शोभा – दर्शना जैन

श्यामा जी की ना कोई बेटी थी न ननंद, उन्हें बेटी की कमी बहुत खलती थी। उनकी बड़ी बहू तनु जब गर्भवती हुई तो पोती पाने के लिये उन्होंने शहर के मंदिरों में माथा टेक मन्नत मांगी, दरगाह पर चादर चढ़ाई, चर्च में मोमबत्तियाँ जलाई। दिल से मांगी मन्नत पूरी होती है, जब बहू को बेटी हुई तो श्यामा जी ने अस्पताल में थाली बजाकर उसका स्वागत किया, बैंड बाजे बुलवाये गये, पोती का नाम भी रख दिया – शोभा। डॉक्टर को यकीन नहीं हो रहा था कि बेटी के जन्म पर इतनी खुशी!

       श्यामा जी पोती पर जान छिड़कती थी, उसे हथेली पर रखती थी। दादी के प्यार के साये में नन्ही शोभा बड़ी हो रही थी। घर में जब कभी मिठाई बनती पहला भोग उसे लगता, उसके नये नये तरह के कपड़े सिलवाये जाते, उसे जरा छींक भी आ जाये तो श्यामा जी उसे ले डॉक्टर के पास दौड़ पड़ती। शोभा को दादी का यह प्यार बहुत अच्छा लगता।

     दो साल बाद दूसरी बहू अपर्णा के भी बच्चे हुए, शोभा को खेलने के लिये साथी मिल गये। श्यामा जी अपने सब पोते पोतियों से प्यार करती थी किंतु शोभा से जो उन्हें खास लगाव था वह कम नहीं हुआ।

    एक दिन शोभा ने अपनी चचेरी बहन मंजू को अपने भाई मिलन से कहते सुना,” दादी हमसे ज्यादा प्यार शोभा से करती है। कल बाजार से हम तीनों के लिये जो खिलौने लायी उसमे शोभा का खिलौना हमसे अच्छा था। कुछ दिन पहले जो ड्रेस लायीं थी उसमे भी उसका कितना अच्छा था।” एक बार मंजू और मिलन खेल रहे थे, शोभा भी उनके साथ खेलने गयी तो मंजू खेल छोड़कर चली गयी। शोभा रूँआसी हो गयी, वह तनु के पास गयी और कहा,” मम्मी, मुझे दादी पर गुस्सा आ रहा है, वे मुझे ज्यादा प्यार क्यों करती हैं, उनसे कह दीजिये कि ऐसा न करें। उनके कारण मंजू व मिलन मेरे साथ खेलते नहीं है।” फिर शोभा ने मंजू के मुख से जो सुना वह मम्मी को बता दिया।

   अपनी सासूमाँ का शोभा के प्रति लगाव देखकर हमेशा खुश होने वाली तनु के सामने विकट परिस्थिति पैदा हो गयी। अपनी बेटी के बालमन की स्थिति वह समझ रही थी लेकिन सासूमाँ से यह कैसे कहे कि शोभा से ज्यादा प्यार न करें। वह जानती थी कि सासूमाँ शोभा से अधिक प्यार करती है परंतु मंजू व मिलन से भी उन्हें कम प्यार नहीं है। वैसे वे दोनों बच्चे जो महसूस कर रहे थे उसे भी तनु समझ रही थी, वे भी गलत नहीं धे।

   एक दिन तनु ने मंजू को ब्रेसलेट व मिलन को घड़ी देकर कहा,” ये तुम्हारी दादी तुम्हारे लिये लायी हैं। तुम सोच रहे होंगे कि दादी की लायी चीजें मैं क्यों दे रही हूँ, शायद दादी ने उस दिन तुम्हे यह कहते सुन लिया था कि वे तुम दोनों को प्यार नहीं करती। बच्चों, हम मम्मी  पापा बच्चों को प्यार करने में एक बार भेदभाव कर भी दे परंतु दादी अपने पोते पोतियों में भेदभाव कर ही नहीं सकती। उन्हें बुरा लगा  इसलिये उन्होंने मुझे देने को कहा था।” ऐसे ही दो दिन बाद तनु फिर से दोनों के लिये कुछ अच्छा सा उपहार ले आयी, कहा कि दादी लायी है और पूछा कि अब तो दादी से नाराज नहीं हो ना। दोनों को पछतावा हो रहा था, वे बोले कि बड़ी मम्मी, हम दादी से सॉरी बोलना चाहते हैं, तनु बोली कि दादी को तुम्हारा सॉरी कहना अच्छा नहीं लगेगा  इसलिये कुछ मत कहना।

    एक बार अपर्णा को शोभा संग खेलता देख मंजू ने अपर्णा से पूछा,” मम्मी, आप इतनी बड़ी होकर शोभा के साथ क्यों खेल रही हो?” अपर्णा ने कहा,” मैंने देखा था उस दिन तुम शोभा को देखते ही खेल छोड़कर चली गयी। अब यदि तुम उसके साथ ऐसा ही करोगी तो सोचो कि वह किसके साथ खेलेगी, बस यही सोचकर मैं….”

    बच्चों को जो समझाना था वह उन तक पहुँच गया था और अगले दिन तीनों साथ में मस्ती से खेल रहे थे।

दर्शना जैन

खंडवा मप्र

 

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