सुनिये सबकी करिये मन की – संगीता त्रिपाठी : Moral Stories in Hindi

चित्रा के घर किट्टी पार्टी थी। फरवरी का महीना था, वैलेंटाइन वीक चल रहा था तो किट्टी की थीम भी वही थी। रोज डे पर सबको लाल ड्रेस पहनना था। सब लोग सज धज कर आ गये सिर्फ काव्या अभी तक नहीं आई। उसका इंतजार करते हुये सब गपशप कर रहे थे तभी गुस्से से लाल होती हुई काव्या ने प्रवेश किया। लाल गाउन में काव्या बहुत सुन्दर लग रही थी।

“वाओ काव्या आज तुम कहर ढा रही हो, लगता है मयंक आज तुझे आने नहीं दे रहे होंगे “माधुरी ने कहा, काव्या फट पड़ी “मयंक को अपने माँ -बाप से फुर्सत मिले तब मुझे देखेंगे, शादी तो माँ -बाप के लिये ही की है। उनकी देखभाल के लिये मुफ्त की नौकरानी मिल गई, घर के सारे काम मैं करूं फिर भी सबको शिकायत रहती है।माना सासु माँ बीमार है पर छोटे -मोटे काम में मदद तो करा सकती है।”

 “तू सही कह रही है काव्या, ये सासें अपने बेटे को पता नहीं क्या घुट्टी पिलाती हैं ये पति बन ही नहीं पाते, हमारे ये तो पूरे मम्माज़ बॉय हैं, देखो पहले मेरे माँ -बाप हैं फिर मैं हूँ “तूलिका ने अपने पति की नकल उतारते हुये कहा, सब जोर से हँस पड़े..। माधुरी बोली -तुमने ठीक किया काव्या, ज्यादा दबोगी तो सब तुम्हें दबाते रहेंगे।

“पर आज तो मैं भी सुना आई हूँ, उनकी तबियत खराब है तो क्या मैं जीना छोड़ दूँ। वो तो रोज ही बीमार रहती हैं।”गुस्से से काव्या ने कहा।
“तूने एकदम ठीक किया “सबने उसके गुस्से को जायज ठहरा दिया। चित्रा खामोश थी।

थोड़ी देर बाद सब किट्टी के गेम और तम्बोला में मस्त हो गये। खाना खा सब अपने घर चले गये। काव्या रुक गई “मेरा घर जाने का मन ही नहीं कर रहा, सुबह मयंक से जोरदार झगड़ा हुआ, वो बिना खाये ऑफिस चले गये।”उदास स्वर में काव्या बोली।

“तू रुक मैं बढ़िया सी चाय बनाती हूँ तेरी थकावट दूर हो जायेगी, फिर घर जाना “।चित्रा ने कहा। झट रसोई में जा अदरक -कालीमिर्च डाल बढ़िया सी चाय बना लाई।

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“देख काव्या, जब तू गुस्सा होकर घर से आई थी, सबने तेरे गुस्से में आग में घी डालने का काम किया था। तू गुस्सा हो कर घर से आई तो बस सास पुराण चालू हो गया।तू भूल रही है जब पिछले साल तू पैर की हड्डी टूटने से दो महीने बिस्तर पर थी। तब तुम्हारी इन्हीं सासु माँ ने तुम्हे ही नहीं पूरे घर को संभाला। अगर इधर वो बीमार चल रहीं तो इसमें उनका क्या दोष, और ये तूलिका जो तुझे भड़का रही थी,

उसके घर जा कर देख -अपने सास -ससुर की बहुत सेवा करती है पर दूसरों को भड़काती है। कुछ लोगों की आदत होती है।स्वयं अपने रिश्तों के प्रति सजग रहते हैं,पर दूसरे को गलत राय देते हैं। क्योंकि इन्हे तमाशा देखने में मजा आता है। तू खुद समझदार है अपने घर की समस्या घर में ही सुलझा तभी रिश्ते बने रहेंगे।दूसरों से अपनी समस्या बोलेगी तो वे तुम्हारी मदद करना दूर,तुम्हें अलग भड़काएंगे और सासु माँ को अलग।तुम्हारे घर के तमाशे में ज्यादा रूचि लेंगे।फिर तेरा भी एक बेटा है। जो वो देखेगा वही वो भी सीखेगा, लोगों का क्या वे तो कुछ भी बोलते हैं”।

 “तू सही कह रही चित्रा, सुबह मन बहुत खराब हो गया था। सासु माँ की खांसी रात ज्यादा बढ़ गई थी सुबह मयंक ने मुझे बोला -माँ पर थोड़ा ध्यान दो, उनको समय पर खाना दिया करो, मुझे लगा माँ ने शिकायत की होगी बस मैं बिफर उठी। क्योंकि कल दिन में तूलिका आ गई थी तो मै माँ को समय पर खाना नहीं खिला पाई थी, मयंक ने ठीक ही कहा था, मुझे अपने काम को प्राथमिकता देनी चाहिये थी। क्या होता जो मैं तूलिका को बैठा कर माँ की दो रोटी सेंक कर दे दी होती। पर मैंने गप्पें मारते हुये इस पर सोचा ही नहीं।तू सही कह रही, अपने घर की समस्या घर में ही सुलझा लेनी चाहिये। चल अब मैं चलती हूँ।

काव्या चित्रा के घर से हल्के मन से निकली, सुबह का गुस्सा चित्रा की बातों से दूर हो गया था। रास्ते में देखा तूलिका अपने पड़ोसी को हँस कर काव्या का गुस्सा बता रही थी।”भला ये कोई बात होती है, अगर पति ने माँ का ध्यान रखने को कह दिया तो क्या बुरा कर दिया, ये आजकल फैशन बन गया है अपने “मैं “को ऊपर रखने का…।काव्या को देख तूलिका ने तुरंत बात बदल दी, अभी तक चित्रा के घर ही थी तू, ठीक किया तेरी सास और पति को अकल आ जायेगी।”उनका तो पता नहीं तूलिका पर मुझे अक्ल आ गई है “कह काव्या अपने घर की तरफ मुड़ गई।

काव्या तो संभल गई क्योंकि उसके पास चित्रा जैसी अच्छी दोस्त थी पर कई कान के कच्चे अपने घर को बर्बाद कर देते हैं। “सुनिए सबकी पर करिये मन की “।आपको मेरा ब्लॉग कैसा लगा, जरूर बतायें।

 

—संगीता त्रिपाठी

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