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प्रेयसी का उस समय शर्म से सिर झुक गया जब ननद वान्या ने आकर उसे गले से लगा लिया – ” भाभी, इतनी बड़ी बात हो गई और आपने एक बार फोन भी नहीं किया। मुझे तो आज अखबार से पता चला। आप चिन्ता मत करो, सब ठीक हो जायेगा।”
” कैसे ठीक होगा वान्या, सारे सबूत आपके भाई के विरुद्ध हैं। मेरी तो बुद्धि ही काम नहीं कर रही है।” प्रेयसी का स्वर मानो आर्तनाद कर रहा था।
” जो होगा, देखा जायेगा, अभी आप बच्चों को लेकर मेरे घर चलो। आगे की बाद में सोचेंगे। अभी आपको और बच्चों को अकेले नहीं छोड़ सकती मैं।”
” लेकिन तुम्हारे सास ससुर और सोहन …… ।”
” उन सबके आग्रह से ही आपको लिवाने आई हूॅ। सोहन को जैसे ही छुट्टी मिलेगी, वह भी आयेंगे।”
बहुत मुश्किल से वान्या प्रेयसी को घर ला पाई लेकिन उसकी पैसे के गुरूर में सदैव अहंकार से तनी रहने वाली गर्दन झुक गई थी। कैसे जाये वह वान्या के साथ?
उसे याद आ रहा था कि कैसे उसने वान्या की विपत्ति में किनारा कर लिया था? वान्या के पति सोहन भी सरकारी नौकरी पर थे, उनका वेतन भी वान्या के भाई राघव के बराबर ही था लेकिन जहॉ सोहन रिश्वत के सख्त खिलाफ थे वहीं राघव के घर में सारा वैभव ही रिश्वत का था।
एक बार वान्या के ससुराल में वान्या के ससुर,जेठ और सोहन में कुछ विवाद हो गया। सास ससुर ने दोनों बेटों को घर से जाने के लिये कह दिया।
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वान्या के जेठ तो रहते ही दूसरे शहर में थे, वह तुरन्त अपने परिवार को लेकर चले गये। सोहन का कार्य फील्ड अर्थात ऑफिस के बाहर का और टूर का अधिक था इसलिये वह वान्या को साथ नहीं रख पाता था और अपने दो मित्रों के साथ रहता था। अब अचानक इस परिस्थिति में वह वान्या और अपने एक वर्ष के बच्चे को लेकर नहीं जा सकता था।
उसने वान्या से कहा – ” तुम कुछ दिन मायके में रह लो। जैसे ही घर मिल जायेगा, मैं तुम्हें लिवा जाऊॅगा।”
वान्या प्रेयसी के स्वभाव से परिचित थी लेकिन सोहन से कुछ कह नहीं सकती थी। उसे मायके में छोड़ कर सोहन निश्चिन्त होकर चला गया।
सोहन के जाते ही प्रेयसी और राघव ने वान्या से कहा –
” वान्या, तुम्हारे यहॉ रहने से हमें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मेरे बच्चों से अपने बच्चे की बराबरी मत करना। घर में महीने का जितना सामान आता है, उतना ही आयेगा। अधिक खर्च मैं नहीं कर पाऊॅगा। अपनी भाभी से ईर्ष्या मत करना क्योंकि मैं उसके लिये जो सामान लाऊॅगा, तुम्हारे लिये नहीं ला पाऊॅगा।”
” आप ऐसा क्यों कह रहे हैं भइया, कुछ ही दिनों की बात है। मुसीबत में लड़की मायके नहीं आयेगी तो कहॉ जायेगी?”
