मुआवजा…- शुभ्रा बैनर्जी  : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi  : वैसे तो पारुल दीदी सुषमा की सगी जिठानी नहीं थीं,पर एक ही मोहल्ले में सालों से साथ रहते-रहते उनमें बहुत प्यार था।सुषमा ने उनके तीनों बच्चों को पढ़ाया था।बड़ी और छोटी बेटी की शादी उनके पति के रिटायर होने के पहले ही हो गई थी। रिटायरमेंट के बाद दोनों पति पत्नी बैंगलुरू अपने बेटे के पास आ गए थे।

सुषमा का बहुत मन था उनसे मिलने का,तभी एक दिन अचानक दीदी का फोन आया कि बेटे की शादी पक्की हो गई है।सुषमा को अवश्य आना होगा।सुषमा भी अपनी मनचाही मुराद पूरी होती देख बहुत खुश थी।

विवाह कन्या पक्ष और वर पक्ष सम्मिलित होकर एक ही होटल में कर रहे थे।होटल पहुंचते ही दीदी की छोटी बेटी दीपा लेने आई।उसकी शादी हुए बारह साल हो चुके थे। फार्मेसी और‌ एम बी ए कर चुकी थी।तीन साल का बेटा था उसका।उसे अकेले देखकर सुषमा ने पूछा”अरे दीपू,बेटू कहां हैं?सौरभ(पति) कहां हैं?”हम लगभग दो साल पहले ही मिले थे।

दीपू ने मुस्कुराते हुए कहा”काकी तुम पहले फ्रेश तो हो लो,फिर बात करेंगे।”सुषमा नहा धोकर नाश्ता करके फुर्सत होकर‌ कमरे में अकेली ही बैठी थी,तभी दीपू जल्दी से कमरे में आई और दरवाजा लगाकर लिपट पड़ी।दहाड़ मार-मार कर‌ रोने लगी।उसे इस तरह रोते देखकर‌ सुषमा डर गई कि कहीं शादी में कोई अड़चन तो नहीं आ गई।

उसकी पीठ पर हांथ‌ फेरकर सुषमा ने उसे शांत किया।गोद में लेटकर मानो दीपू अपना सारा‌ दर्द बाहर निकाल‌देना चाहती थी।सुषमा ने डांटा तब”चुप,कितना रोएगी और?आंसू सूख जाएंगे तेरे। बताना चाहती है तो बता न अपनी काकी को मन की बात ।”दीपू ने आंसू पोंछते हुए कहा”हां मैं तो भूल‌ही गई थी,यू हेट टियर्स न।”

दीपू बताने लगी अपनी जिंदगी का वह काला सच ,जो माता-पिता और भाई बहन के‌अलावा‌कोई नहीं जानता था।दीपू ने अपनी पसंद के सजातीय लड़के से शादी की थी।ससुर मुंबई में बैंक मैनेजर थे।सास सुशील और‌शालीन।बहू को बेटी से कम नहीं समझा कभी उन्होंने।बड़ी कोठी है भागलपुर में।जेठ और जेठानी गुजरात में रहते हैं।सुषमा ने पूछा “तो परेशानी क्या हुई बता‌ न?”

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” काकी सौरभ सुंदर सुशील था पर उसके साथ रहते पता चला कि किसी और लड़की से उसके संबंध हैं।ठीक है‌ पहले था जो था।वह तो अब भी उसके पास जाता‌ है।हर समय बस पैसे मांगता‌है,और शराब पीकर मार पीट करता है।मैंने दो साल सहा यह सब कि सुधर जाएगा बच्चे‌ के आने से।पर अब तो वह बच्चे को हथियार बनाना चाहता‌है,मुझसे पैसे ऐंठने के लिए।मैं पहले तो किसी को कुछ नहीं बताई ,पर‌जब अति होने‌ लगी,मैं मां के पास आ गई।

न ये लाने आएऔर‌ ना कोई बातचीत करने को राजी हुए।कुछ दिनों के बाद सास ससुर आए थे साथ ले जाने पर मैं किसके भरोसे‌ जाती।फिर भी मां ने समझाया तो मैं गई।वही रवैया ,कुछ भी नहीं बदला। चरित्र तो गिरवी रखा हुआ था उस लड़की के पास।मुझे घिन आने लगी।मैं किसी तरह निकल आई और केस कर दिया।

बच्चे का धौंस दिखाने लगा जब कि तेरे पास रहने नहीं दूंगा।तब मैंने फैसला लिया तलाक लेने का और उस बच्चे को भी उसे सौंप दिया।जिसके पिता ने अपनी पत्नी से सौदा ही किया है,अब मैं उसके लिए कोई‌जरिया ही नहीं छोड़ना‌चाहती।काकी फैसला मेरे पक्ष में हुआ। ससुराल से मुझे जो भी रकम मिली मैंने बैंगलुरू में कुछ लोन लेकर‌ एक अलग घर ले लिया‌है।”

सुषमा इन घटनाचक्र से अनभिज्ञ थी।थोड़ा संयम होकर बाहर जाकर भाई की शादी की‌ सारी‌ तैयारी करने लगी।आंखों में एक‌भी आंसू नहीं था।मैं विस्मित सी सोच रही थी ।कितना साहस का काम किया दीपू ने।बेटे को उसके पिता के पास सौंपते समय कलेजा नहीं कांपा होगा उसका?

