समय का फेर – हेमलता गुप्ता

रमन और महेश की दोस्ती शहर में मिसाल मानी जाती थी। दोनों ने बचपन एक ही मोहल्ले में गुज़ारा था। स्कूल की घंटी बजते ही दोनों साथ भागते, एक ही टिफिन से रोटी बाँटते, और शाम को गली के मोड़ पर खड़े होकर बड़े-बड़े सपने देखते—“एक दिन अपना भी नाम होगा, अपना भी काम होगा।”

वक्त बीता, पढ़ाई पूरी हुई, फिर जिम्मेदारियाँ आईं, लेकिन दोस्ती का धागा कभी ढीला नहीं पड़ा। शहर में दोनों ने अलग-अलग व्यवसाय शुरू किए। शुरुआत में संघर्ष दोनों ने देखा, कई बार नुकसान भी हुआ, मगर मेहनत और किस्मत ने साथ दिया। धीरे-धीरे दोनों के कारोबार जम गए। दुकान से गोदाम बने, गोदाम से शोरूम, और शोरूम से शहर में पहचान।

रमन की आदत थी कि सफलता का श्रेय हमेशा दोस्ती को देता। वह कहता, “महेश, अगर तू न होता तो मैं आधा भी न होता।” महेश हँसकर जवाब देता, “और अगर तू न होता तो मेरा हौसला कब का टूट जाता।” उनकी बातों में अपनापन था, आँखों में सच्चाई थी, और दिल में भरोसा। दोनों के घर भी एक-दूसरे के लिए हमेशा खुले रहते। किसी त्योहार पर पहला न्योता दोस्त के घर से आता। बच्चों के स्कूल में भी वे साथ-साथ जाते।

महेश की एक ही बेटी थी—प्रियंका। लाड़-प्यार में पली, पर संस्कारों में भी मजबूत। रमन का बेटा मयंक था—चंचल, तेज, और अपने पिता की तरह आत्मविश्वासी। दोनों बच्चे बचपन से साथ खेले। कभी पतंग उड़ाते, कभी साइकिल दौड़ाते, कभी किसी बात पर लड़ते भी, मगर फिर अगले ही पल फिर दोस्त बन जाते। घरवालों को देख कर लगता था कि जैसे वे परिवार नहीं, एक ही बड़ा-सा घर हैं जिसमें सब मिलकर रहते हैं।

समय के साथ बचपन का साथ लगाव में बदलने लगा। प्रियंका और मयंक के बीच एक अपनापन बनने लगा जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल था। प्रियंका की आँखों में मयंक के लिए भरोसा था, और मयंक के भीतर प्रियंका के लिए एक अलग सम्मान। वे कभी खुलकर ‘प्यार’ नहीं कहते थे, पर उनकी छोटी-छोटी बातें, उनका ख्याल रखना, और एक-दूसरे के बिना बेचैन होना, सब कुछ कह देता था।

महेश ने यह सब महसूस किया तो उसके मन में एक ही ख्याल आया—“क्यों न इस दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दिया जाए?” उसे लगा, इससे अच्छा रिश्ता और क्या होगा! दोस्त का घर, जिसे वह अपना समझता है, वही बेटी का ससुराल बन जाए—यह तो सौभाग्य होगा। महेश ने एक दिन बड़े सहज तरीके से रमन के सामने बात रख दी। रमन ने भी तुरंत हामी भर दी। उसने कहा, “महेश, तू मेरा भाई है। प्रियंका हमारी बेटी जैसी है। अगर बच्चों की भी इच्छा है, तो इससे अच्छा क्या।”

फिर तो बात आगे बढ़ी। दोनों घरों में खुशी का माहौल हो गया। रिश्तेदारों को खबर दी गई, मिठाइयाँ बाँटी गईं। सगाई की तारीख तय हुई। प्रियंका शर्माती, मुस्कुराती, और मन ही मन सपने सजाती। मयंक भी उत्साहित था। वह पिता के साथ दुकान पर बैठता और बीच-बीच में मोबाइल देखता—कभी प्रियंका के मैसेज का इंतज़ार, कभी उसकी पसंद का कोई छोटा-सा तोहफा चुनना।

