हाँ शांति….. मैं बोल रहा हूँ जयभगवान , घर में सब ठीक है ना? बापूजी कैसे हैं …..
हाँ जी…. सब ठीक है यहाँ…. आप कैसे हैं ? अब तो बस एक महीने की बात रह गई ……कब से इंतज़ार कर रहे हैं हम सब ….आख़िर रिटायरमेंट के दिन आ ही गए । बापू जी एकदम सही है… … आज सुबह कृष्णपाल का फ़ोन आया था…. थोड़ा बुख़ार पता रहा था…. फ़ोन कर लेना ।
चलो , कर लूँगा बात …. चाय वगैरहा पी ली ?
अच्छा….. फ़ोन रखना पड़ेगा…. बापूजी के पास कोई आया है… … देखूँ ज़रा ….. चाय- पानी दे दूँ …. बाद में बताना ।
इतना कहकर शांति जी अपने ससुर की बैठक में गई और पास में बैठे पड़ोसी गुप्ता चाचाजी को देखकर बोली –
चरण स्पर्श चाचाजी , बापूजी तो कल से ही आपके बारे में पूछ रहे थे । चाचीजी कैसी है? आज तो आप कई दिनों बाद आए हैं।
हाँ बेटा ….. कुछ हल्का बुख़ार हो गया था पर अब ठीक है । बिटिया, अपने हाथ की अदरक- तुलसी की चाय तो पिला दो … घर में कहकर आया हूँ कि शांति बहू के हाथ की चाय पीने जा रहा हूँ ।
हाँ- हाँ चाचाजी , अभी आप दोनों के लिए चाय बनाती हूँ ।
शांति ने दोनों मित्रों के लिए चाय बनाई और रसोई में सहायता करने वाली चंपा से कहा—
चंपा , ले तू भी चाय पी ले …. तब तक तेरे अंकल से बात कर लेती हूँ…. पता नहीं…. कुछ कह रहे थे ।वो बाहर से चाचाजी के आने की आवाज़ आई तो बीच में ही छोड़कर चली गई थी और सुन …… चाय पीकर बैठक से कप भी उठा लाना ।
आप बेफ़िक्र रहें , मैं जाने से पहले पूरा काम करके जाऊँगी.. आँटी । आटा मलकर रखना है या …..
हाँ… रोज़ का काम तो करना ही है…. बस प्याज़ थोड़ा ज़्यादा काट देना …. आज शनिवार है ना …. छोटा भइया भी आएगा तो दाल के साथ कुछ ओर बना दूँगी…..
इतना कहकर शांति जी ने पति को फ़ोन मिला दिया—-
हाँ जी…. क्या कह रहे थे….. वे तो गुप्ता चाचाजी थे …. हाँ बापूजी के पास ही बैठे हैं…. अच्छा…. आप क्या बता रहे थे?
शांति, मैं ये कह रहा था कि जया से बात कर ली मैंने …. तीस तारीख़ को मेरा रिटायरमेंट है तो तुम 15 तक आ जाओ …. ये जो गृहस्थी पिछले 30 सालों से यूँ ही बिखरी पड़ी है… इसे समेटना तो तुम्हें ही पड़ेगा…… आशु को कह देता हूँ कि वो तुम्हारा रिज़र्वेशन करवा देगा …. जया ने कहा है कि वह आराम से बापूजी की देखरेख कर लेंगी ….. फिर चंपा तो है ही….
ठीक है जी ….. बापूजी जी से…..
