हमसफर, कितना प्यारा शब्द है। जो यात्रा में साथ चले वह सहयात्री, हम सफर। यह जीवन भी एक यात्रा है ,और जो जिन्दगी के सफर में हरदम साथ दे, वह हमसफर। जिसके साथ हम अपने सुख-दु:ख साझा कर सके। ये चाहे पति-पत्नी हो, प्रेमी -प्रेमिका हो या कुछ ओर। कई रिश्ते ऐसे देखे गए है जहाँ पति-पत्नी पूरे जीवन काल में एक दूसरे के साथ रहते है मगर एक दूसरे को जान ही नहीं पाते, एक छत के नीचे अजनबी की तरह रहते हैं यहाँ अजनबी का मतलब यह कि वे समझ ही नहीं पाते कि उनका साथी क्या चाहता है, कोई दिली जुड़ाव नहीं,
बस जीवन चलता रहता है। एक दूसरे को जानने का अर्थ है-परस्पर प्यार और एतबार,एक दूसरे पर विश्वास करना।इस मामले में देना ही एकमात्र विधि है, देना ही दूसरो को प्रेरित कर सकता है। जितनी भी दे सके अपनी आत्मा दे डालिए अपने हमसफर को और प्रतिदान में उनसे जो मिले उसे बहुमूल्य मानकर संजोकर रखिये। जितनी आत्मा दूसरो को दिखाना स्वाभाविक प्रतीत हो उतनी दिखाए;उससे ज्यादा दिखाने के लिए अपने आप को विवश न करें। हमसफर तक पहुँचने का मार्ग दिल से गुजरता है। यहाँ दूरी ज्यादा मायने नहीं रखती जुड़ाव होता है दिल से दिल का । फिर…हमसफर कितनी ही दूर क्यों न हो
, दिल की आवाज उस तक पहुँच ही जाती है। मेरी इस कहानी के पात्र धरा और अम्बर भी कौसो दूर रहते है मगर दिल से दिल का रिश्ता इतना मजबूत है कि …..’दिल को उसके सिवा कुछ भाता ही नहीं, एक पल भी उससे दूर नहीं रह सकता,हर दर्द में चाहता है उसी का सहारा जो नजरों से दूर हैं, मगर दिल का हर तन्तु उसी से जुड़ा है.वही उसके हर दर्द की दवा है और खुशियों को जमा करने की तिजोरी भी.वह भी उसे बे इंतेहा प्यार करती है,दर्द बाद में उठता है और उसका एहसास उसे पहले ही हो जाता है.वह उसके अश्रुओं को अपने दामन में समेट लेती है और बदले में रंग- बिरंगे फूल बिखेर देती है,
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उसकी प्रसन्नता के लिए.बूंदे आसमान से गिरती है और धरती उन्हें समेट कर हरियाली और फूलों की चादर बिछा देती है. अम्बर हरी भरी वादियों में अकेला बैठा प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर रहा है.मेरी धरा मुझसे दूर है, मैं दूर विदेश में बैठा हूँ, मेरी अपनी मजबूरी है मेरी माँ का इलाज यहाँ चल रहा है, मेरी नौकरी यहाँ पर हैं.नौकरी में कंपनी के ऐसे बंधनों में बंधा हूँ कि चाहकर भी उसके पास नहीं जा सकता.वह अपने माता पिता की इकलौती संतान है, अपने पिता को छोड़कर नहीं आ सकती. माँ का साया नहीं है उसके ऊपर. वृद्ध पिता को, उनकी खेती बाड़ी को छोड़कर वह भी नहीं आ सकती
मजबूर है.मगर एक शाम भी ऐसी नहीं होती जब उसका फोन न आया हो, हर शाम हम मिलते हैं और अपने हर दु:ख दर्द, और खुशियाँ बाटते है. वे पल रंगीन होते हैं सुनहरी शाम की तरह और फिर दोनों अगले दिन की मुलाकात का वादा करके अपने -अपने रास्ते चलने लगते हैं, अंबर अपने विचारों में खोया था,
तरह तरह के विचार मन में आ रहैं थे। उसने देखा धरती की और कई पुष्प खिले थे,फूल कांटों से घिरे थे, फिर भी मुस्कुरा, रहै थे। उसे याद आई उसकी धरा। लगा वह भी तो अकेली रहकर कितनी परेशानियां उठा रही है, पर मुझसे हमेशा प्रसन्नता से बात करती है जैसे खुश है पुष्प की तरह।अम्बर की ऑंखों में नमी तैर गई थी। वह सोच रहा था धरा और अम्बर कभी दिल से दूर नहीं रह सकते।
संध्या का समय हो गया था, ऐसा लग रहा था अम्बर नीचे झुक रहा है। सूर्यास्त की लालिमा क्षितिज पर छा रही थी
और अम्बर का दिल चिल्ला चिल्लाकर कह रहा था…. धरा मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। फोन की घंटी खड़खड़ा रही थी, धरा का फोन था, अम्बर उसमें खो गया।सच्चे हमसफर थे दोनों, दूर रहकर भी साथ-साथ चल रहै थे। इनकी मंजिल की राह इनके दिल से होकर गुजर रही थी और अपने सुख-दु:ख को बाटते हुए इनके कदम मंजिल की ओर बढ़ रहै थे।
प्रेषक-
पुष्पा जोशी
स्वरचित, मौलिक,अप्रकाशित
#हमसफर
Mujhe bhi kahaniya likhne ka shook hai. mai apni kahani kaise post kar sakti hu aur kya in kahaniyo ke liye payment bhi multi hai.reply kare .
Absolutely