” पहली बात तो यह जान लो कि यह तुम्हारा मायका नहीं, तुम्हारे भाई का घर है। तुम पिताजी की जिम्मेदारी थीं मेरी नहीं। मैं मम्मी का ही सारा खर्चा उठाता हूॅ, यही बहुत है।यह घर पापा ने नहीं, मैंने बनवाया है। यह घर तुम्हारी भाभी का है, उसे जो पसंद नहीं है, वह इस घर में नहीं होगा। मैं उसकी ऑखों में ऑसू नहीं देख सकता, इस बात का ख्याल रखना। दूसरी बात मैं स्पष्ट बोलना पसंद करता हूॅ जिससे बाद में परेशानी न हो।”
वान्या का एक दिन भी रुकने का नहीं था लेकिन स्त्री को मायके और ससुराल दोनों घरों की इज्जत रखनी होती है। इसलिये वह सोहन को कुछ नहीं बता पाई।
दूसरे दिन से प्रेयसी की तबियत खराब रहने लगी, वह काम करना तो दूर सारा दिन कमरे में पड़ी रहती साथ ही बाई भी छुट्टी पर चली गई। वान्या को गुस्सा तो बहुत आता लेकिन मम्मी के कारण चुप रह जाती। जानती थी कि मम्मी को रहना तो राघव और प्रेयसी के साथ है और ये लोग उसका बदला मम्मी से लेंगे।
वान्या सारा दिन काम करती, बच्चे को दूध की बजाय रोटी या चावल खिलाने लगी।
उस पर राघव और प्रेयसी हर वक्त सुनाते रहते – ” एक आदमी कमाने वाला और इतने सारे खाने वाले।”
खाना देखकर ही भाभी और बच्चे चिल्लाने लगते – ” हमें नहीं खाना ऐसा खाना। दाल में पानी भर दिया जाता है। सब्जी सस्ती वाली आने लगी है।”
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जो कुछ खाना होता, आन लाइन आ जाता और प्रेयसी के कमरे में चला जाता। शाम को सुबह का बचा वह खाना वान्या, उसके बच्चे और मम्मी को खाना पड़ता।
काम हो जाने के बाद प्रेयसी आती और एक एक बर्तनों की जॉच पड़ताल शुरू कर देती – ” कितने गन्दे बर्तन धोती हो वान्या? दुबारा धोकर रखना।”
झाड़ू – पोंछा के बाद प्रेयसी उंगली से छूकर देखती – ” लगता ही नहीं यहॉ पोंछा लगा है। देखो कितनी धूल है। तुमको तो कुछ नहीं आता।”
पन्द्रह दिन बीत गये, वान्या का धैर्य जवाब देने लगा। न सोहन से कुछ कह सकती थी और न मम्मी के कारण इन लोगों से। आखिर उसने कुछ सोंचकर अपनी सास को फोन किया –
” अम्मा जी, आरु आप लोगों को बहुत याद करता है।” उसका गला भर आया – ” अम्मा, मेरी और आरु की क्या गलती है? आप लोग सोहन से नाराजगी का दंड हम दोनों को क्यों दे रहे हैं? जेठ जी और सोहन ने बंटवारे की बात की थी, आप लोगों ने तो मेरा और अपने पोते का ही बंटवारा कर दिया। मैंने तो आप लोगों से कभी कुछ नहीं कहा।” वान्या फूट फूटकर रोने लगी।
वान्या की सास को तो यही पता था कि सोहन वान्या और आरव को अपने साथ ले गया है। उन्होंने वान्या को चुप कराते हुये कहा – ” पहले चुप हो जाओ और बताओ कि तुम कहॉ हो?”