मैं खुद बात करके बता दूँगा….. तुम आने की तैयारी करो …. आज तो वासु भी आएगा ? चलो ठीक है….. बस यही बताना था ।
पति का फ़ोन रखने के बाद शांति जी की नज़र छोटे बेटे वासु के मैसेज पर पड़ी , उसने लिखा था ——
माँ, आज घर आने में देर हो जाएगी । मेरी हास्पिटल ड्यूटी चेंज हो गई तो ग्यारह- बारह के क़रीब पहुँचूँगा ।
बापूजी को खाना – दवाई देकर अपने कमरे में जा बैठी । पढ़ने के लिए एक किताब निकाली पर मन कहीं दूर चला गया ।
क़रीब तीस साल पहले इस घर की बड़ी बहू बनकर आई थी । पूरी नज़दीकी रिश्तेदारी में वही पहली बहू थी । छोटे दो देवर और दो ननदे , सारा दिन भाभी-भाभी करके उनके पीछे लगे रहते थे । उसका रिश्ता तय होने से मात्र दो महीने पहले ही पति जयभगवान का एक कृषि विश्वविद्यालय में लेक्चरर पद पर चयन हुआ था । विवाह की पहली ही रात , उसने पति के सामने इच्छा जताई कि वह भी नौकरी करना चाहती है, बी०एड० थी । विवाह के बाद दोनों ने नए शहर में अपनी गृहस्थी शुरू कर दी । संयोग से एक महीने के अंदर ही सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया और शांति जी का भी चयन हो गया ।
दोनों मिलकर नई गृहस्थी के लिए कभी एक जैसे रसोई का सामान रखने के डिब्बे खरीदते तो कभी नया पंखा ….. कभी नई मेज़ तो कभी अलमारी । शादी में मिला सामान ससुराल में ही छोड़ दिया था ।
गर्मी की छुट्टियों में घर जाती तो देवर- ननदों के लिए ढेर सारे उपहार लेकर जाती । ज़िंदगी सपनों की सी गुजर रही थी । विवाह के दो साल बाद उसकी गोदी में नन्हीं सी श्वेता आ गई। सरकारी नौकरी थी इसलिए छुट्टी की तो कोई परेशानी नहीं थी , आराम से छह महीने सास के साथ गुज़ार कर लौटी …. बेटी की देखभाल के लिए एक आया रख ली थी ।
एक दिन रात के दो बजे फ़ोन की घंटी बजी जिसे सुनने से पहले ही दिल से आवाज़ आ गई कि ये सपनों की ज़िंदगी बिखरने वाली है । सचमुच बापूजी ने बताया कि थोड़ी देर पहले माँ जी को ज़बरदस्त दिल का दौरा पड़ा है……
सुनिए, टैक्सी बुलाइए …. मैं सामान बाँधती हूँ….
पर बापूजी ने कहा है कि माँ जी हॉस्पिटल में हैं …. सुबह तक देख लेते हैं…. क्या पता …. जाने की ज़रूरत ना पड़े और मौसी तो वहीं हैं ।
नहीं जी … हमें अभी निकलना है । मौसी अपनी जगह है पर माँजी के बिना कृष्ण, कुशल , जया और कविता….. किस हाल में होंगे ….. नहीं- नहीं….. जल्दी टैक्सी बुला लो … मैं कपड़े रखती हूँ ।
बस आनन-फ़ानन में जो हाथ में आया … कपड़े डाले और घर के लिए निकल पड़े । पूरा रास्ता किस बेचैनी में काटा …. जिस पर पड़ती है, वहीं जान सकता है । मोबाइल का ज़माना तो था नहीं…. शुक्र था कि यूनिवर्सिटी की तरफ़ से लैंडलाइन की सुविधा मिली थी । आठ – नौ घंटे के सफ़र के बाद घर पहुँचे तो घर के सामने लगी भीड़ देखकर शांति जी समझ गई कि उसकी सास केवल अंतिम यात्रा पर जाने से पूर्व, उसका इंतज़ार कर रही है । गाड़ी के रूकते ही उसने पीछे की सीट पर बैठे-बैठे ही पति के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा——
सुनिए जी , हमारी परीक्षा की घड़ी है और हम बड़े हैं …..
इतने में ही बुआ ने उसकी गोद से बेटी ले ली —-
आ गई बहू …. सास को विदा करने …. सुनकर ही पैर लड़खड़ा उठे थे पर उसने मन पर क़ाबू रखते हुए दोनों देवरों और ननदों को बाँहों में भर लिया , जिन्हें शायद अहसास भी नहीं था कि उनके जीवन की कौन सी अमूल्य निधि खो गई है ।
बापूजी के पास जाकर उसके आँसुओं का बाँध टूट गया और वह दहाड़ मारकर रो पड़ी । बापूजी इस हालत में नहीं थे कि उनसे कुछ पूछा जाए….. जिसकी जीवनसंगिनी चार छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी छोड़, बीच रास्ते में ही धोखा दे गई हो , उसे चारों ओर अंधेरे के सिवा क्या दिख सकता है ?