सगाई का दिन आया तो दोनों परिवारों की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा। मंच पर बैठे बच्चों के चेहरे पर चमक थी। महेश की आँखें नम थीं—एक पिता का गर्व और भावुकता। रमन के चेहरे पर भी संतोष था। लोग कहते, “वाह! ऐसी दोस्ती हो तो शादी भी ऐसी ही हो।”

समय बीत रहा था। शादी की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं। प्रियंका के लिए कपड़े, जेवर, घर के सामान—महेश और उसकी पत्नी प्यार से चुनते। महेश की पत्नी अक्सर कहती, “हमारी बेटी बहुत भाग्यशाली है। रमन जी का घर है, दोस्त का घर है, बेटी को वहाँ कोई कमी नहीं होगी।”

लेकिन वक्त कब किस करवट बदल जाए, किसी को क्या पता। महेश के व्यापार में अचानक नुकसान होने लगा। पहले छोटी-छोटी दिक्कतें आईं—एक बड़ा ग्राहक भुगतान में देर करने लगा, दूसरी तरफ माल की कीमतें बढ़ गईं, कुछ पैसे फँस गए। महेश ने सोचा, “चलो, व्यापार में उतार-चढ़ाव तो होता रहता है।” मगर नुकसान रुकने का नाम नहीं ले रहा था। धीरे-धीरे महेश की रातों की नींद उड़ने लगी। माथे की शिकन बढ़ती गई।

एक रात उसने चुपचाप हिसाब-किताब की फाइलें पलटीं। उधार बढ़ता जा रहा था। बैंक का दबाव भी आने लगा। महेश की पत्नी ने उसे चिंता में देखा तो बोली, “आप इतना मत सोचिए। भगवान सब ठीक करेंगे। और फिर रमन जी हैं, आपके मित्र हैं। मुश्किल में साथ देंगे। और क्या चिंता? बेटी वहीं जा रही है। हमारे दिन सुधर जाएंगे।”

महेश ने पत्नी की बात सुनकर भी बस हल्की-सी मुस्कान दी। भीतर डर बैठा था, मगर उसने उम्मीद का सहारा लिया। उसे अपने दोस्त पर भरोसा था। उसने सोचा, “रमन मुझे समझेगा। दोस्ती सिर्फ खुशियों में नहीं, दुख में भी साथ होती है।”

अगले दिन सुबह-सुबह रमन खुद महेश की दुकान पर आ गया। महेश को लगा, “देखो, मित्र को पता चल गया होगा, मदद करने आया है।” उसने तुरंत आदर से बैठाया, चाय मंगवाई। पर रमन का चेहरा आज अलग था—ठंडा, गंभीर, जैसे भीतर कोई फैसला पहले ही हो चुका हो।

महेश ने नरमी से पूछा, “क्या बात है रमन, आज सुबह-सुबह?”
रमन ने बिना इधर-उधर देखे सीधी बात कही—“महेश, एक बात कहने आया हूँ। यह रिश्ता… आगे नहीं बढ़ सकता।”

महेश के हाथ से चाय का कप लगभग छूट गया। उसने समझा शायद मज़ाक कर रहा है। वह हँसने की कोशिश करते हुए बोला, “अरे, क्या बोल रहा है! ऐसी भी क्या बात हो गई?”
रमन की आवाज़ में कठोरता आ गई—“मैं मज़ाक नहीं कर रहा। अब मयंक के लिए बहुत अच्छे-अच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं। बड़े घराने, बड़ा पैसा, बड़ा नाम। और तुम्हारे व्यापार की हालत… सबको पता चल रही है। मैं समाज में अपनी इज्जत कम नहीं कर सकता।”

महेश का चेहरा पीला पड़ गया। उसे लगा जैसे किसी ने सीने पर पत्थर रख दिया हो। उसने धीमे से कहा, “रमन… तू मेरा दोस्त है। मैंने कभी तुझसे कुछ छिपाया नहीं। बस समय खराब है। मैं संभाल लूँगा।”
रमन ने कंधे उचकाए—“समय खराब है या किस्मत खराब, मुझे नहीं पता। पर मैं जोखिम नहीं ले सकता। लोग क्या कहेंगे? मेरे बेटे की शादी अगर ऐसे घर में हुई, तो मेरी इज्जत…”

