समाधि (भाग-10) – बीना शुक्ला अवस्थी : Moral stories in hindi

पिछले अंक ( 09 )  का अन्तिम पैराग्राफ ••••••••

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दरवाजा खोलते ही जब तक वे तीनों आगे बढ़ते तब तक अपने साथियों को घायल और मृत देखकर समाधि ने राहुल और उसके एक साथी को गोली मार दी। एकलव्य भागकर कमरे में रखे ड्रम के पीछे छुप गया।

अब आगे ••••••••

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एकलव्य नहीं चाहता था कि कभी उसका और समाधि का आमना – सामना हो। यदि समाधि उसके पीछे न आती तो शायद यह रहस्य कभी न खुलता।

उसने समाधि के समक्ष हाथ जोड़ दिये – ” मैं लालच में भटक गया था सिम्मी। मुझे देशद्रोही जानकर माफ भले ही न करना लेकिन मेरे प्यार पर संदेह मत करना। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूॅ और तुम्हें दुनिया का हर सुख देना चाहता था। बहुत सारा पैसा कमाकर अपने प्यार का घरौंदा सजाना चाहता था।”

” लेकिन अभी तो तुम मुझ पर गोलियॉ चला रहे थे, मुझे मारने का प्रयास कर रहे थे।”

” मैं अपनी सिम्मी को नहीं पुलिस इंस्पेक्टर समाधि को केवल घायल करना चाहता था ताकि वह मेरे पीछे न आ सके और मैं आसानी से भाग सकूॅ। राहुल जी ने कहा था कि सही रास्ते पर चलकर हम कभी दौलत नहीं कमा सकते और… ।” एकलव्य की सॉसें अटक रही थीं।

” इस गिरोह के बारे में जो जानते हो बताओ ।”समाधि की ऑखों से ऑसू बहते जा रहे थे लेकिन ऐसे समय भी उस के भीतर का देश पर मर मिटने वाला देशभक्त सतर्क था।

” अब समझ में आ रहा है कि तुम्हारे माध्यम से सारी बातें जानने के लिये वो सिर्फ मेरा इस्तेमाल करते थे और बदले में कुछ पैसे दे देते थे। इसलिये उन लोगों से सारी बात वह खुद करते थे, वह भी कूट भाषा ( कोड वर्ड ) में। “

एकलव्य ने बताया कि जब सूचना का आदान प्रदान करना होता था तब नीले रंग के कोट के अन्दर की ओर कूट भाषा में सूचना लिखकर सिल दी जाती थी और बड़ी आसानी से सार्वजनिक शौचालयों में कोट बदल दिये जाते थे और यह काम राहुल खुद करते थे। एकलव्य ने कई बार कूट भाषा जानने और स्वयं काम

करने के लिये कहा तो राहुल मना कर देते। वह कहते कि अभी तुम नये हो इसलिये मेरे साथ रहकर काम का तरीका सीखो और मेरे निर्देशों को मानते रहो‌‌ क्योंकि तुम्हे थोड़े दिन बाद काम छोड़ देना है। वह केवल अंगरक्षक के रूप में राहुल के साथ रहता था। एकलव्य का काम था खतरा देखकर बिना सोंचे समझे साइलेन्सर लगी रिवाल्वर से गोली चलाना और राहुल को सुरक्षित रखना। उसे तो याद भी नहीं है कि अब तक उसके हाथों कितने लोग मारे जा चुके हैं।

” उन लोगों का कोई फोन नम्बर हो या सम्पर्क का कोई दूसरा सूत्र हो तो बताओ ‌”

” सिम्मी, बहुत बेवकूफ हूॅ, मैंने कभी कुछ जानने का प्रयत्न ही नहीं किया। मैं तो ऑख बन्द करके राहुल जी के इशारों पर चलता रहा। यहॉ तक वो पैसे भी मेरे नकली नाम के खाते में जमा होते थे। अगर कोई फोन नम्बर या सम्पर्क सूत्र होगा भी तो मुझे नहीं पता है।”

समाधि की कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?

