पापा मेरे प्यारे पापा , आप यहां नहीं हो लेकिन मुझे मालूम है कि आप मेरी हर बात सुन रहे हैं , मेरे दिल में उठते सवालों को आप समझ रहे हैं। पापा आख़िर क्यों मैं बड़ी हो गई , मुझे फिर से आप की वही छोटी सी गुड़िया बनना है। जिसे आप ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाते थे , जिसे कंधे पर बैठा कर आप मेला घुमाते थे , जिसके लिए आप रंग बिरंगी गुड़ियाँ लेकर आते थे।
ये बड़े होने का बोझ मुझसे नहीं उठाया जा रहा , मैं फ़िर से आपकी वो ही छोटी गुड़िया बनना चाहती हूँ।
आज फ़िर से गीतिका के आँखों से झर झर आंसू बाह रहे थे और आज फ़िर वो अपने पापा से मन ही मन अपना दुःख बाँट रही थी।
पापा से दुःख बांटते बांटते गीतिका अपने बचपन में खो जाती थी ,आज भी वही हुआ।
गीतिका जब से पैदा हुई अपने पापा के सबसे ज़्यादा क़रीब रही , पापा की जान हुआ करती थी गीतिका। उसके मुंह से निकलने से पहले उसके पापा उसकी हर चाहत पूरी कर देते थे , उसे बहुत नाज़ों से पाला था उसके पापा ने, माँ कई बार पापा से कह देती थी “क्या होगा आप दोनों का जब ये ब्याह कर चली जाएगी ” ,,,पापा के कुछ भी कहने से पहले गीतिका बोल उठती “माँ, मैं पापा और आपको छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी “.
हालाँकि गीतिका अब जवान होने लगी लेकिन उसका बचपना अभी भी वैसा ही था।
माँ के टोकने पर गीतिका पापा से लिपट कर कहती “मैं अपने पापा की छोटी सी प्यारी सी गुड़िया हूँ , मैं कभी बड़ी नहीं होउंगी “. और उसके पापा उसे गले लगा लेते। छोटे बच्चे की तरह गीतिका पापा की गोद में मचल उठती।
वक़्त गुज़रता गया और अब गीतिका की शादी की चिंता उसके माँ बाप को सताने लगी। जल्दी ही पापा ने अपने एक दोस्त के बेटे के लिए गीतिका के रिश्ते के लिए हाँ कर दी। हालाँकि,गीतिका पापा को छोड़कर नहीं जाना चाहती थी लेकिन पापा के समझाने पर उसने शादी के लिए हाँ कर दी।
नम आँखों और भारी मन से से गीतिका ससुराल आ गई।
इधर उसके माँ पापा की चिंता भी ख़तम हो गई कि उनकी बेटी का घर बस गया।
लेकिन कुछ दिन बाद ही गीतिका के ससुराल में उसे दहेज़ के लिए सताया जाने लगा , उसके साथ मारपीट की जाने लगी। गीतिका चुपचाप सब कुछ बर्दाश्त करती गई लेकिन उसने अपने पापा से कभी कुछ नहीं बताया।
लेकिन एक दिन गीतिका के पड़ोस में रहने वाले मिस्टर वर्मा जब उसके पापा से बाज़ार में मिले तो उन्होंने गीतिका के साथ हो रहे अन्याय की बात बताई जिसे सुनकर गीतिका के पापा बेहोश
होकर गिर पड़े। लोगों ने किसी तरह उन्हें घर पहुँचाया। होश में आते ही वो और गीतिका की माँ फ़ौरन गीतिका की ससुराल पहुंचे। माँ पापा को अचानक देख आज गीतिका के सब्र का बाँध टूट गया और वो अपने पापा के गले से लगकर बेतहशा रो पड़ी।
“निर्मल, मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि तू मेरा दोस्त होकर मेरी बेटी के साथ ये अन्याय करेगा , तू इसका ससुर नहीं पिता बनने की बात करता था , क्या ऐसा होता है पिता और अमित तूने मेरी बेटी को जानवरों की तरह मारा , तू पति नहीं एक राक्षस है, अब मैं अपनी बेटी को यहाँ से ले जा रहा हूँ , अगली मुलाक़ात कोर्ट में होगी “. इतना कहकर गीतिका के पिता उसे लेकर घर आ गए , घर आकर बहुत दिनों बाद गीतिका अपने पापा की गोद में उसी तरह सो गई जैसे वो बचपन में सोती थी।
कुछ देर बाद गीतिका जब जागी तो पापा से बोली, *पापा मैं क्यों बड़ी हो गई* , मुझे छोटा ही रहना था , अगर मैं बड़ी न होती तो ये सब दुःख न आते। क्यों बड़ी हो गई पापा मैं ,,,पापा ने गीतिका के सर पर हाथ फेरा और कहा तुम अभी भी मेरी वो ही छोटी सी गुड़िया हो , मैं अभी भी तुम्हारी रक्षा कर सकता हूँ बेटी…
गीतिका का केस कोर्ट में गया , पापा के संघर्ष और सच से गीतिका की जीत हुई और उसके ससुराल वालों को सज़ा दे दी गई।
लेकिन गीतिका को देख देख कर उसके पापा खुद को उसका गुनहगार मानने लगे। वो अक्सर उसकी माँ से कहते “कि मैंने अपने हाथों से अपनी बेटी को कुँए में धक्का दे दिया , एक अच्छे घर में उसकी शादी तक नहीं कर पाया “. गीतिका की माँ उन्हें समझाती लेकिन उन्होंने ये बात अपने दिल से लगा ली थी और इसी सदमे में वो एक रात सोकर फ़िर उठे ही नहीं।
पापा की मौत के बाद से गीतिका बिलकुल खामोश हो गई , बस दिल ही दिल में पापा से सवाल करती रहती कि पापा मैं बड़ी क्यों हो गई, छोटी रहती तो आपको मेरी शादी का गम न लगता , आप मेरे साथ होते।
आज कई साल बीत गए हैं पापा को गए। गीतिका एक स्कूल में सीनियर प्रोफेसर की जॉब पर है, गीतिका की माँ ने कई बार कोशिश की कि गीतिका दोबारा घर बसा ले लेकिन गीतिका ने ये कहकर इंकार कर दिया कि अब मैं अपने पापा की वही छोटी सी गुड़िया बनकर इसी घर में रहूंगी , अब मुझे दोबारा बड़ा नहीं होना।
लेखिका : शनाया अहम