रिश्तों में अहंकार लाता अलगाव – रश्मि प्रकाश  : Moral Stories in Hindi

काव्या अभी बच्चों को पढ़ा कर क्लास से निकली ही थी कि उसके पति का फोन आ गया… अरे ये आज कैसे फोन कर दिए सोचते हुए उसने जैसे ही हैलो कहा… उसे सुन कर रोना आ गया …उसे पति की बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था अपनी तसल्ली के लिए खुद को संयत कर उसने अपनी  ननद नैना को फोन लगा दिया,” कैसी हो भाभी.. फोन कैसे किया अभी तो आप स्कूल में होगी ना…फिर?” 

“ नैना ये तुम्हारे भैया क्या कह रहे हैं तुमने पैसे देने से मना कर दिया… तुम्हें पता तो है ना हमें घर ख़रीदने के लिए पैसों की जरूरत थी तुमने मदद करने की बात की थी तभी हमने घर की बुकिंग करवाई…. सारे पैसों का जुगाड़ कर लिया था और उसमें तुम्हारे दस लाख भी शामिल किए हुए थे अब कल पूरे पैसे देने हैं और आज तुम मना कर रही हो!” काव्या हताश होकर बोली 

“ हाँ मैंने पैसे फिक्स करवा दिए हैं मैं नहीं दे सकती वैसे भी आपका घर है आपको सोचना चाहिए था आप लोग कैसे लोगे… मैं मदद करने को ज़रूर बोली थी पर अब नहीं कर सकती वो पैसे मैंने बेटी के नाम जमा करवा दिए है आप लोग मुझे फिर दे पाते और नहीं इसलिए मैं आप लोगों को पैसे नहीं देना चाहती थी ।” कहकर नैना ने फोन काट दिया 

काव्या किसी तरह स्कूल की छुट्टी तक वहाँ टिकी रही और जब घर आई पति को वहाँ देख फफक पड़ी ।

“नैना ने ऐसा क्यों किया हमारे साथ… हमने तो कभी किसी चीज़ की कमी नहीं की उसको देने में फिर?” काव्या के ऐसा कहते ही पति मयंक उसे सीने से लगाते हुए बोले ,” ज़्यादा प्यार भी कभी कभी जहर बन जाता हैं।” 

“ अब क्या होगा कल आख़िरी किस्त देकर घर की रजिस्ट्री करवानी थी ये घर हमने पहले ही बेच दिया है वो लोग भी कब से इंतज़ार कर रहे इस घर की चाभी हम उन्हें दे दे ।” काव्या रोते हुए बोली 

“सोचता हूँ कुछ “ मयंक ने कहा 

काव्या जानती थी मयंक के परिवार में कोई ऐसा नही है जो उन्हें दस लाख की रकम दे सकें…उसने अपने भाई-बहन और मामा मामी बुआ फूफा सबसे बात की सबने उसे तसल्ली देते हुए कहा सब हो जाएगा चिंता मत करो ।

काव्या को आज अपने मम्मी पापा की बहुत याद आ रही थी जो दो साल पहले थोड़े थोड़े समय के अंतराल पर ही उसे छोड़कर दुनिया से चले गए थे ।

तभी काव्या के मामा का फोन आया,” बेटा तू चिंता मत कर हम सबने मिलकर पैसों का इंतज़ाम कर लिया है बस कल घर तेरे घर की चाभी तेरे पास होगी मैं कल सुबह तक तेरे पास आ जाऊँगा तू बेफिक्र रह हम सदा तेरे साथ हैं।” 

मामा के बोल उसे पिता की याद दिला रहे थे…उसके माता-पिता ने हमेशा परिवार को साथ लेकर चला तो आज वही परिवार उनके ना होने पर भी उसके साथ खड़ा था…रिश्तों की अहमियत रिश्ते कैसे निभाए जाते है हमेशा उसपर निर्भर करती हैं आप कैसा व्यवहार करते हैं।

दूसरे दिन काव्या के मामा ने आकर सब कुछ अच्छे से सँभाल लिया और जब जाने लगे तो काव्या ने कहा,” आप सबके पैसे जल्दी ही चुका देंगे ।”

“बेटा इसकी कोई ज़रूरत नहीं है ।” मामा ने प्यार से कहा 

“ नहीं मामा जी ज़रूरत की बात नहीं है … भरोसे की बात है आप सबने इतनी जल्दी व्यवस्था करके हमारी मदद की है ये ही बड़ी बात है हम अपना घर अपने दम पर लेना चाहते थे बस जो रकम कम हो रही थी वो उधार मांग रहे थे आप सबके पैसे तो हम लौटायेंगे ।” मयंक ने कहा 

मामा जी हामी भरते हुए सिर पर आशीर्वाद और प्यार बरसा कर चले गए 

दोनों अब बच्चों के साथ नए घर जाने की तैयारी कर रहे थे तभी काव्या ने कहा,” सुनो नवल कहाँ है….उसका सामान भी तो पैक करना होगा ।”

