नफरत की दीवार – अमिता कुचया : Moral Stories in Hindi

रजनी आफिस जाने वाली होती है, तभी रोशनी टिफिन पैक करके कहती -” सुनो रजनी आज पूरा टिफिन खत्म करके आना, तुम्हारी फेवरेट भरवां भिंडी बनाई है। ” इतना सुनते ही रजनी कहती-” अरे वाह भाभी आज तो खुब दबाकर खाऊंगी, क्योंकि आपसे अच्छी भिंडी तो कोई बना ही नहीं सकता।तब रोशनी खुश होकर कहती – हां हां खुब अच्छे से खाना,आज मैंने दो रोटी ज्यादा ही रख दी है, साथ में दही भी रख दिया है, और सुनों किसी और को मत खिलाना। ठीक है भाभी…. 

अच्छा,भाभी मुझे देर हो रही है ,मैं निकल रही हूँ ,खनकती आवाज कहती है, जैसे ही किचन से टिफिन उठाती है , तभी ठंडी चाय का कप उसे दिखता है कि भाभी ने काम की वजह से चाय ही नहीं पी है। वह तुरंत कहती- भाभी एक मिनट बैठो ना… तब रोशनी कहती है- क्या हुआ रजनी ,क्यों बैठने कह रही है….. मुझे कितना काम है, बस भाभी एक मिनट…..और चाय गरम करके उसे देती है और ये लो…भाभी आप सबका ध्यान रखो और अपना ही न रखो ,ये भी कोई बात हुई , पहले मेरे सामने चाय खत्म कीजिये, नहीं तो काम के चक्कर फिर चाय कहीं ठंडी न हो जाए। 

इस तरह दोनों रोशनी रजनी में आपसी तालमेल देखकर बुआ जी को लगता है इन दोनों में कितनी पट रही है। पता नहीं इस घर में इतनी शांति और प्यार कैसे!!!

थोड़ी देर बाद रजनी के आफिस जाने के बाद रोशनी से शांति बुआ कहती – बताओ रजनी को तो देखो न तो उसे चाय नाश्ते को बनाने की फिक्र है, न खाना बनाने की फिक्र, न घर के और कामों की फिक्र…! 

एक तू ही है जो चकरी की तरह दिन -रात काम करती रहती है, तुझे चाय नाश्ते की क्या, खाने की फुरसत तक नहीं है। और रजनी का क्या है…मेम साहब जैसी तैयार हुई ,चल दी आफिस…. 

इतना सुनते ही रोशनी कहती – बुआ जी ऐसी बात नहीं है, रजनी भी कितना कुछ करती है, सुबह की पूजा ,रात का खाना और बाहर के सारे काम, जैसे बैंक के काम, घर के सामान लाने का काम भी करना आसान है क्या बुआ जी…. हम दोनों घर गृहस्थी को इसी तरह चलाते रहे और हमें क्या चाहिए…. हम दोनों के पति खुश रहे और क्या….. 

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इतनी बात सुनकर उनकी तो जैसे बोलती ही बंद हो गयी…. 

वो कुछ कह न पाई। 

अब तो बुआ जी के अंदर तो खलबली मच रही थी। कि दोनों जेठानी और देवरानी में इतनी पटती कैसे है। वो अपने नाम के विपरीत थी, वो केवल शांति नाम की ही थी, पर उनका मन शांत कहां रहता…उनके मन में विचार आया कि क्यों न रजनी के मन को टटोलू देखे रजनी अपनी जेठानी के बारे में क्या कहती है!!! 

अब जैसे ही रजनी शाम को आफिस से लौटते है और लौटते ही रोशनी को जरुरी सामान का थैला देती है, साथ ही उसकी पसंद की पत्रिका भी देती है। लो भाभी आपकी इस महीने की मेरी सहेली पत्रिका आपको पसंद है ना मैं इसे ले आई…. 