महेश की आँखों में आँसू उतर आए, पर वह रो नहीं पाया। दोस्त के सामने अपनी टूटन दिखाना उसे भारी लग रहा था। उसने बस इतना कहा, “तो हमारी दोस्ती?”
रमन ने नजरें चुरा लीं—“दोस्ती अपनी जगह, पर रिश्तेदारी… नहीं हो पाएगी।”

यह कहकर वह उठ खड़ा हुआ। महेश उसे रोकना चाहता था, लेकिन आवाज़ गले में फँस गई। रमन चला गया, और दुकान की दीवारें जैसे और ठंडी हो गईं। महेश कुछ देर तक यूँ ही बैठा रहा—न बोल पाया, न रो पाया, बस भीतर से टूटता रहा। जिस दोस्त को उसने भाई माना, आज वही उसे समाज की इज्जत की तराजू पर तौलकर छोटा कर गया।

घर पहुँचा तो पत्नी ने पूछा, “कौन आया था?”
महेश ने एक पल को पत्नी की तरफ देखा, और फिर नजरें झुका लीं। उसके होंठ काँपे—“रमन… रिश्ता तोड़ गया।”
पत्नी की सांस रुक गई—“क्या?”
महेश ने सूखी आवाज़ में सब बता दिया। पत्नी भी सन्न रह गई। प्रियंका पास के कमरे में थी, उसने कुछ बातें सुन लीं। वह दौड़कर आई—“पापा, क्या हुआ?”

महेश उसे क्या बताता? वह बेटी के चेहरे की ओर देखता और फिर नजरें फेर लेता। उसकी पत्नी ने बेटी को गले लगा लिया। प्रियंका को लगा जैसे जमीन खिसक गई हो। उसकी आँखें भर आईं—“मयंक… मयंक ने भी ऐसा कहा?”

प्रियंका ने उसी समय मयंक को फोन किया। उसकी आवाज़ काँप रही थी—“मयंक, ये क्या हो रहा है? तुम्हारे पापा ने पापा से… रिश्ता… तोड़ दिया?”
फोन के उस पार मयंक कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “प्रियंका, देखो… मेरे पापा जहाँ चाहेंगे, मैं वही शादी करूँगा। मैं उनका दिल नहीं तोड़ सकता।”

प्रियंका को लगा जैसे किसी ने उसका दिल निचोड़ दिया हो। वह बोली, “और हमारा साथ? हमारी सगाई? हमारे सपने?”
मयंक ने ठंडी आवाज़ में कहा, “सपने सबके बदलते हैं। हालात भी बदलते हैं।”

प्रियंका ने रोते हुए कहा, “तो तुम भी वही हो… जो समाज, पैसा और नाम देखकर बदल जाता है?”
मयंक ने जवाब नहीं दिया। सिर्फ इतना बोला, “मुझे समझने की कोशिश करो। मेरे लिए परिवार की बात सबसे ऊपर है।”

फोन कट गया। प्रियंका का हाथ काँपने लगा। उसके सामने बचपन के सारे पल घूम गए—गली में खेलना, स्कूल की बातें, साथ बैठकर हँसना, और सगाई की अंगूठी का वह दिन… सब कुछ जैसे झूठ लगने लगा।

महेश ने बेटी को रोते देखा तो उसका कलेजा फट गया। उसने खुद को संभालते हुए कहा, “बेटा… कभी-कभी इंसान का असली चेहरा दुख में दिखता है।”
प्रियंका ने आँसू पोंछकर पूछा, “पापा, मयंक ऐसा क्यों निकला?”

महेश को एक पल के लिए याद आया—मयंक के मन में क्या चल रहा होगा। उसने कुछ लोगों से पहले भी सुना था कि मयंक कभी-कभी मज़ाक में कहता, “प्रियंका इकलौती बेटी है, सब कुछ उसी का होगा।”
महेश ने अब समझा—वही लालच, वही गणित। जब तक महेश का कारोबार अच्छा था, तब तक रिश्ता ठीक था। जैसे ही घाटा शुरू हुआ, तो “धन-दौलत की मालकिन” वाला सपना भी टूट गया। मयंक और रमन को लगा होगा कि अब इस रिश्ते में फायदा नहीं।

