‘ स्वाभिमान है, अभिमान नहीं ‘ – विभा गुप्ता

” विपिन, एक जगह बैठ नहीं सकते,तो चले जाओ यहाँ से।तूने तो मेरे नये कुरते का सत्यानाश कर डाला।” नितिन बाबू अपने छोटे भाई पर चिल्लाये जो अपनी बैसाखी के सहारे चलकर पानी पीने आया था,हाथ से गिलास छूट गया और पानी के कुछ छींटें उनके नये कुरते पर पड़ गये।फिर उन्होंने विपिन की पत्नी को आवाज़ दी, ” वंदिता! क्या करती रहती हो दिनभर? अपाहिज पति नहीं संभलता तो…।” झुंझलाते हुए वे अपने कमरे में चले गये। विपिन का मायूस चेहरा देखकर वंदिता का हृदय रो उठा।विपिन को लेकर कमरे में आ गई और सिसकने लगी।

          तीन बरस पहले जब वह विपिन की पत्नी बनकर इस घर में आई थी तो सभी वंदू-वंदू कहकर उसके आगे-पीछे घूमते थें।तब विपिन एक फौजी था।महीने-दो महीने तो वह घर से बाहर ही रहता था लेकिन जब आता था तो माँ-बाबूजी के साथ भइया-भाभी के लिये भी ढ़ेर सारे उपहार लाता था।और बंटी उसका भतीजा…उसकी तो फ़रमाइशों की लिस्ट कभी खत्म ही नहीं होती थी।विपिन उसकी हर इच्छा खुशी-खुशी पूरी करता था।वंदिता बहुत खुश थी कि इतना प्यार करने वाला परिवार उसे मिला है।

        एक बार विपिन जब छुट्टियाँ बिताने घर आया था तो देश में हमला होने के अंदेशा के कारण उसे दो दिन बाद ही ड्यूटी पर बुला लिया गया।भारी मन से सबने उसे विदा किया।उसकी जहाँ ड्यूटी थी,वहाँ भीषण गोलीबारी हो रही थी।उसने बड़ी बहादुरी से दुश्मनों का सामना किया,कइयों को मार गिराया,लेकिन न जाने कहाँ से दुश्मन की एक गोली उसके दाहिने पैर में आकर घुस गई,वह बहादुर सिपाही था,अपने घायल पैर की परवाह न करते हुए वह दुश्मनों के सामने डटाङ रहा।युद्ध समाप्त होने पर जब उसे अस्पताल लाया गया तो देर हो चुकी थी।गोली का जहर उसके पैर में फैल चुका था और अंततः उसके दाहिने पैर को काटना पड़ा।फौज से वह घर वापस आ गया।उसकी बहादुरी और देशसेवा के लिए उसे ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।तब सभी बहुत खुश थें।

           एक महीना बीतते-बीतते विपिन की भाभी का व्यवहार उसके प्रति बदलने लगा।गाहे-बेगाहे वह विपिन पर तो अपने तीखे शब्दों के विषबाण छोड़ती ही थीं,वंदिता के भी हर काम में नुक्स निकालने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देती थी।घर में पुत्र का अपमान वृद्ध पिता से सहन नहीं हुआ और एक दिन रात में ऐसे सोये कि फिर कभी नहीं उठे।

            ससुर का लिहाज़ अब रहा नहीं, सास ने कभी ज़बान खोली नहीं थी,इसलिए विपिन की भाभी बेलगाम होती चलीं गई।यद्यपि विपिन को सरकार की तरफ़ से हर महीना खर्चा मिलता था,फिर भी न जाने क्यों उसकी भाभी का व्यवहार उसके साथ ऐसा होता जैसे कि वह कोई एहसान कर रही हों।कभी-कभी तो किशोर बंटी भी अपने दोस्तों के सामने अपने चाचा की हँसी उड़ाने से बाज नहीं आता था।और आज तो बड़े भाई ने भी गुस्से में ऐसी बात कह दी जो कोई दुश्मनों को भी नहीं कहता।

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         वंदिता रोते-रोते यही सोच रही थी कि रोज-रोज एक फौजी को अपाहिज कहा जाता है, उसके स्वाभिमान को कितनी ठेस पहुँचती होगी।भाभी-बंटी तो सारी सीमाएँ लाँघ ही चुके थें, आज भईया ने भी…।अब तो वह यहाँ हर्गिज़ नहीं रहेगी।उसने तुरंत अपने आँसू पोंछे और बैग में दोनों के कपड़े रखने लगी।विपिन को कुछ समझ नहीं आया, पूछा तो उसने पूरे विश्वास से कहा, ” हम आज और अभी इस घर को छोड़ कर जा रहें हैं।अब मैं किसी को भी अपने आत्मसम्मान और तुम्हारे स्वाभिमान को चोट पहुँचाने नहीं दूँगी।”