पत्रिका लेते ही पेज को पलटने का उतावलापन उसकी खुशी जाहिर कर रहा था। अरे वाह रजनी , इस बार तुम ये मेरी सहेली मैगज़ीन जल्दी ले आई, मुझे तो इसका बेसब्री से इंतजार रहता है। 

हां हां भाभी आपके लिए थोड़ा बहुत ही कर पाती हूं। आप न हो तो मेरा जीवन ही भागदौड़ की आपाधापी में निकल जाए, मैं अपने साथ की लेडी वर्कर को देखती हूँ कि वे घर और बाहर के कामों से तनाव में रहती है। 

कम से कम आप है तो मैं घर से निश्चिंत हूं। मुझे घर की टेंशन तो नहीं है।

 तभी रोशनी कहती- रजनी फ्रेश होकर बैठ मैं तेरे लिए चाय लाती हूं। तभी बुआ जी रजनी को बुलाकर कहती- रजनी बहू ,ओ रजनी बहू ,तू दिन भर आफिस का काम करके थक जाती होगी। फिर लौटते में घर का सामान लाना। और फिर मैगज़ीन रोशनी के लिए लेने जाना, इसकी क्या जरूरत थी? 

 तभी रोशनी और रजनी की सास रमा जी भी वही आ जाती है। उनकी बातें वे सुन लेती है तब वो कहती-ये क्या शांति दीदी मेरी बहूओं को क्यों भड़का रही हो आपको हमारे घर की शांति रास नहीं आ रही है क्या… 

एक तो आप अपने घर पर शांति से रहते नहीं हो और हमारे घर में भी अशांति फैला रही हो। तब रजनी कहती – बुआ जी मैं रोशनी भाभी की वजह से काम कर पा रही हूं, नहीं तो मेरा भी फर्ज है वो जितना काम करती है ,उतना ही काम मैं भी करु। पर आफिस के कारण मैं नहीं कर पाती, बुआ जी आप हम दोनों के बीच नफरत की दीवार तो मत खड़ी करो,हम लोग एक दूसरे को नहीं समझेगें तो कैसे चलेगा। 

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तभी रमा जी कहती -देखो शांति दीदी मेरी दोनों बहूओं में अच्छा तालमेल है,तभी तो किसी को परेशानी नहीं है। आप क्या चाहती हो दीदी?? लड़ाई झगड़ा हो, धीरे धीरे आपके घर जैसा हमारे घर का माहौल हो जाए, आपकी इन्हीं आदतों के कारण आपका बेटा आपको साथ नहीं रखता ,वो दोनों आपसे अलग हो गये। अब जीजा जी रहे नहीं तो कभी बेटी के घर या फिर और रिश्तेदारों के घर आपका आना जाना लगा रहता है। 

जब मैं दोनों बहूओं के बीच में नहीं पड़ती हूं तो आपको क्या..!!! मुझे सुबह रोशनी ने बताया तो मैंने ध्यान नहीं दिया। पर अब और नहीं…यहाँ अब नफरत की दीवार खड़ी करनी की कोशिश मत करो। 

क्योंकि आप बड़ी है, तो लिहाज कर रही हूं। नहीं तो आपके भैया को पता चला कि आप दोनों बहूओं के बीच फूट डाल रही हो तो कहीं आपके और उनके संबंध ही खत्म न हो जाए इसलिए हमारे यहाँ जैसा चल रहा चलने दीजिये। 

तभी बुआ जी कहती-अरे भाभी हमारी कोई ऐसी मंशा नहीं है ,हम तो बहूओं को परख रहे थे। 

तभी रोशनी बोली -बुआ जी आपकी अपने घर में किसी से नहीं बनती तो क्या हमारे भी आपसी संबंध खराब हो जाए। आप अपने घर के बारे में सोचों ,हमारे घर की हम संभाल लेगें। आपका बुढ़ापा सुधर जाए ऐसे आपसी रिश्तों को बनाओ, ना कि नफरत की दीवार खड़ी करो। पता चले आप किसी से मिलने भी जाए तो कहीं कोई बाहर रास्ता न दिखा दे। 

तब वो सकपकाकर अरे रोशनी बहुरिया तुम कैसी बात कर रही हो हम तो यही चाहते हैं कि तुम लोग खुब मिलकर रहो। और हम भी अपनी गलती की माफ़ी भी अपने बेटे से मांग लेगें वो तो मैं बेटी के मोह में कुछ ज्यादा ही अपनी बहू से उलझ पड़ी। रमा भाभी अब तुम भी देखोगी कि हम अपने व्यवहार में कितना बदलाव लाते है। अगले दिन सुबह वह अपने बेटे के घर चल दी। 

कुछ दिन बाद पता चला कि शांति बुआ अपने बेटे बहू के साथ मिलकर रहने लगी।

 

स्वरचित मौलिक रचना

अमिता कुचया 

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