धीरे-धीरे अंतिम क्रियाओं का समापन हो गया और सभी नाते- रिश्तेदार दिलासा देकर , ईश्वर की मर्ज़ी स्वीकार करने की नसीहत देकर लौट गए पर शांति जी और जयभगवान को समझ नहीं आ रहा था कि अपने बिखरे हुए घर को कैसे समेटे?
जाने वाले के साथ तो ज़ाया नहीं जाता इसलिए शांति जी ने पति को नौकरी पर जाने के लिए कहा और अपनी बच्ची की देखभाल के नाम पर अवैतनिक छुट्टी के लिए आवेदन कर दिया।
वहाँ पहुँचने पर पति ने कैसे नई गृहस्थी के बसने से पहले ही बिखरने के दर्द को झेला होगा ….. शांति जी ने आज तक पति से पूछने की हिम्मत नहीं की ।
शांति जी ने बापूजी की बेटी बनकर और देवर- ननदों की माँ बनकर इस उजड़े घर को बचा लिया । एक साल की छुट्टी के बाद , उसे भी स्कूल की ओर से ज्वाइन करने का पत्र मिला पर …… शांति असमंजस की स्थिति में थी । एक हफ़्ते की छुट्टी लेकर जयभगवान जी भी इस उम्मीद में आए थे कि बापूजी स्वयं ही शांति जी को ले जाने की बात कहेंगे, भला लगी- लगाई सरकारी नौकरी कौन छोड़ता है?
शांति जी पति के दिए तर्क सुनती और पूरी रात आँखों में गुज़ार देती । उसका दिल वे सब बातें मानने के लिए हरगिज़ तैयार नहीं था. जो पति अक्सर समझा रहे थे ।
अंत में , जाने के दो दिन पहले शांति जी ने बापूजी और पूरे परिवार के सामने कहा —-
बापूजी, मैंने त्यागपत्र लिख दिया है और मैंने यह निर्णय अपनी ख़ुशी से लिया है । इच्छाएँ तो अनंत है पर ईश्वर ने दो रोटी का अच्छा इंतज़ाम कर रखा है । मेरे लिए मेरा घर मेरी पहली प्राथमिकता है ।
हालाँकि उस समय उनके पति को उनका यह फ़ैसला बुरा लगा था ——
शांति….. तुमने भावनाओं में बहकर जल्दबाज़ी में फ़ैसला कर लिया पर एक दिन पछताओगी….. कुछ सालों बाद सब अपने-अपने घर के हो जाएँगे, कोई नहीं सोचेगा ……
नहीं जी …. आपने ग़लत सोचा , मैं अपने मन की संतुष्टि के लिए यह फ़ैसला ले रही हूँ ।
बस उस दिन के बाद शांति जी का जीवन इसी घर में सिमटकर रह गया । उसकी गोद में भी श्वेता के बाद आशु और फिर वासु आ गया । दोनों देवर और ननदें पढ़- लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो गए । धीरे-धीरे चारों का विवाह हो गया और सब चले गए । यहाँ तक कि बेटी श्वेता एम० बी० ए० के पश्चात विवाह करके विदेश चली गई और बड़ा बेटा आशु और बहू श्रेया भी मुंबई में जा बसे । छोटा बेटा वासु पास के ही शहर के मेडिकल कॉलेज में इंटर्नशिप कर रहा था और हर हफ़्ते घर आ जाता था ।
दोनों देवरानियों और दोनों ननदोइयों ने हमेशा शांति जी को पूरा मान- सम्मान दिया । पाँचों भाई- बहनों के बच्चों में सगे भाई- बहनों सा प्यार था ।
आज शांति जी को पूरा सुकून था । उन्हें याद नहीं कि कभी उनके दिल में ख़याल मात्र भी अपनी नौकरी छोड़ने का मलाल तक आया हो ।
तभी वासु का फ़ोन आया और वे अपने विचारों से बाहर आई—-मम्मी! दरवाज़ा खोल दो , बस दो मिनट में पहुँच रहा हूँ ।
और जब तक वे गेट खोलकर बाहर पहुँची , वासु आ गया ।
जयभगवान जी ने बेटे से कहकर पत्नी का टिकट बुक करवा दिया और बापूजी से दो हफ़्ते पहले शांति जी को बुलाने की आज्ञा ले ली । निश्चित समय पर जया भी तीन हफ़्ते की छुट्टी लेकर मायके आ गई ।
सालों बाद कृषि विश्वविद्यालय के उस सरकारी क्वार्टर में कदम रखते ही शांति जी की आँखें भर आई , जहाँ उसने कितने अरमानों से नई गृहस्थी बसाई थी और एक रात हड़बड़ाहट में, जो जैसा पड़ा था, छोड़कर चली गई थी ।
सचमुच ईश्वर की लीला कोई नहीं समझ सकता । मनुष्य की भावी योजनाएँ कितनी बेमानी हो जाती हैं ।
देखते ही देखते रिटायरमेंट का दिन आ गया । जब वह पति के साथ विश्वविद्यालय के द्वारा आयोजित विदाई समारोह में पहुँची तो पूरे परिवार को वहाँ उपस्थित देखकर हतप्रभ रह गई——
अरे….. तुम सब ….. ये कैसा सरप्राइज़? बताया तक नहीं…. श्वेता….. तू भी…. विदेश से आ गई?