         ” लेकिन जाएँगें कहाँ और माँ का क्या? कैसे रहेगी हमारे बिन?” विपिन ने चिंतित होते हुए पूछा तो वंदिता बोली, ” इतने बड़े शहर में दो प्राणियों के लिए एक छत तो मिल ही जाएगी और माँजी जैसे पहले रह रहीं थीं, अब भी रह लेंगी।” पत्नी के आत्मविश्वास को देखकर विपिन का भी सोया स्वाभिमान जाग उठा।दोनों जब माँ से आशीर्वाद लेने गये तो उन्होंने भीगे नैनों से उन्हें आशीर्वाद दिया।

        दोनों सीधे मयंक के घर गये जो पेशे से डाॅक्टर था और विपिन का मित्र भी।मयंक की पत्नी भी स्त्री-रोग विशेषज्ञ थी,उसका अपना नर्सिंग होम भी था।वंदिता उसी के नर्सिंग होम में अपनी सेवा देने लगी।कुछ दिनों बाद ही दोनों एक किराये के घर में शिफ़्ट हो गये।विपिन के पास ज्ञान का भंडार था, उसने उन बच्चों को घर में कोचिंग देना शुरु कर दिया जो देश की सेवा तो करना चाहते हैं लेकिन उसकी तैयारी करने में असमर्थ हैं।बस.. विपिन ने उन्हें तैयार करना ही अपना लक्ष्य बना लिया।उसके जज़्बे को देखकर आर्मी के एक इंस्टीट्यूट ने उसे नियुक्त कर लिया।नौकरी से जो भी समय मिलता,उनमें वह गरीब और असहाय बच्चों को पढ़ाता।

        वंदिता दिन में काम तलाशती, शाम को घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती और रात में नर्सिंग होम के मरीजों की सेवा करती।तीन महीनों के अथक प्रयास के बाद उसे एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी मिल गई।अब वह सुबह स्कूल जाती,शाम को ट्यूशन पढ़ाती और शनिवार-रविवार को मरीजों की सेवा करती।



         अब जब उनके जीवन रुपी गाड़ी पटरी पर चलने लगी तो उन्होंने अपना परिवार बढ़ाने का सोचा।ईश्वर की कृपा हुई और एक बच्ची उसकी गोद में खेलने लगी।शुरु-शुरु में तो सबकुछ मैनेज करने में उसे परेशानी हुई लेकिन एक-दूसरे का हाथ बँटाने से सब आसान हो गया।

विपिन अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने में इतना डूब गया कि पिछली सभी घटनाएँ उसके ज़हन से विस्मृत हो गईं।

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          दोनों की बेटी अंशिका का पहला जन्मदिन था।वंदिता ने शाम को एक छोटी-सी पार्टी रखी थी, वह उसी की तैयारी कर रही थी कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी।दरवाज़े पर अपनी जेठानी और बंटी को देखकर वह ठिठक गई।शिष्टाचारवश उसने दोनों को अंदर बुलाया,तब बंटी उसका पैर पकड़कर रोने लगा।बोला, “चाची, मुझे माफ़ कर दीजिये।मैंने चाचा को बहुत अपमानित किया लेकिन आज उन्हीं की वजह से मैंने कॉलेज़ में अस्सी प्रतिशत अंक प्राप्त किये हैं।”

     ” उन्हीं की वजह से..।क्या मतलब? ” वंदिता ने आश्चर्य से पूछा तो जेठानी हाथ जोड़ते हुए बोली, ” हाँ वंदू, मुझे माफ़ कर दो,मैंने तुमदोनों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया है।बंटी पढ़ाई में पिछड़ रहा था,तब तुम्हारे भइया(विपिन के बड़े भाई) ने विपिन से बंटी को पढ़ाने को कहा।विपिन ने बंटी को पढ़ाने में अपनी जान लगा दी थी।” कहते हुए उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।वंदिता को खुशी हुई कि विपिन ने अपने स्वाभिमान के साथ अपने संस्कार का भी निर्वाह किया जो उसके व्यक्तित्व पर सोने पे सुहागा था।विपिन भी अपनी माँ को लेकर आ गया।फिर से पूरा परिवार एक साथ।

         शाम की पार्टी समाप्त होने के बाद विपिन की माँ और भाभी ने उन दोनों से घर वापस चलने को कहा।वंदिता जानती थी कि रिश्तों में एक बार दरार पड़ जाये तो वो फिर कभी नहीं भरते और फिर थोड़ी दूरी रहे तो रिश्तों में प्यार भी बरकरार रहता है।उसके मनोभाव को विपिन भाँप गया,बोला, ” माँ, ऐसे ही ठीक है।तुम्हारे पास रहा तो मैं फिर से बेकार हो जाऊँगा।” कहकर वह हँसने लगा जिसमें छिपे दर्द को सभी ने महसूस किया।

                            — विभा गुप्ता 

     # स्वाभिमान 

         अपने स्वाभिमान में अभिमान कभी नहीं लाना चाहिये।विपिन और वंदिता ने अपने स्वाभिमान को जीवित रखा, दोनों ने अपनी मेहनत से एक मुकाम भी हासिल किया लेकिन अभिमान को अपना ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया।दोनों ने अपने परिवार की गलतियों को क्षमा कर उन्हें गले से लगा लिया।

 

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