दीवाली का त्योहार था। घर द्वार वंदनवार सजे थे। रंगबिरंगी दीपमालाओं से घर रोशन हुए थे। आँगन में रंगोली सजायी थी। नये नये वस्त्र पहनकर बच्चें इतरा रहे थे। रोषणाई की जगमग, पटाखों की आवाज, आसपास से आती मिठाई की खुशबू। वैदेही और विशाल टुकुर-टुकुर देख रहे थे।
” मां, हम भी मनाये दीवाली। देखो न लतिका दीदी ने कितने सुन्दर कपडे पहने है।”
” मां, मुझे भी पटाखे ला दो न मां।”
सुनीता क्या कहती। थोडे दिन पहले ही सेठ के साथ झगडा हुआ था लक्ष्मण का। काम से तो निकाल ही दिया, झूठे आरोप लगाकर जेल भेज दिया।
बच्चों का दिल किसी तरह बहलाकर उसने उन्हें सुला दिया। उसका काम करना भी मुश्किल होता जा रहा था। चोर की पत्नी को कौन घर में आने देगा?
सेठ है कि आये दिन कुछ न कुछ बहाना कर घर आता। वैदेही दस साल की अबोध बालिका थी। पर अपने बाबुजी की तरह उंची पूरी कद काठी थी उसकी। मां जैसे ही आकर्षक। उसका भोलापन चार चाँद लगाता उसकी सुंदरता में। विशाल आठ साल का था, लेकिन गबरू था। उसका मुस्कुराता चेहरा, नटखट हंसी सबके मन को भाती। अपने अडोस-पडोस में दोनों बच्चों को खूब प्यार मिलता।
बाबूजी थे जब तक उनका गुजारा आराम से होता। वे दोनों को खूब पढाना चाहते थे। होनी को कुछ और ही मंजूर था।
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आज भी सेठ मिठाई, पटाखे लेकर घर आये थे। सुनीता काम के लिए बाहर गयी थी। पटाखों, खिलौने, मिठाई देख बच्चों की नजर चौंक गयी।
“वाह इतने सुंदर खिलौने?”
“क्या ये सब हमारे है?”
” हाँ, हाँ, सब तुम्हारे हैं। जाओ, अपने दोस्तों संग खूब खेलो।”
खिलौनों के लालच और दोस्तों को दिखाने की चाहत में विशाल माँ की हिदायतें भूल गया। भूल गया की नन्हीं सोयी है।
मां आयी तो देखा विशाल खिलौने से खेल रहा है।
” इतने सुंदर, महंगे खिलौने? कहां से लाया?”
” चुराये होंगे, और क्या?” किसी ने तीखा व्यंग किया।
“मां वो बाबूजी के दोस्त है न, वो लाये है। मैंने चुराये नहीं है मां।”
पलभर में सारा माजरा समझ गयी वह।
” कलमुँहे, मैंने कहा था न, गुडिया को अकेले छोडकर कहीं नहीं जाना।”
विशाल को खिंचते, भागती हुई वह अपने घर पहुंची।
सेठ वैदेही के पास बैठा था।
भयभीत वैदेही सहमी सी बैठी थी।
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” नराधम, निकल जाओ यहां से। नहीं तो तेरी बोटी-बोटी कर दूंगी।”
हाथ में लंबा चाकू लिए सुनीता का महिषासुर मर्दिनी रूप देख सेठ गिड़गिड़ाता माफी मांगने लगा।
“लक्ष्मण को घर भिजवा दे, वरना…”
शोर मचाकर सारा मुहल्ला इकठ्ठा कर दूंगी।”
मां का रणचंडी रूप देख वैदेही सुनीता से लिपट गयी। सारे खिलौने, मिठाई उसने बाहर फेंक दी।
स्वरचित मौलिक कहानी
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र