महेश के भीतर गुस्सा भी था, दर्द भी। पर वह टूटकर भी संयम में रहा। उसने कहा, “बेटा, जिसने तुम्हें इज्जत नहीं दी, वह तुम्हारा योग्य नहीं। रिश्ता केवल पैसों पर नहीं टिकता।”

प्रियंका कई दिनों तक चुप रही। वह किसी से बात नहीं करती। उसकी माँ उसके पास बैठकर सिर सहलाती। महेश अपने व्यापार को संभालने की कोशिश करता, मगर भीतर एक घाव था—दोस्ती का घाव। वह कई बार सोचता, “अगर रमन ने मदद नहीं की, तो भी ठीक… पर इस तरह अपमान?”

एक शाम महेश अकेला बैठा था। दीवार पर सगाई की फोटो टंगी थी। उसने उठकर फोटो उतार दी। हाथ काँप रहे थे, पर उसने खुद को मजबूत किया। उसने मन में कहा—“आज मैं हार गया हूँ, पर मैं टूटूँगा नहीं। मुझे अपनी बेटी के लिए भी खड़ा होना है।”

समय ने फिर करवट ली। महेश ने धीरे-धीरे अपना हिसाब ठीक किया, कुछ पुराने उधार वसूल किए, कुछ खर्च घटाए, और कारोबार को नए ढंग से सँभालने लगा। घाटा धीरे-धीरे कम होने लगा। पर रिश्ते का नुकसान कभी पूरा नहीं हो सकता था। दोस्त का भरोसा टूट गया था।

कुछ महीनों बाद शहर में खबर फैली कि रमन ने मयंक की शादी एक बड़े घर में तय कर दी है। लोग बधाइयाँ देने लगे। महेश ने सुना तो बस एक लंबी सांस ली। उसकी पत्नी ने कहा, “देखिए, भगवान ने हमें समय रहते बचा लिया। ऐसा घर हमारी बेटी का हो ही नहीं सकता था।”

प्रियंका अब पहले जैसी नहीं रही थी। पर उसने दर्द से एक चीज सीख ली थी—प्यार सिर्फ साथ खेल लेने से नहीं, साथ निभाने से साबित होता है। उसने पढ़ाई और अपने काम पर ध्यान देना शुरू किया। अपने पैरों पर खड़े होने का फैसला किया।

और महेश… उसने सबसे बड़ी सीख दिल में लिख ली—दोस्ती की परीक्षा अच्छे दिनों में नहीं, बुरे दिनों में होती है। जिसने समाज की इज्जत के नाम पर दोस्त को गिराया, वह खुद अपनी नजरों में गिर गया।

रमन और मयंक ने भले ही रिश्ता तोड़कर अपनी “इज्जत” बचाने की कोशिश की हो, पर सच्चाई यह थी कि उन्होंने अपना चरित्र खो दिया था। महेश और प्रियंका की नजरों में वे जितना ऊँचा थे, उससे कहीं नीचे गिर चुके थे।

कुछ महीनों बाद शहर में खबर फैली कि रमन ने मयंक की शादी एक बड़े घर में तय कर दी है। लोग बधाइयाँ देने लगे। महेश ने सुना तो बस एक लंबी साँस ली—ऐसी साँस जिसमें गुस्सा नहीं था, बस एक थकान थी। 

प्रियंका पहले जैसी नहीं रही थी। उसने दर्द को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। शुरू-शुरू में वह कई रातें रोई थी, मगर फिर एक दिन उसने अपने आँसू पोंछकर आईने में खुद को देखा और मन ही मन कहा—“अब किसी के फैसले से मेरा मूल्य तय नहीं होगा।” उसने पढ़ाई और अपने काम पर ध्यान देना शुरू किया। महेश ने भी अपने व्यापार को संभालने में पूरी ताकत लगा दी। उसने खर्च घटाए, नए ग्राहक तलाशे, और सबसे बड़ी बात—अब वह भावनाओं से नहीं, समझदारी से निर्णय लेने लगा।

