सुबह का उजाला – बालेश्वर गुप्ता : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi :  तुम जानते तो हो राजेश, पिता के बीमार रहने के कारण मां बिल्कुल अकेली पड़ गयी है।भाई कोई है नही केवल मैं ही तो हूँ।उनके विषय में मैं नही सोचूंगी तो कौन सोचेगा?

     बहुत अधिक भावुक मत बनो सुमि,मेरी बात समझ तो लो,बिना सुने ओवर रियेक्ट क्यूँ कर रही हो।वो तुम्हारे माता पिता है तो मेरे भी तो माता पिता समान है।

          परमानंद जी और दयावती  की इकलौती संतान थी सुमि। जैसी आम सोच होती है कि वंश चलाने को लड़का आवश्यक है, बुढ़ापे में तो बेटा ही काम आयेगा, इस सोच से परमानंद जी भी अछूते नही थे।उनकी भी हार्दिक अभिलाषा थी कि कम से कम एक बेटा तो अवश्य पैदा हो जाये।खूब मन्नत भी मांगी,डॉक्टर्स के चक्कर भी लगाये, पर दयावती की गोद दुबारा भर ना सकी।एक गहन अभिलाषा दफन हो कर रह गयी।परमानंद जी एवं दयावती ने इसे भगवान की इच्छा मान कर सुमि पर ही संतोष कर लिया।

        दोनों ने ही सुमि की खूब अच्छे से परवरिश की।उच्च शिक्षा भी दिलायी और उसको खूब प्यार भी दिया।दयावती तो कभी कभी परमानंद जी से कहती भी देखो जी हमारी सुमि किसी बेटे से कम है क्या?

    परमानंद जी को अचानक ही रात्रि में पेट मे तेज दर्द उठा।सोचा गैस दर्द होगा,सो ईनो ली कोई फर्क नही पड़ा, पुदीन हरा लिया,नाभी पर हींग रखा, पर दर्द ज्यो का त्यों रहा।इसी उधेड़बुन में रात्रि के 10 बज गये।दर्द बढ़ता जा रहा था।परमानंद जी डॉक्टर के पास जाना चाहते थे,पर इस स्थिति में अकेले कैसे जाये ये समस्या थी,किसी परिचित से रात्रि में कहने में संकोच हो रहा था।सुमि को भी आज देरी से आना था,वैसे भी सुमि क्या करेगी,सोच सोचकर परमानंद जी  की आंखों से  दर्द से बेचैन और बेबसी में आंसू छलक पड़े।

तभी सुमि आ गयी,मां से पिता के दर्द के बारे में पता चला तो उसने पिता की हालत देख तुरंत ओला टैक्सी बुलाई और पिता को नजदीक के लेकिन अच्छे हॉस्पिटल के इमेरजेंसी वार्ड में एडमिट करा दिया,जहां तुरंत उनका उपचार प्रारम्भ हो गया।वही परमानंद जी को नींद आ गयी।प्रातः 4 बजे उन्हें सोनोग्राफी के लिये ले जाया गया,जहां पता चला कि उनके गाल ब्लाडर में पथरीया थी,जिनके कारण दर्द था।डॉक्टर ने ऑपरेशन द्वारा गाल ब्लाडर को निकाल देने की सलाह दी।सुमि पूरी रात अपने

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पिता की देखभाल में साये की तरह लगी रही। अगले दिन सुमि अपने पिता को दूसरे विशेषज्ञ डॉक्टर के पास दूसरी सलाह वास्ते दिखाने ले गयी,उस डॉक्टर की सलाह भी ऑपरेशन की ही थी।सुमि ने तुरंत निर्णय लेकर अपने पिता के ऑपरेशन के लिये दो दिन बाद का समय ले लिया।

          निर्धारित तिथि पर परमानंद जी का ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो गया।तीन दिन बाद पिता घर आ गये।पर उन्हें अभी 10-15 दिन के आराम की जरूरत थी।सुमि ने पिता को आश्वस्त कर दिया कि वे किसी बात की चिंता न करे,कारोबार की थोड़ी बहुत देखभाल मैं कर लूँगी।

      परमानंद जी आश्चर्य पूर्वक सुमि को देखे जा रहे थे।उन्हें महसूस हो रहा था कि कौन कहता है उनके बेटा नही है।देखते देखते सुमि इतनी मैच्योर हो गयी है,उन्हें पता भी नही चला। अब परमानंद जी का आत्मविश्वास सुमि के कारण काफी बढ़ गया था।

          स्वस्थ होकर परमानंद जी अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आये। उन्होंने अपनी बेटी सुमि का आत्मविश्वासी रूप देख लिया था।अब उन्हें सुमि के लिये सुयोग्य वर का चयन करना था।बेटी कब तक घर में बैठी रहेगी।सुमि की सहमति से ही उन्होंने राजेश से सुमि का रिश्ता तय कर दिया।शुभ मुहर्त में दोनो का विवाह भी कर दिया।

       परमानंद जी बिना सुमि के अंदर तक टूट से गये थे,अकेलापन खाये जाता था,पर बेटी को रोका थोड़े जाता है।उनकी पत्नी दयावती उन्हें समझाती कि अब बिना सुमि के रहने की आदत डाल लो।मायूश से परमानंद जी फीकी हंसी हंस कर रह जाते।ऑपरेशन के बाद परमानंद जी का अपनी बेटी सुमि के साथ गहरा भावनात्मक लगाव हो गया था। सुमि की शादी को हुए एक वर्ष ही बीता था कि परमानंद जी ने बिस्तर पकड़ लिया।अब वे अपने काम काज से भी विरत हो गये थे। उनको संभालने वाला कोई नही था।

        सुमि को पता चला तो उसने अपने पति से अपने माता पिता को अपने साथ लाने का आग्रह किया। तभी राजेश ने सुमि से कहा बिना पूरी बात सुने ओवर रियेक्ट मत करो।राजेश का कहना था कि सुमि तुम्हारे माता पिता यदि यही हमारे पास रहेंगे तो उनमें धीरे धीरे हीनभावना घर कर जायेगी, मुझे अपने साथ रखने में आपत्ति नही है,पर अच्छा होगा यदि उनके लिये हम बिल्कुल पास में एक घर ले ले।इससे उन्हें तुहारा सानिध्य भी मिलता रहेगा और उनका आत्मसम्मान भी बना रहेगा।वैसे सुमि तुम जो भी निर्णय करोगी वह मुझे मान्य होगा।

        सुमि को राजेश की बात में दम लगा,उसने समझ लिया कि पास में ही घर दिलाकर उनकी सेवा करके वह जहां पुत्री धर्म का निर्वहन करेगी वही उसके माता पिता के आत्मसम्मान की भी रक्षा कर सकेगी।

       एक बेटी अपने माता पिता को वृद्धावस्था में सम्मान के साथ जीवन देने के लिये उन्हें लिवाने अगले दिन ही सुबह चल दी।

बालेश्वर गुप्ता,पुणे

मौलिक एवं अप्रकाशित

#मैं सिर्फ आपकी पत्नी ही नही किसी की बेटी भी हूँ

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