“ मम्मा चाचू तो सो रहे हैं ।”काव्या के बड़े बेटे ने कहा 

“ अच्छा ठीक है पहले हम अपना सामान बांध लेते हैं फिर उसका सामान भी बाँध लेंगे ।” मयंक ने कहा 

काव्या घर को देखती और सामान समेटने लगती…पन्द्रह साल पहले वो ब्याह कर इस घर में आई थी…छोटी ननद की शादी हो चुकी थी… सबसे छोटी थी तो नकचढ़ी हो गई थी और पैसा तो वो पकड़ कर रखती थी.. जब भी आती माँ पिता से कुछ न कुछ लेकर ही जाती…उससे बड़ा एक देवर था नवल पर उसका दिमाग सही नहीं था…समझदारी जरा भी नही बचपना ज़्यादा करता था जब इंसान बड़ा हो जाता पर दिमाग बच्चा ही रह जाए तो उसे भी बच्चा ही माना जाता जिसका रख रखाव भी बच्चों की तरह करना पड़ता है ।

एक बार माता पिता बेटी के घर किसी फ़ंक्शन में गए थे आते वक़्त कार  चालक का नियंत्रण खो गया और तीनों लोग वहीं ख़त्म हो गए… बड़ा बेटा होने के कारण मयंक और काव्या पर सारी ज़िम्मेदारी आ गई दोनों स्कूलों में बतौर शिक्षक नियुक्त थे इसलिए स्कूल के साथ साथ घर बच्चों देवर सबकी ज़िम्मेदारी उन्हें ही देखनी पड़ी ।

ननद उसी शहर में रहती थी इसलिए उसका आना जाना लगा रहता था…वो जब भी आती नवल के कमरे में उसे कुछ ना कुछ सिखाने की कोशिश करती रहती …काव्या भी ननद को कभी एहसास नहीं होने देती कि उसकी माँ अब नहीं है पर ना जाने क्यों उसे महसूस होने लगा था उसकी ननद उसे, उसके बच्चों और तो और अपने भाई को भी अब पसंद नहीं करती है… बात बात पर कहती रहती आप लोग तो अब घर के मालिक मालकिन हो गए हो पता नहीं कब नवल को घर से निकाल दो…अब तो आप लोगों को ये घर भी बेचने की जल्दी पड़ी है ..।

“नैना  तुम्हें भी पता है पिताजी भी कहते थे ये घर पुराना हो गया है कहीं नया घर ले लेते हैं बात तो तभी से चल रही थी ।”

संकरी गलियों के बीच.घर पुराने ज़माने का था और बहुत छोटा था….बच्चे बड़े हो रहे थे तो  उनके लिए अब अलग कमरों की ज़रूरत पड़ने लगी थी इसलिए ये तय हुआ कि इस घर को बेच कर नया घर ले लिया जाएगा और पिताजी के कहे अनुसार तीन हिस्से कर दिए जाएँगे जो मयंक नवल और नैना को मिलेंगे… चूँकि नवल इनके साथ ही रहता था तो उसके पैसे भी नए घर में लगाये जाएँगे और नैना से कहा गया था कि तुम अभी अपने हिस्से में से ज़रूरत के मुताबिक़ पैसे की मदद कर देना हम दोनों तुम्हारे पूरे पैसे लौटा देंगे उस समय तो नैना ने हामी भर दी पर पता नहीं बाद में उसने मना क्यों कर दिया इस बात का ही दुख मयंक और काव्या को खाए जा रहा था ।

“ सुनो नए घर में जाने से पहले पूजा हवन करवाना होगा…. किन किन को बुलाया जाए ये सोचा है तुमने?” अचानक से काव्या ने मयंक से पूछा 

“ देखो तुम अपने परिवार में जिनको बुलाना चाहती हो बुला लो मेरा तो दादी नानी घर का कोई रिश्तेदार नहीं है और जो है उन सबने हमारी तरफ़ से पहले ही मुँह मोड़ लिया है… और रही बात नैना की … दिल से वो उतर गई है अपनी बहन का ये रूप मुझे बहुत तकलीफ़ दे रहा है तो मेरी समझ से उसको बुलाना ज़रूरी नहीं है ।” मयंक की आवाज़ में पीड़ा और आँखों में नमी काव्या ने भी महसूस की फिर भी काव्या ने नैना को न्योता दे दिया…. आज माता-पिता होते तो बेटी का ना आना उन्हें तकलीफ़ ही देता और नए घर की इच्छा तो पिताजी ने ही ज़ाहिर की थी।

पूजा वाले दिन काव्या आई तो उसके रंग ढंग देख कर सब दंग रह गए उसे अपने भाई भाभी के साथ किए का कोई मलाल नहीं था।

जाते जाते उसने बस एक ही बात बोली जो मयंक और काव्या को छलनी करने के लिए काफ़ी थे,” नए घर में आ तो गए हो भाई का हिस्सा लगा दिया अब उसकी देखभाल भी करोगे और सड़क पर छोड़ दोगे?”