वान्या ने उन्हें अपने मायके में होने की बात बताई तो वह तुरन्त बोलीं – ” मोहन और सोहन दोनों जब बंटवारे की बात करने लगे तो तुम्हारे ससुर को भी गुस्सा आ गया था। तभी उन्होंने कह दिया था कि तुम लोगों की कमाई के बारे में मैंने कभी नहीं पूॅछा तो तुम लोग कौन होते हो मेरी मेहनत की कमाई का बंटवारा करने वाले? दोनों मेरे घर से चले जाओ और अपने पैसे कमाकर सम्पत्ति तैयार करो। मैं मॉगने नहीं आऊॅगा।”
” लेकिन अम्मा…….।”
” मैंने और तुम्हारे ससुर ने अपनी बहुओं और पोते – पोतियों से जाने को नहीं कहा था। या तो तुम स्वयं आ जाओ या मैं तुम्हारे ससुर को लिवाने भेजूं? मोहन के बच्चे तो शुरू से अलग रहे लेकिन आरु के बिना तो हम दोनों बेजान से हो गये हैं। जानती तो हो कि आरु हम लोगों के कलेजे का टुकड़ा है।” वान्या की सास का गला भर आया।
” आप पिताजी को मत भेजिये, मैं आ जाऊॅगी।” वान्या ने अपनी और बच्चे की सारी सामान बैग में रखी और ससुराल आ गई। प्रेयसी ने एक बार भी नहीं कहा कि भाई को आ जाने दो, बल्कि उसे सुनाते हुये कहा – ” दुख हो या सुख अपने घर में ही काटना चाहिये।”
उसके बाद वान्या का मायके आना साल में केवल तीन दिन तक ही सीमित रह गया। उस पर भी प्रेयसी उसके सामने पैसे का गुरूर दिखाना नहीं छोड़ती। उसको अपने और बच्चों के कपड़े, गहने दिखाते हुये उनका मूल्य बताना नहीं भूलती।
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वान्या जानती थी कि यह आलीशान महल जैसा घर, महंगे फर्नीचर, गहने, कपड़े, आये दिन की पार्टियां राघव की रिश्वत की ही कमाई है लेकिन वह कुछ न कहती क्योंकि वह अपना मायका नहीं छोड़ना चाहती थी। राघव उसको रक्षा बंधन और भाई दूज पर पॉच सौ रुपये से अधिक कभी न देता जबकि जानता था कि इससे अधिक पैसे तो वान्या के कैब से आने जाने और मिठाई में खर्च हो जाते हैं।
उस पर प्रेयसी उसे अपमानित करते हुये कहती – ” वान्या, मेरे घर अच्छे और मंहगे कपड़े पहनकर आया करो। मुहल्ले वाले देखते हैं तो बातें बनाते हैं। उस दिन एक भाभी कह रही थीं कि तुम्हारी ननद तो सौ- दौ सौ रुपये वाली साड़ी पहनती है और हर बार वही पहनकर आ जाती है।”
वान्या हर बार ऑखों में ऑसू भरकर लौटती। मन करता कि तोड़ दे ऐसे रिश्ते को जिससे बार बार इन घमंडी और पैसे के गुरूर में चूर लोगों के पास न आना पड़े लेकिन मम्मी की याद आ जाती – ” बेटा, राखी और रोचना कभी न छोड़ना। मेरे बाद इन्हीं लोगों से तुम्हारा मायका रहेगा। कैसा भी हो भाई है तुम्हारा?”
कभी प्रेयसी अपनी पुरानी साड़ियाॅ वान्या के सामने रख देती-
” ये साड़ियां लेती जाओ वान्या। मैं अब इन्हें नहीं पहनती। बहुत मंहगी हैं, फेंक भी नहीं सकती।”
वान्या के लिये बोलना जरूरी हो जाता – ” नहीं भाभी, मेरे पास जो है मैं उसमें ही सन्तुष्ट हूॅ।”
उसके बड़े भाई राघव ने पत्नी को तो नहीं कहा कि मेरी बहन को पुरानी साड़ियां क्यों दे रही हो बल्कि वान्या से ही कहा – ” इतनी अच्छी साड़ियां दे रही है तुम्हारी भाभी और तुम नखरे दिखा रही हो? तुम तो खरीद नहीं पाओगी फिर किस बात का गुरूर है तुम्हें?”
इसके बाद भी वान्या ने केवल इतना ही कहा – ” गुरूर की बात नहीं है भइया, मुझे नहीं चाहिये।”
फिर राघव ने प्रेयसी से कहा – ” ठीक है, आज के बाद कुछ भी देने की जरूरत नहीं है?”
