सॉरी- भैय्या – बालेश्वर गुप्ता : Moral Stories in Hindi

          पहली बार मेरे बचपन के घनिष्ठ मित्र प्रियांशु के भाई का फोन आया।स्वाभाविक रूप से आश्चर्य हुआ।मैंने पूछा आकाश सब ठीक है ना।मैं पहली बार तुम्हारा फोन सुन रहा हूँ।

      आकाश बोला  नही भाईसाहब कुछ ठीक नही है।मुझे लगा कि भाइयो का जमीन जायदाद के बंटवारे का  झंझट होगा।फिर भी मैंने कहा कि क्या हुआ आकाश?उसने कहा कि बड़े भाईसाहब इस दुनिया मे नही रहे।

     मैं तो एकदम अवाक रह गया।अभी परसो ही तो प्रियांशु से फोन वार्ता हुई थी।वह बार बार मिलने का आग्रह कर रहा था।मैं उस समय बेटे के पास कोलकाता में था,वहां से देहरादून एकदम आना सम्भव नही था,सो मैंने कहा था प्रियांशु मेरा भी तुझसे मिलने का बहुत मन है,मैं जल्द ही देहरादून का प्रोग्राम बनाता हूँ।पूरे एक सप्ताह साथ रहेंगे।

यह सुन प्रियांशु बहुत खुश हुआ था।पर अचानक वह छोड़कर चला गया।आकाश से ही पता चला कि उन्हें हार्ट अटैक आया और हम उन्हें हॉस्पिटल ले गये, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।मैं अधिक सुन नही सका।मैंने तुरंत दो जोड़ी कपड़े सूटकेस में रखे और फ्लाइट से दिल्ली और वहां से ट्रैन से देहरादून पहुंच गया।प्रियांशु से तीसरे नंबर का भाई राजीव को भी चेन्नई से आना था,

और कुछ नजदीक के रिश्तेदार आने शेष थे,लेकिन रास्ते मे थे,इसलिये अंतिम संस्कार अगले दिन करने की योजना परिवारवालों ने बनाई थी।अगले दिन प्रियांशु का अंतिम संस्कार सम्पन्न हो गया।मुझे तो ऐसा लग रहा था,मानो मेरे शरीर का कोई अंग कट गया हो।

      प्रियांशु सहित वे चार भाई थे।प्रियांशु और मैं बचपन से ही सहपाठी तो रहे ही,साथ ही बहुत घनिष्ठ मित्र भी रहे।प्रियांशु के पिता एक बड़े कारोबारी रहे थे और उनकी काफी संपत्ति देहरादून में थी,आबादी की बढ़ोतरी के बाद तथा उत्तराखंड अलग प्रदेश घोषित हो जाने तथा देहरादून के राजधानी बन जाने के कारण उनकी संपत्ति का मूल्य  कई गुना बढ़ गया था।

इससे चारो भाइयो का भी संपत्ति के प्रति मोह बढ़ गया था।प्रियांशु के पिता गलती कर गये अपनी मृत्यु से पूर्व वे अपनी संपत्ति का बंटवारा नही कर गये थे।इससे जब कभी चारो भाई परस्पर मिलते तो उनका संपत्ति बटवारे पर बात होती,पर कोई फैसला नही हो पा रहा था।प्रियांशु और राजीव दोनो जॉब करते थे सो वे देहरादून में नही रहते थे,शेष दो भाई आकाश व अनिल देहरादून में ही रहकर अपने पिता का व्यवसाय संभाल रहे थे।

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       आरिष्टि कार्यक्रम 11 दिन बाद का रखा गया था,मैंने आकाश से कहा भाई अब मैं कोलकाता जाकर फिर वापस आरिष्टि में शामिल होने आऊं,उससे अच्छा है मैं यहां देहरादून और सहारनपुर के पुराने मित्रों से मुलाकात कर लेता हूँ।आकाश बोला जैसी आपकी मर्जी,भाईसाहब।उन्होंने उस दिन रात्रि विश्राम के लिये मेरी व्यवस्था एक अलग कमरे में कर दी।

      रात्रि में कुछ आवाजे जो सामान्य से अधिक तेज थी,सुनकर मेरी आँखें खुल गयी।आवाजे उन तीनों भाइयों की थी।मानो वे किसी बात पर बहस कर रहे थे।मुझे अजीब सा लगा,प्रियांशु का आज ही अंतिम संस्कार हुआ है,और ये क्या बहस कर रहे हैं।लेकिन मेरा हस्तक्षेप उचित नही था इसलिये मैं चुपचाप सोने का प्रयत्न करने लगा।