धीरे-धीरे महेश का व्यापार फिर पटरी पर आने लगा। जो उधार फँसा था, वह भी वापस आने लगा। शहर के कुछ पुराने जानकारों ने कहा, “महेश जी ने तो कमाल कर दिया… जिस हालत में थे, वहीं से उठ गए।” महेश मुस्कुरा देता, पर उसकी मुस्कान में शोर नहीं होता था। वह जान चुका था कि दुनिया का भरोसा कितना कच्चा हो सकता है।

उधर रमन का घर शादी की चकाचौंध में डूब गया। मयंक की शादी बहुत धूमधाम से हुई। बड़े होटल में रिसेप्शन, शहर के बड़े लोग, महंगे गिफ्ट—सब कुछ वैसा ही जैसा रमन “समाज की इज्जत” के नाम पर चाहता था। रमन के चेहरे पर वही गर्व था, जो कभी दोस्ती के समय भी रहा करता था, बस फर्क यह था कि पहले उस गर्व में अपनापन होता था, अब उसमें दिखावा ज्यादा था।

लेकिन समय… समय की अपनी न्याय-व्यवस्था होती है। वह तुरंत सजा नहीं देता, पहले मौके देता है—समझने के लिए, संभलने के लिए। और जब इंसान नहीं समझता, तब धीरे-धीरे आईना दिखाता है।

मयंक की शादी के कुछ ही महीनों बाद रमन के व्यापार में अचानक एक बड़ा झटका लगा। जिस पार्टनर पर उसने आँख बंद करके भरोसा किया था, उसने ही माल के भुगतान में हेरफेर कर दी। ऊपर से बाजार में मंदी आ गई। एक-दो बड़े ऑर्डर कैंसिल हो गए। बैंक का दबाव बढ़ा, कर्मचारियों की तनख्वाह रुकने लगी। रमन को लगा कि यह बस एक-दो महीनों की परेशानी है, पर परेशानी फैलती चली गई।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब रमन के पुराने हिसाब-किताब की कुछ गड़बड़ियाँ सामने आने लगीं। टैक्स और पेमेंट से जुड़ा मामला इतना बढ़ा कि नोटिस तक आ गया। शहर में कानाफूसी शुरू हो गई। वही समाज, जिसकी इज्जत बचाने के लिए रमन ने दोस्त का रिश्ता तोड़ा था, वही समाज अब उसके पीछे बातें कर रहा था।

इधर मयंक की नई-नई शादी में भी सन्नाटा उतरने लगा। जिस बड़े घर में उसने शादी की थी, वहाँ रिश्ते बराबरी से नहीं, शर्तों से चलते थे। उसकी पत्नी के घरवालों को लगता था कि उन्होंने “अपना रुतबा” दिखाकर यह शादी करवाई है। धीरे-धीरे मयंक को महसूस होने लगा कि यहाँ प्यार कम है, हिसाब ज्यादा है। छोटी-छोटी बात पर ताने, उम्मीदें, तुलना—सब शुरू हो गया।

एक दिन रमन देर रात तक बैठा हिसाब देख रहा था। हाथ काँप रहे थे। माथे पर पसीना था। पत्नी ने पूछा, “क्या हुआ?”
रमन ने झुंझलाकर कहा, “कुछ नहीं… तुम सो जाओ।”
लेकिन मन के भीतर डर बैठ चुका था। उसे लग रहा था कि कहीं सब कुछ हाथ से न निकल जाए।

उसी रात, उसे महेश याद आया।
महेश—जो बुरे समय में भी चुपचाप खड़ा रहा।
महेश—जिसने कभी उसके सामने हाथ नहीं फैलाया, फिर भी अपने दोस्त से उम्मीद रखी थी।

रमन ने पहले खुद को समझाया, “नहीं… मैं उससे कैसे कहूँ? मैंने जो किया…”
फिर बैंक का नोटिस सामने आया और उसकी आत्मा काँप गई। मजबूरी ने इंसान की अकड़ को घिस दिया।

अगले दिन रमन महेश की दुकान पर आया। वही दुकान, जहाँ कभी वह दोस्त बनकर हँसता था, और एक दिन वहीं वह रिश्ता तोड़कर गया था। इस बार उसके कदम धीमे थे। चेहरा उतरा हुआ था।

महेश ने उसे देखा तो पलभर को मन में एक लहर उठी—पुरानी दोस्ती की याद और पुराने अपमान का दर्द, दोनों एक साथ। वह संयम में रहा। उसने सिर्फ इतना कहा, “आओ रमन, बैठो।”

रमन कुछ बोल नहीं पाया। कुछ पल बाद उसने धीमे स्वर में कहा, “महेश… मैं… मैं मुश्किल में हूँ।”
महेश ने उसकी आँखों में देखा। वही आँखें जो कभी “समाज की इज्जत” बोलते वक्त कठोर थीं, आज उनमें डर था।

रमन ने बात घुमा-फिराकर नहीं कही। वह टूट चुका था।
“मेरे व्यापार में बड़ा नुकसान हो गया है। बैंक… नोटिस… सब गड़बड़ हो गया। मुझे कुछ पैसों की जरूरत है… बस कुछ महीनों के लिए… मैं लौटा दूँगा।”

महेश चुप रहा। उसकी पत्नी काउंटर के पीछे से यह सब सुन रही थी। प्रियंका भी ऑफिस से लौटकर उसी समय दुकान पर आ गई थी। रमन की आवाज़ उसके कानों में पड़ी तो वह वहीं ठिठक गई। उसके भीतर पुराना दर्द फिर जागा, पर अब वह दर्द आँसू नहीं बना, एक ठंडी समझ बन गया।

महेश ने रमन से बस एक सवाल पूछा—“रमन, उस दिन जब मैं मुश्किल में था… तब तूने क्या किया था?”

रमन का सिर झुक गया। वह कुछ कह नहीं पाया।

महेश ने शांत, पर साफ शब्दों में कहा, “तूने कहा था—मेरी इज्जत कम हो जाएगी। आज किसकी इज्जत बची है, रमन?”

रमन की आँखें नम हो गईं। उसने काँपती आवाज़ में कहा, “मुझे माफ कर दे, महेश। मैंने बहुत गलत किया। मुझे अपनी करनी का फल मिल रहा है।”

महेश की पत्नी अब आगे आई। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, दर्द था।
“रमन जी, आपने हमारी बेटी का दिल तोड़ा था। सिर्फ दिल नहीं—उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी छीन ली थी। उस दिन आपकी ‘इज्जत’ बहुत बड़ी थी, हमारी नहीं। आज जब जरूरत पड़ी, तो वही दोस्त याद आया जिसे आपने छोटा समझा था?”

रमन ने हाथ जोड़ दिए।
“मैं जानता हूँ… मैं बहुत नीचे गिर गया था। मैं… मैं शर्मिंदा हूँ।”

महेश अभी भी चुप था। वह भीतर से लड़ रहा था—बदला और इंसानियत के बीच। वह जानता था कि यदि वह रमन को खाली हाथ लौटा दे, तो उसका अहं संतुष्ट हो जाएगा, पर उसका दिल… उसका दिल शायद कभी शांत नहीं होगा।

और तभी प्रियंका आगे बढ़ी। उसकी आवाज़ में एक अलग ही मजबूती थी।
“पापा…” उसने धीरे से कहा, “आपने मुझे हमेशा सिखाया है कि इंसान का मूल्य उसके कर्म से होता है, बदले से नहीं।”

महेश ने उसकी ओर देखा।

प्रियंका ने रमन की तरफ देखा और बोली, “रमन अंकल… आपने हमें बहुत चोट दी थी। और उस चोट ने हमें कमजोर नहीं किया, मजबूत बनाया। आज आप मदद मांगने आए हैं… और मैं चाहती हूँ कि हम मदद करें।”

महेश की पत्नी चौंक गई, “प्रियंका!”
प्रियंका ने उसकी तरफ देखा, “मम्मी, मदद करेंगे… लेकिन शर्त पर।”

रमन ने जल्दी से कहा, “जो भी शर्त… मैं मानूँगा।”

प्रियंका ने बिना किसी तंज के, बस साफ शब्दों में कहा, “पहली शर्त—आप हमारे घर आकर, सबके सामने, खुले दिल से स्वीकार करेंगे कि आपने महेश अंकल का अपमान किया और रिश्ता सिर्फ पैसे-समाज के डर से तोड़ा। दूसरी शर्त—आप मयंक को भी बुलाएँगे, और वह भी यही बात स्वीकार करेगा। तीसरी शर्त—आप यह वादा करेंगे कि आगे से किसी का मूल्य उसके हालात से नहीं, उसके चरित्र से आँकेंगे।”