एकलव्य से अब बोला नहीं जा रहा था, उसकी सॉसें अटक रही थीं – ” एक उपकार और कर देना सिम्मी कि किसी को मेरी असलियत पता न चले। मम्मी पापा मेरी मौत का सदमा सह लेंगे लेकिन मैं देशद्रोही हूॅ यह जानकर आत्महत्या कर लेंगे। शायद मेरा कोई पुण्य शेष है जो आखिरी सॉस तुम्हारी गोद में ले रहा हूॅ। मैं अब भी तुम्हें उतना ही प्यार करता हूॅ। कितने सपने थे कि तुम्हारे काले केशों में अपने नाम का सिन्दूर डालकर अपनी दुल्हन बनाऊॅगा लेकिन अपनी मूर्खता और लालच के कारण सब गंवा दिया।” पीड़ा के बावजूद हल्के से मुस्करा रहा था वह – ” मेरे बाद मम्मी -पापा का ख्याल रखना और किसी भाग्यशाली से ••••••।”

समाधि ने एकलव्य के रक्त से सने  हाथ अपने बालों पर लगाया – ” ओम, तुम्हारे प्यार पर अब भी कोई संदेह नहीं है मुझे। शायद मेरे प्यार में ही कमी थी जो तुम मुझे  समझ नहीं पाये और रास्ता भटक गये। मुझे प्यार के स्थान पर सुख – सुविधा देने के लिये नाजायज रास्ते से दौलत इकठ्ठी करने के लिये अपराध की दुनिया में उतर गये। मैं अपने जीवन में तुम्हारे सिवा किसी के बारे में सोंच भी नहीं सकती। देखो तुम्हारे रक्त से मेरी मॉग भरी है।अब मैं तुम्हारी पत्नी हूॅ और हमेशा तुम्हारी विधवा बनकर रहूॅगी। तुम्हारे कर्तव्य पूरे करूॅगी। मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूॅ लेकिन मैं अपने देश को अपने प्राण, तुमसे यहॉ तक अपने मम्मी पापा से अधिक प्यार करती हूॅ।”

एकलव्य के शरीर को उठाकर सीने से लगा लिया उसने और तुरन्त एकलव्य ने अपनी अन्तिम सॉस ली। समाधि का पूरा शरीर और वर्दी एकलव्य के रक्त में डूब गई।

अब उसके सामने एकलव्य की अन्तिम इच्छा पूरी करने की समस्या थी। एकलव्य ने जो कहा सही था, उसे सारी दुनिया से अपने ओम की असलियत छुपानी थी। अंकल आंटी तो ओम की असलियत जान कर किसी के समक्ष सिर नहीं उठा पायेंगे, साथ ही निर्दोष होते हुये भी तमाम कानूनी कार्यवाही के कारण मुसीबत में भी पड़ सकते हैं।

उसे समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे ओम की असलियत छुपाये। इतनी बड़ी घटना को छुपाया कैसे जा सकता है‌। साथ ही उसके ऊपर, उसकी निष्ठा, उसकी वर्दी पर भी उंगलियॉ उठेंगी।

उसे पता चल गया था कि उनके गिरोह में नाम नहीं नम्बर प्रयोग किये जाते हैं और काले नकाब में सिर से पैर तक ढके रहने के कारण गिरोह के सदस्य भी एक दूसरे को नहीं जानते हैं। एकलव्य को जानने वाले सिर्फ थे और राहुल मारे जा चुके हैं।

तभी उसके सामने पीड़ा से तड़पता, हाथ जोड़कर विनती करता एकलव्य का चेहरा तैर गया। उसने निश्चय कर लिया कि जब वह एकलव्य की विधवा है तो उसकी अन्तिम इच्छा पूरी करना भी तो उसका ही दायित्व है। अपने पति का अन्तिम संस्कार उसे ही करना है। उसे जल्दी ही कुछ ऐसा करना है जिससे अब  एकलव्य का सच कभी उजागर न हो। यह राज हमेशा उसके सीने में दफन रहेगा।

वह जानती थी कि एकलव्य का सच छुपाना भी एक अपराध है लेकिन वह क्या करे! यदि उसे एकलव्य से इस गिरोह के बारे में कुछ भी पता चला होता तो वह एकलव्य का न सही लेकिन इस गिरोह का तो भंडाभोड कर ही देती लेकिन एकलव्य तो मात्र एक मोहरा था। राहुल के सिवा वह किसी को नहीं जानता था। वह सारी जानकारी राहुल को ही दिया करता था।

राहुल और एकलव्य के बाद यह कहानी समाप्त हो जानी थी। समाधि भी सब कुछ भूलकर अपने सीने में दफन कर लेगी। इतना विचार आते ही जैसे उसके शरीर और मस्तिष्क में बिजली दौड़ गई। उसे क्या करना है, उसके सामने स्पष्ट हो गया।

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बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर

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