लेकिन उनकी आवाजे तीव्र होती जा रही थी।मैं अपने कमरे के दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया, जहां से उनकी बातचीत मुझे स्पष्ट सुनाई देने लगी।झगड़ा इस बात का था कि आरिष्टि में होने वाले खर्च को कौन करे।लगभग एक लाख रुपये का खर्च था,तमाम रिश्तेदार और मित्रगण आयेंगे, तथा ब्रह्मभोज भी करना पड़ता है।

तीनो में कोई या मिलकर भी कोई खर्च नही करना चाहता था।बल्कि आकाश तो अंतिम संस्कार में होने वाले 25 हजार रुपये भी आपस मे बाटने को कह रहा था।मुझे उनकी वार्ता से धक्का लगा।राजीव का कहना था,कि मैं तो बाहर जॉब करता हूँ तुम दोनो ही यहां रहते हो तो इस खर्च को वहन करने का तुम्हारा दायित्व है।

अनिल का कहना था,कि मैं तो सबसे छोटा हूँ और अभी अपनी पढ़ाई पूरी की है तो यह बोझ मुझ पर क्यो डाल रहे हो?आकाश का कहना था कि पिताजी के कारोबार को मैं संभाल रहा हूँ और तुम सब को हिस्सा भी देता हूँ तो यह खर्च मुझ पर क्यो डाल रहे हो?खर्च तो भाभी को उठा लेना चाहिये।भाभी यानि प्रियांशु की पत्नी।पर उनसे कौन कहे?

          मुझे यह सब सुनकर उन सबसे घिन्न सी आने लगी।इन्हें भाई की मौत का कोई दुःख हो लग ही नही रहा था।असल मे पिता की मूल्यवान संपत्ति के बटवारा कैसे हो उससे उनकी परस्पर दूरियां इतनी बढ़ गयी थी जिसके कारण उनमें इंसानियत भी समाप्त हो गयी थी।मैं चुपचाप वहां से हटकर अपने बिस्तर पर वापस आ गया।

        नींद तो आनी नही थी,पर प्रियांशु के साथ बिताया समय आंखों के सामने तैरता चला गया।प्रियांशु तो सबके लिये स्नेहशील ही रहा।मेरी स्वयं की उसने मेरे आड़े वक्त में कई बार सहायता की।पर उसके भाइयो के संस्कारों को क्या हुआ?

          अगले दिन सुबह की चाय एक पड़ोसी के यहां से आयी।चाय पीने के लिये मुझे बुलाया गया।तब प्रियांशु के तीनों भाई भी वही बैठे थे।मैंने झिझकते हुए आकाश से उसके भाइयो की उपस्थिति में कहा कि भाई मेरी एक इच्छा है जिसे आप लोग ही पूरी कर सकते हो।तीनो भाई बिना कुछ बोले मेरी ओर देखने लगे।मैंने कहा आप सब जानते ही हो प्रियांशु से मेरे बचपन से घनिष्ठ संबंध रहे हैं,

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प्रियांशु के मेरे ऊपर बहुत उपकार भी रहे हैं।मेरी इच्छा है कि प्रियांशु के अंतिम संस्कार से लेकर आरिष्टि का तमाम खर्च मैं उठाऊं।मेरी आप सबसे विनती है कि मेरी इस इच्छा को आप पूरी करा दे।तीनो भाई भौचक्के हो मुझे देखते रह गये।मै प्रियांशु को याद करता हुआ नम आंखों को पौछता हुआ वहां से हट गया।मैंने आकाश के खाते में एक लाख पच्चीस हजार रुपये ट्रांसफर कर दिये।

        प्रियांशु की आरिष्टि सम्पन्न हो गयी,मैं प्रियांशु के तीनों भाइयों से विदा लेकर कोलकाता वापस आ गया।घर आकर मैं जहां प्रियांशु के निधन से दुखी था,वही मुझे उसके तीनो भाइयो की मानसिकता से भी कष्ट हुआ था।उधर पत्नी की आवाज आयी अपने सब कपड़े दे दो,वाशिंग मशीन में डालने है।मैंने अपना सुटकेश खोल कर कपड़े निकाले तो एक लिफाफा नीचे गिर पड़ा।

मैंने तो कोई लिफाफा रखा नही था, मैंने उसे खोलकर देखा तो उसमें थे पूरे एक लाख पच्चीस हजार रुपये और एक स्लिप जिस पर लिखा था, आप ही अब हमारे प्रियांशु भैय्या हो,सही राह आप नही दिखाते तो कौन दिखाता।सॉरी भैय्या।

        उस स्लिप को पढ़ मुझे लगा वास्तव में आज मैं प्रियांशु ही हो गया हूँ,खुशी में छलके आंसुओ को जल्दी से पौंछ लिया,अन्यथा पत्नी को क्या उत्तर देता?

बालेश्वर गुप्ता, नोयडा

एक सच्ची घटना से प्रेरित मौलिक व अप्रकाशित रचना।

#रिश्तों में बढ़ती दूरियां

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