रमन की आँखों में आँसू बह निकले। शायद उसे सबसे ज्यादा चोट “शर्तों” से नहीं लगी थी, उसे चोट इस बात की लगी थी कि जिस लड़की का उसने भविष्य तोड़ा, वही आज उसे इंसानियत का पाठ पढ़ा रही थी।

उसने काँपते हाथ जोड़ दिए—“मैं… मैं सब करूँगा।”

कुछ देर बाद मयंक भी बुलाया गया। वह जब दुकान में आया तो उसकी नजर प्रियंका पर पड़ी। प्रियंका पहले जैसी टूटती हुई लड़की नहीं थी। उसके चेहरे पर शांति थी, आँखों में आत्मसम्मान। मयंक एक पल को शर्म से झुक गया।

महेश ने कहा, “मयंक, आज वही समय है जब आदमी का असली चेहरा दिखता है।”

मयंक ने गहरी सांस ली।
“अंकल… मैं गलत था। प्रियंका… मैं…”
वह आगे कुछ नहीं बोल पाया।

प्रियंका ने उसकी बात बीच में नहीं काटी। उसने सिर्फ कहा, “मयंक, अब यह मेरे लिए नहीं… तुम्हारे लिए जरूरी है। ताकि तुम समझो कि रिश्ते फायदे के नहीं, भरोसे के होते हैं।”

मयंक ने सिर झुका लिया।
“मैं स्वीकार करता हूँ। मैंने भी लालच और डर के कारण अपने फैसले को सही ठहराया। मैं कमजोर निकला।”

महेश की पत्नी की आँखें भर आईं। यह वही शब्द थे जो वह महीनों से सुनना चाहती थी, पर अब वे शब्द देर से आए थे।

महेश ने अंत में कहा, “रमन, मैं तुम्हें पैसा उधार दे रहा हूँ… दोस्ती के नाम पर नहीं, इंसानियत के नाम पर। दोस्ती तुमने उस दिन तोड़ दी थी। पर मैं अपनी आत्मा को छोटा नहीं होने दूँगा।”

रमन की आँखों में आभार और शर्म दोनों थे।
“महेश… तू आज भी बड़ा है। मैं… मैं इस एहसान का बोझ नहीं, इस सीख का कर्ज लेकर जा रहा हूँ।”

कुछ महीनों बाद रमन ने सचमुच मेहनत की, गलतियों को सुधारा, अपना व्यापार समेटा, हिसाब-किताब साफ किया और महेश का पैसा लौटा दिया। शहर में जब लोग पूछते, “महेश जी, आपने उसे मदद क्यों की?” तो महेश बस इतना कहता—
“क्योंकि मैं वैसा इंसान नहीं बनना चाहता, जैसा उसने उस दिन बनकर दिखाया था।”

और प्रियंका?
प्रियंका ने उस दर्द से एक नई पहचान बनाई। उसने अपने काम में तरक्की की, अपने पैरों पर खड़ी हुई। कुछ समय बाद उसके लिए एक रिश्ता आया—ऐसा रिश्ता जो उसके नाम या पैसों से नहीं, उसके संस्कार और आत्मसम्मान से प्रभावित था।

महेश ने बेटी से पूछा, “बेटा, अब भरोसा होता है?”
प्रियंका मुस्कुरा दी—
“पापा, अब मैं भरोसा किसी के वादों पर नहीं… उसके व्यवहार पर करती हूँ। और सबसे बड़ा भरोसा मुझे खुद पर है।”

महेश ने बेटी के सिर पर हाथ रखा। उसकी आँखों में वही पिता वाला गर्व था, लेकिन इस बार वह गर्व किसी शादी या रिश्ते पर नहीं, बेटी की मजबूती पर था।

रमन और मयंक ने बहुत कुछ पाया होगा—बड़ा नाम, बड़ा समाज—पर जो उन्होंने खोया, वह सबसे कीमती था: विश्वास। और महेश-प्रियंका ने जो खोया था, वही सबसे बड़ी ताकत बन गया: आत्मसम्मान।

लेखिका : हेमलता गुप्ता

error: Content is protected !!