मयंक कुछ कहने जा रहा था तो काव्या ने उसका हाथ पकड़कर रोक दिया और बोली ,” नैना आप देखभाल करेंगी तो ले जाइए साथ हम उसका हिस्सा उसको दे देंगे ।” 

“ मैं क्यों करूँगी…. वो मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है ।”नैना ने कहा

“ तो फिर इस तरह की बकवास करने की ज़रूरत नहीं है… आप घर की बेटी है इसलिए कुछ नहीं बोल रहे पर आपने जो किया है ना पैसों को लेकर उससे हमारा दिल बहुत दुखा है भगवान ना करें आपको कभी ऐसी कोई ज़रूरत पड़े वैसे आप तो पैसे वाली है… तभी तो इतना अहंकार आ गया है कि आप रिश्तों के महत्व को भूल गई है… घर की बहू हूँ और मैं हमेशा आपको सम्मान देना चाहती थी पर अब आप खुद बताइए किस हक से आपका सम्मान करूँ… जो अपने ही भाइयों के बीच झगड़ा करवाने का काम करती है?”

नैना पैर पटकते हुए वहाँ से चली गई…

कहते हैं ना कभी कभी इंसान का अहंकार उसे अकेला कर देता है वैसा ही कुछ नैना के साथ हुआ।

बेटी का जेईई का एग्ज़ाम था और नैना के पति उसे बाइक से लेकर एग्ज़ाम के बाद घर आ रहे थे कि रास्ते में उनका एक कार से टक्कर हुआ और गंभीर चोटें आईं तुरंत अस्पताल ले जाया गया… सास ससुर खुद बीमार रहते थे उन्हें खबर नहीं दिया गया… पति के कमर की हड्डी बहुत जगह से टूट गई थी उनका ऑपरेशन जल्द करना ज़रूरी था…. नैना का ना अपना कोई देवर था ना ननद…चचेरे रिश्तेदार दूर रहते थे…. ऑपरेशन चल रहा था बेटी के सिर पर चोट लगी थी और हाथ की हड्डी टूट गई थी जिसपर प्लास्टर कर दिया गया था वो अस्पताल के सबसे महँगे कमरे में थी ….नैना कभी यहाँ कभी वहाँ कर रही थी नैना अकेले कैसे करें ये सोच कर वो परेशान हो रही थी…पैसे की कमी नहीं थी पर एक कोई अपना ढाढ़स बँधाने वाले की उसे सख़्त ज़रूरत महसूस हो रही थी… तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा वो पीछे मुड़कर देखी तो उसके सीने से लगकर रो पड़ी… मयंक और काव्या खड़े थे।

“ तुमने हमें बताना भी ज़रूरी नहीं समझा… वो तो हमारे पुराने पड़ोसी जो तुम्हारे मोहल्ले में रहने चले गए हैं आज बाज़ार में मिल गए उनसे ही सब पता चला जब हम यहाँ आएँ ।”मयंक ने कहा जो बहन की पीड़ा समझ तो रहा था पर उसके किए व्यवहार से आहत ज़रूर था

“ भैया भाभी किस मुँह से आपको फ़ोन करती…. अमीर घर में ब्याह हो गया तो मुझे आप सब ग़रीब ही नज़र आते रहे मुझे लगा मैं पैसे दे दूँगी तो आप लोग कभी दे भी नहीं पाओगे… इसलिए मैं…. अपने अहंकार में रिश्तों के महत्व को भूल गई थी…. मुझे पता तो था ही आप लोगों के सिवा यहाँ मेरा कोई नहीं है पर पैसे की ताक़त का अंदाज़ा जब हुआ तो मैं रिश्तों को भूलने लगी… आप दोनों मेहनत कर पाई पाई जोड़कर घर चला रहे थे…और मैं अपनी अमीरी में चूर हो रही थी…. आज आप दोनों ने आकर मुझे एहसास करवा दिया कि रिश्तों को महत्व देना कितना ज़रूरी है वही तो दुख में साथ रहते हैं मैं तो ना कभी आपका दुख देखी और जो नए घर का सुख मिलने वाला था उसपर भी ग्रहण लगाने चली थी मुझे माफ़ कर दो भैया-भाभी।” नैना के आँसू आज उसे रिश्तों के महत्व समझा रहे थे 

“ नैना रिश्तों जब सही हो तो दुख भी अपने सुख भी अपने लगते है… अब तुम चिंता मत करो अभी तुम कुहू के पास जाओ … ऑपरेशन ख़त्म होने तक मैं इधर हूँ ।” मयंक ने कहा 

नैना अब बेफ़िक्र हो गई थी क्योंकि अब उसके अपने रिश्ते उसके साथ खड़े थे।

दोस्तों मेरी रचना पसंद आए तो कृपया उसे लाइक करें और कमेंट्स करें ।

धन्यवाद 

रश्मि प्रकाश 

#वाक्यकहानीप्रतियोगिता 

# मैं अपने अहंकार में रिश्तों के महत्व को भूल गई थी

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!