शहर की लड़की – संगीता अग्रवाल

“क्या बात है रोशन की मां क्या सोच रही है यूं अकेले बैठे?” हरिहरन ने अपनी पत्नी रमिया से पूछा।

” रोशन के बापू आप तो हमारा बेटा पढ़ लिखकर अफसर बन गया है अब जल्द ही उसका ब्याह करना पड़ेगा !” रमिया बोली।

” हां ये तो तू ठीक कहे है पर छोरा अब बन गया है शहरी अफसर तो उसके लिए बहू भी तो शहरी लानी होगी !” हरिहरन बोला।

” ना रोशन के बापू मुझे ना चाहिए कोई शहरी मेम जिनमे ना मर्यादा होती है ना कोई शर्म छोटे छोटे कपड़े पहने है वो । अपने रोशन के लिए मुझे तो गांव की सुघड़ संस्कारी बहू चाहिए जो घर जोड़ कर रखे शहरी लड़कियों की तरह तोड़े ना !” रमिया बोली।

” ऐसा नही रोशन की माँ संस्कार गाव या शहर से नही आते सोच से आते है। माना शहर मे पहनावा थोड़ा खुला है लोगो की सोच की तरह पर शहरी लड़कियों मे मर्यादा ना है या वो घर तोड़ती है ये गलत है।” हरिहरण बोला।

” आप कुछ ना समझो हो रोशन के बापू एक ही लड़का है हमारा उसकी बहू तो मैं अपनी पसंद की लाऊँगी !” रमिया बोली।

 “ठीक है ठीक है पर रोशन से तो पूछ ले वो क्या चाहवे है आन दे उसे इस बार गांव !” हरिहरन ने ये बोल बात वहीं ख़तम कर दी।

कुछ दिन बाद रोशन गांव आया क्योंकि वो शहर में पढ़ लिखकर वहीं नौकरी करता था और अभी नौकरी नई ही थी इसलिए अपने माता पिता को साथ नहीं ले गया था वैसे भी हरिहरन और रमिया को गांव ही पसंद था। खासकर रमिया का मानना था शहर के लोगों में दिल नहीं होता वो सिर्फ दिमाग से काम लेते हैं। रोशन हर पंद्रह दिन में दो दिन को गांव अा जाता था।

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” मां बापू मुझे एक बात कहनी है !” रोशन रात के खाने के बाद बोला।

” हां बेटा बोल क्या बात है ?” हरिहरन ने पूछा।

” बापू मैं अपने साथ पढ़ने वाली एक लड़की दीप्ति से ब्याह करना चाहता हूं !” रोशन ने बिना किसी भूमिका के कहा।

उसकी बात सुन रमिया को तो मानो कोई आघात लगा शहर की लड़की से अगर रोशन ब्याह करेगा तो वो अपने बेटे से बिल्कुल दूर हो जाएगी ये सोच उसकी आंख नम हो गई।

” ना ना मुझे ना चाहिए शहरी मेम अपने घर मे !” रमिया एक दम बोली।

” माँ दीप्ती बहुत अच्छी है तू उससे मिल तो ले एक बार अपने लल्ला की खुशी के लिए !” रोशन माँ से बोला।

” ठीक है बेटा तेरी खुशी में हमारी खुशी है तू हमे छोरी से मिलवा दे बाकी तो तुमने तय कर ही लिया होगा !” हरिहरन कुछ सोचते हुए बोला।

” बापू दीप्ति ने अपने मां बापू से बात कर ली है वो शहर में ही रहते हैं बस आप लोग कल दीप्ति से मिल लो वो अा जाएगी यहां फिर उसके मां बाप से भेंट कर सब तय कर लेना !” रोशन बोला।

” ठीक है बेटा !” हरिहरन ये बोल सोने चला गया।

” क्यों जी तुमने क्यों हां करी उस शहरी साथ ब्याह के लिए ?” अपने कमरे में अा रमिया पति पर भड़की।

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” हां ना करता तो क्या बेटे को खो देता …तुमने उसकी आंखों में उस लड़की के लिए प्यार ना महसूस किया पर मैने किया है अब कल होने वाली बहू से मिलने की तैयारी कर जादा मत सोच !” ये बोल हरिहरन सो गया पर रमिया की आंखों में नींद नहीं थी। कल जब वो शहरी लड़की छोटे छोटे कपड़ों में आएगी रोशन के साथ तो कितनी थू थू होगी गांव में ये सोच कर रमिया के माथे पर पसीने अा गए। वो सारी रात करवटें बदलती रही।

अगले दिन ना चाहते हुए भी सुबह उठकर उसने घर साफ किया और खुद एक अच्छी सी साड़ी पहन ली।

” अरे वाह रोशन की मां लगता है बहू से मिलने की बड़ी उत्सुकता है !” हरिहरन रमिया को छेड़ते हुए बोला।

” बस जी जादा दिल ना जलाओ !” रमिया काम में लगे लगे बोली।




तभी एक गाड़ी उनके दरवाजे पर आकर रूकी और ड्राइविंग सीट से एक लड़की साड़ी पहने उतरी। साथ में रोशन भी था जो गांव की सीमा पर दीप्ति को लिवाने गया था।

” नमस्ते अंकल जी आंटी जी !” ये बोल उसने दोनों के पैर छुए। दोनों हैरानी से उसे देख रहे थे रमिया तो कुछ ज्यादा ही हैरान थी क्योंकि लड़की के इस रूप में आने की तो उसने कल्पना भी नहीं की थी।

” जीती रहो बिटिया !” दोनों के मुंह से अनायास ही आशीर्वाद निकला।

” आंटी जी लाइए मैं चाय बनाती हूं !” रमिया चाय बनाने रसोई में अाई तो पीछे पीछे दीप्ति भी अा गई।

” अरे बिटिया तुम बैठो ये जगह तुम्हारे काम करने लायक नहीं है वैसे भी तुम पहली बार हमारे घर अाई हो !” रमिया झेंपते हुए बोली।

” आंटी जी जगह का क्या है जहां सब प्यार से रहे वहीं अच्छी बन जाती है !” दीप्ति मुस्कुराते हुए बोली।

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” बिटिया तुम्हे रोशन से शादी करके शहर में ही तो रहना है ये गांव वैसे भी तुम्हे कहां पसंद होगा !” रमिया उसका दिल टटोलने के लिए बोली।

” अरे नहीं नहीं मुझे तो गांव शुरू से बहुत पसंद है वैसे भी शहर में हम सब साथ रहेंगे इसी शर्त पर मैने रोशन से शादी को हां की है और गांव हम छुट्टियों में आते रहेंगे !” दीप्ति ने कहा तो रमिया उसका चेहरा देखती रह गई। दीप्ति ने रमिया से ढेरों बातें की और हरिहरन और रमिया को शहर में उनके साथ रहने को भी मना लिया था।

जब शाम को दीप्ति वापिस जा रही थी तो रमिया की सोच और नजरिया बदल चुका था कि शहर की लड़कियां संस्कारी नहीं होती ना मर्यादा मे रहती है। 

दोस्तों कुछ लोगो की सोच शहर की लड़कियों को लेकर बहुत गलत होती है कि उनमे संस्कार या मर्यादा नाम की चीज नही होती जबकि ऐसा नही है सब लड़कियां एक सी नही है हाँ वो थोड़ा खुले विचारों की होती है आधुनिक कपड़े पहनती है पर जहाँ साडी पहननी पड़े उससे भी परहेज नही करती ।बड़ो को मान सम्मान भी देती है घर भी जोड़ कर रखती है।

#मर्यादा 

आपकी दोस्त

संगीता अग्रवाल

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