगी”। दक्षिता ने दृढ़तापूर्वक कहा। सौरभ का मिजाज गर्म हो गया,” तुम्हें उसके लिए घर छोड़ना होगा, यहां ये सब सुधारकों वाले काम नहीं चलेंगे!! बड़ी अभिमानी हो तुम, मम्मी समझाकर गई, मैं समझा रहा हूं, फिर भी तुम्हें अपने मन की ही करनी है।”




“दक्षिता मन कड़क करके बोली,” सौरभ मैं स्वाभिमानी हूं अभिमानी नहीं!! दोनों में फर्क होता है, मैंने कोई मौज-मस्ती के शौक नहीं पाले हैं, मैं बस इतना ही चाहती हूं कि हर औरत स्वाभिमान से जीयें उसके लिए उसे समझौते नहीं करने पड़ें। हर बार औरत समझौता कर लेती है और उसी ज़िन्दगी को अपना भाग्य समझकर जी लेती है।

स्वाभिमान से जीने में और समझौते के जीवन में फर्क होता है। मै तुम्हे और मम्मी जी को नहीं समझा सकी, ना ही आप लोग मुझे समझ सकें। मैं सुबह होते ही चली जाऊंगी, मैं भी अपने स्वाभिमान को मारके नहीं जी सकती हूं। दक्षिता ने अच्छा सा वकील किया और बिंदू भाभी के लिए केस लड़ा, अत्याचार, अन्याय, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का केस चला। लंबी सुनवाई के बाद बिंदू भाभी को तलाक मिला और मुआवजा भी।

मायके में रह रही दक्षिता को लेने के लिए एक दिन सौरभ आया,” नहीं सौरभ मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूंगी, उस दिन तुमने जो कहा माना वो गुस्से में कहा पर गुस्से में सब सच बोलते हैं, आज तो बिंदू भाभी का मामला था, कल को और किसी को भी कोई दिक्कत हो सकती है, किसी भी औरत के स्वाभिमान की बात हो सकती है,

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वो कोई पड़ोसन, रिश्तेदार, सब्जी वाली या काम वाली बाई भी हो सकती है मैं तो हर औरत के साथ हूं। फिर मैं उन औरतों का साथ दूंगी,तुम मुझे उनका साथ देने के लिए कितनी बार घर से निकालोगे?

मैं स्वाभिमान के बिना नहीं जी सकती हूं, मैं खुद कमाती हूं, मैंने कॉलेज के पास में ही एक घर ले लिया है अब वहीं पर अकेले रहूंगी और समाज की सेवा करती रहूंगी, औरतों का साथ दूंगी, उनकी समस्याओं का निराकरण करूंगी ताकि हर औरत स्वाभिमान से अपना जीवन जी सकें। सौरभ मुंह लटकाकर चला गया। पाठकों,”

आपको मेरा ब्लॉग कैसा लगा हम लड़कियों को आत्मनिर्भर तो बना देते हैं पर मैंने कितनी ही औरतों को देखा है जो आत्मनिर्भर होने के बाद भी अपने स्वाभिमान से समझौता करके जीवन निकाल देती है, मुझे भी लगता है कि हम औरतों कै अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।

धन्यवाद

# स्वाभिमान

अर्चना खंडेलवाल ✍️

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