हे ईश्वर इसका विधान करना।कुछ तो बहा दिए मेरे सामने,बाकी तो अंतरात्मा को बांधते रहते होंगे।सारे रिश्तेदार, जान-पहचान वाले‌ अप्रत्यक्ष रूप से कभी उससे कभी मां से पूछते”भाई की शादी में सारी रस्म तो तुझे करनी पड़ेगी।दादाद होते तो अच्छा होता।बिना विचलित हुए वह कहती मैं हूं ,मैं सब कर दूंगी।

मैं तो गवाह थी उन अनबहे आंसुओ कि जो उसने आंखों से निकलने ही‌ नहीं दिया।उनकी एक बुआ‌ कहने लगी”इसी‌के लच्छन ठीक नहीं होंगे।अब पड़ी रहेंगी ज़िंदगी भर मायके।कैसी‌पत्थर मां है‌,बेटा तक‌ दे दिया।अरे इसे शादी‌ब्याह के बंधन में बंधना ही‌नहीं था।”और भी बहुत कुछ सुनती रही वह।सुषमा ने वादा लिया था उससे अब नहीं रोएगी।

भाई का अमंगल होगा।दीपू भाई की शादी की सभी जिम्मेदारियों को बडे़ अच्छी तरह से निभा रही थी।जब सुषमा देखती उसकी तरफ तो झट पूछती””काकी ,ये आंसू बिना बहे अगर मेरी आंख में जमे रहे गए ,तो मैं बिल्कुल खत्म हो जाऊंगी।”सुषमा ने उसे समझाया “देख दीपू,, ज़िंदगी बहुत बड़ी है।देखना इसका अगला हिस्सा बहुत अच्छा होगा।”

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काकी तुम्हें देखकर तो मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है।पर यह,, दर्द मेरे सीने में लावा की  तरह दहक रहा ।”

देख दीपू आंसुओं को बहाने से कुछ नहीं होता।,इन आंसुओं को डाल दें भगवान के चरणों में।देखना समक्ष बदलेगा तेरा भी।तुझे किसी को जवाब देने की जरूरत नहीं।इतना बड़ा और सही फैसला‌लेने के लिए हिम्मत चाहिए,जो है‌ तुझमें।दीपू के भाई की शादी धूमधाम से हो गई।उसने अपने लिए घर‌ले लिया‌ एक‌छोटा सा।सामने ही भाई के फ्लैट के।अच्छी नौकरी कर रही थी पिलानी में,नौकरी छूट गई।उसने बताया कि मां और मौसी को लेकर बनारस, उज्जैन गई है घूमने।हमेशा पूछती “काकी मेरे आंसू ईश्वर ने संभाल कर‌ रखे‌ होंगे ना?और सुषमा उसे भरोसा दिलाती,”जब तक अंत अच्छा ना हो, पिक्चर अभी बाकी है दोस्त(ओम शांति ओम का डायलॉग)

अभी कुछ ही दिन हुए थे कि पारुल‌दीदी का फोन आया”सुषमा दीपू की शादी तय हो गई है,यहीं पास में रायपुर में।”

अरे वाह! इससे अच्छी खबर कुछ हो ही नहीं सकती।दीपू ने सख़्त हिदायत दी थी आने की।लड़के का कंस्ट्रक्शन का काम है।दो बहनें हैं। माता-पिता नहीं हैं। पत्नी किसी कारण वश डिलीवरी के समय जो गई तो वापस ही नहीं आई।अवसाद के समय बहन और जीजाओं ने बहुत संभाला‌दीपू के पति को।दीपू की ननद ने विनती की “कि हमें हमारे वंश का वंशधर दे दो तुम बस।नहीं तो हमारे कुल का कोई वंश नहीं रहेगा।

दीपू की शादी में तो जाना नहीं हो पाया ।अब पारुल दीदी फोन में बता रहीं थीं कि बेटी की डिलीवरी के समय दीपू तुम्हें चाहती है अपने साथ।सुषमा ने कहा कि कोशिश करूंगी पर भरोसे से नहीं कह सकती।पर ईश्वरीय शक्ति का कोई पार‌ ना पाया शायद सुषमा पहुंच ही जाएं दीपू के पास। आंसुओ को ईश्वर के पास सौंपने का फल मिला। मोती दे दिए ईश्वर ने  उन आंसुओं के बदले।ईश्वर कभी हमारा नुकसान नहीं करते।अभी समय है डिलीवरी में।पति रानी की तरह रखता है उसे।जो कि हर रात पति की मार‌खाती थी,पैसे के लिए।उसकी गोद से बेटे को छुड़ा ले गए।कितना कलपी होगी दीपू।और आज भगवान हर आंसू का मुआवजा दे रहा।

#आँसू

शुभ्रा बैनर्जी 

 

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