फिर वह बड़बड़ाते हुये बाहर चला गया – ” पिताजी तो कुछ छोड़ कर नहीं गये, किसी तरह मैं निभा रहा हूॅ तो इसके नखरे ही खतम नहीं होते।”
न जाने ऐसी ही कितनी बातें आज प्रेयसी को याद आ रही थीं, जब पैसे के गुरूर में उसने वान्या को नीचा दिखाया था। वह तो समझती थी कि उसके अच्छे दिन कभी समाप्त नहीं होंगे। रिश्वत के बल पर वह हमेशा सुख और वैभव के पालने में झूलती रहेगी लेकिन समय पलटते देर नहीं लगती।
राघव का जूनियर रिश्वत लेते हुये पकड़ा गया तो पुलिस के दबाव में उसने बता दिया कि वह राघव को पैसे पहुॅचाने का माध्यम भर है। रात में राघव के घर छापा पड़ा और पुलिस उसे पकड़ कर ले गई। उसके और प्रेयसी के सारे बैंक खाते सील कर दिये गये। एक कमरा और बाथरूम छोड़ कर पूरा घर भी सील कर दिया गया।
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सुबह ऑफिस जाने के पहले सोहन ने पढ़ने के लिये अखबार उठाया तो वान्या को फोन किया। ( वान्या ने अपने सास – ससुर को बुढापे में अकेले छोड़ कर सोहन के साथ जाने से इंकार कर दिया था और अब उन्हीं के साथ रहती थी।)
सुनते ही वान्या सब कुछ भूलकर प्रेयसी के पास आकर अपने साथ ले गई। प्रेयसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आज जब उसके मायके वाले, दोस्त, सहेलियॉ, मुहल्ले वालों ने आना तो दूर एक फोन तक नहीं किया, उस समय वान्या जिसका पैसे के गुरूर में सदैव अपमान किया है, वह न केवल उससे मिलने गई बल्कि अपने घर ले आई।
उसे याद आ रहा था जब राघव नगद या उपहार के रूप में रिश्वत लेकर घर आता था तो वह और उसके बच्चे बहुत खुश होते थे। उसकी और उसके बच्चों की महत्वाकांक्षायें सुरसा के मुॅह की तरह बढ़ती ही जा रही थीं साथ ही बढता जा रहा था उन सबका पैसे का गुरूर और अहंकार।
उसने कभी राघव को इस गलत कृत्य के लिये रोकने या मना करने का प्रयास तो किया नहीं बल्कि बढ़ावा ही देती थी – ” आजकल सब लोग थोड़ा बहुत ऊॅच नींच तो करते ही हैं, फिर तुम किसी से जबरदस्ती तो करते नहीं हो, लोग खुशी से दे जाते हैं तो लेने में क्या हर्ज है? यह तो सुविधा शुल्क है जो लोग अपना काम जल्दी करवाने के लिये तुम्हें दे जाते हैं।”
जितना प्रेयसी सोंच रही थी उतना ही उसके सामने खड़ा उसका गुरूर अट्टहास करता जा रहा था। तभी कमरे में वान्या आ गई- ” भाभी, उठो चाय पी लो। इस तरह सोचने से कुछ नहीं होगा।”
” बिल्कुल मन नहीं है वान्या। तुम्हारे साथ कितना गलत करते रहे हम सब और वक्त ने तुम्हारा ही आश्रित बना दिया है।”
वान्या ने प्रेयसी को गले से लगा लिया – ” ऐसे मत कहिये भाभी। विपत्ति में अपनों को ही आगे बढकर सहारा देना चाहिये। आप चिन्ता मत करिये, ईश्वर कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। जो हम लोग खायेंगे, वही आप लोग खायेंगे। जैसे आरव रहेगा वैसे ही ये दोनों बच्चे भी रहेंगे। “
वान्या के तसल्ली देने के बाद भी प्रेयसी ग्लानि और शर्म से सिर नहीं उठा पा रही थी।
बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर