स्वाभिमानी बालिका – कांता नेगी 

सुजाता एक नन्ही बालिका थी,जिसकी उम्र मात्र दस साल थी।उसके पिता काम के सिलसिले मे अपने मित्र के साथ दूसरे गांव गए तो थे पर अभी तक वापस नही आए थे।

मां पास के जंगल से घास काटकर लाती और उसे बेचकर जो पैसे मिलते उसी से गुजर -बसर हो रही थी।

सुजाता के घर के पास ही इब्राहिम चाचा रहते थे।वे गांव के बच्चों को पढ़ाया करते थे। सुजाता भी उनके पास रोज पढ़ने जाती थी। इब्राहीम चाचा का फ्लो और फूलों का बगीचा था।वे बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ खाने के लिए फल भी देते थे।

एक दिन जब सुजाता पढ़कर आई तो देखा मां नीचे चटाई पर बेसुध सोई हुई थी।जब सुजाता ने उसे उठाना चाहा तो उसे मां का शरीर गरम लगा।वह झटपट बर्तन मे पानी और कपड़ा लेकर आई और उसके सिर पर पट्टी रखने लगी ।

जब दो दिनों तक वह पढ़ने नहीं गई तो इब्राहिम चाचा उसकी खोज खबर लेने उसके घर गए। सुजाता की मां की खराब हालत देखकर उन्होंने अपने शिष्य कालू को गांव के वैद्य सोहन लाल को बुलाने भेजा।

सोहनलाल ने इब्राहिम चाचा से कहा -इन्हें तपेदिक हो गया है?

दवा के साथ साथ फल भी खाने को देने होंगे,यह सुनकर सुजाता उदास हो गई। इब्राहिम चाचा ने उसे कहा -बेटी चिंता मत करों?

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मै रोज फल भेज दूंगा,पर सुजाता एक स्वाभिमानी बालिका थी,उसने कहा -चाचा यदि तुम मुझे अपने घर की साफ सफाई  करने और पेड़ पौधों को पानी देने दोगे, तभी मै फल लूंगी।

इब्राहिम चाचा एक नन्ही बालिका का स्वाभिमान देख दंग रहकर सोचने लगे -दूसरे बच्चे तो फल चुराकर  अपने घर ले जाते हैं पर इस बच्ची का स्वाभिमान देख उन्होंने उसकी बात मान ली ।

अब रोज सुजाता इब्राहिम चाचा के घर की सफाई करने जाती और वे उसे फल के साथ साथ दो रोटियां और गुड़ दे देते।धीरे धीरे सुजाता की मां ठीक हो गई और अब दोनो मां बेटी इब्राहिम चाचा के यहां खाना बनाने के साथ साथ सारे काम कर देती।

स्वरचित

कांता नेगी 

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