अच्छा….. बड़े पापा का रिटायरमेंट… और हमारे बिना … ऐसा तो हो नहीं सकता —- सारे बच्चे एक साथ चिल्लाए ।
भाभी …. इतने बड़े दिन पर ….. हम भला वहाँ कैसे रह सकते थे ? केवल जया बापूजी के पास है …. ज़िद तो बापूजी भी कर रहे थे पर हमने बड़ी मुश्किल से समझाया । जया की तरफ़ से यह फूलों का गुलदस्ता आप दोनों के लिए ———जया के पति ने कहा ।
विदाई समारोह के बाद भोजन का प्रबंध भी था और उसके बाद सभी घर के लिए छोटी बस से रवाना हो गए , जिसमें परिवार के सभी सदस्य आए थे । सामान का ट्रक सुबह तड़के ही रवाना हो गया था ।
रात के एक बजे के क़रीब पूरा परिवार घर पहुँचा । आज बापूजी जाग रहे थे । बापूजी ने बेटी जया और पोत्र-बहू श्रेया की मदद से बेटे और बहू का आरती उतारकर स्वागत किया । खाना तो सभी ने रास्ते में खा लिया था ।
अगले दिन रिटायरमेंट के उपलक्ष्य में रिश्तेदारों और मित्रों आदि के लिए डिनर का आयोजन किया गया था ।खाने से पहले सभी जयभगवान जी की उपलब्धियों और योगदान पर अपने-अपने विचार प्रकट कर रहे थे । तभी मंच पर बापूजी के बैठने के लिए कुर्सी रखी गई क्योंकि वे खड़े होकर बोलने में असमर्थ थे —-
हमारे परिवार के लिए ख़ुशी और गर्व की घड़ी है कि मेरे बड़े बेटे ने अपनी नौकरी पूरी ईमानदारी के साथ पूरी कर ली । आज बेटे से अधिक, मुझे अपनी बहू पर ग़ुरूर है, जिसने निःस्वार्थ भाव से एक पत्नी , बहू , भाभी और माँ की ज़िम्मेदारी निभाई है । जिस दिन मेरी पत्नी रामदेई की मृत्यु हुई, मैं भँवर में अकेला खड़ा था पर मेरी इस बेटी ने …..
भाभी…. आप हमारा ग़ुरूर हो । जिस तरह आपने पूरे परिवार को जोड़कर रखा …. हमें अच्छी परवरिश दी , आत्मविश्वास और आत्मसम्मान से जीना सिखाया…. उसे शब्दों में बाँध नहीं सकते ।
अपने रूँधे गले से बापूजी ने फिर से कहा —
शांति बेटी , तू इस परिवार का ग़ुरूर है । देख …. ये भरा-पूरा परिवार तेरी ही तपस्या का फल है ।
शांति जी , उनके पति और पूरे परिवार के चेहरे पर सुकून भरी ख़ुशी साफ़ झलक रही थी ।
# ग़ुरूर
करुणा मलिक
Beautiful story
Absolutely