“सुमित ऐसा नहीं सोचते बेटा, टीचर, कभी भी अपने स्टूडेंट को आंखों से नहीं गिराते। वो तो बस हमारे नैतिक ज्ञान की कीमत को समझाने के लिए हमें दंडित करते हैं। ताकि हम दुबारा वो गलती नहीं करें। समझ सकें हम कि, गलती करने पर सजा मिलती है, पुरस्कार नहीं।
” “वो बात ठीक है मम्मा, पर मैं सच में यूनिट एग्जाम मैं चीट नहीं कर रहा था। वो रिवीजन का पेपर बस मैं गलती से बैग में रखना भूल गया था। और मेम ने जब सर्च किया तो मेरे पॉकेट से वो पेपर निकला, और मुझे दोषी समझ बैठी। साथ में उसी समय मुझे दूसरा सेट भी
हल करने दिया गया, और मेरी सफाई देने के बावजूद, पंद्रह दिन का स्कूल से संस्पेंशन। मम्मा, मैं टीचर के नजरों में गिर गया, बिना गलती के ही।” सुमित रूआंसा सा अपनी माँ संगीता को स्कूल से आने के बाद बता रहा था। संगीता ने प्यार से सुमित के सर पर हाथ फेरा, उसे गले से लगाया
और समझाने लगी,…”बेटा माँ-बाप, हमारे बड़े, हमारे शिक्षक सभी मिलकर हमें अनुशासन, ज्ञान, सही-गलत में फर्क, हमें अच्छे से और इज़्ज़त की ज़िंदगी जीने का ढंग सिखाते हैं। देखो सुमित, अब तुम नवमी कक्षा में आ चुके हो, पढ़ाई के साथ-साथ तुम्हें, अन्य चीजों के लिए भी केयरफुल,
जागरूक और समझदार होना होगा। मैं मानती हूँ, तुमने चीटिंग के लिए चीट पास में नहीं रखा था, पर असावधानी तो हुई न? बेटा, अब आगे से ऐसी असावधानी तुमसे बिल्कुल नहीं होगी, परीक्षा में जाने से पहले तुम खुद को चेक करके जाओगे। देखो बेटा, मात्र पंद्रह दिन के संस्पेंशन से तुम्हें कितनी बड़ी सीख मिली।
तुम आगे के लिए जागरूक रहोगे, खुद का ध्यान रखोगे। बेटा समय और खुद के साथ सामंजस्य बैठना बहुत जरूरी है। तभी हम अच्छे और, समझदार इंसान बन सकते हैं। और रही बात स्कूल की पढ़ाई का तो…अपने दोस्तों से सारे काम मांग लेना।” सुमित जो किशोरावस्था में,
स्कूल की सजा से उत्तेजित हो रहा था, अपनी माँ की प्यार और समझदारी भरी बातें सुन शांत हो गया। “ठीक है मम्मा, अपने मुझे गलत न समझा न, खुश हूँ मैं। और आप सच कह रही हैं, आगे मैं बिल्कुल सजग और जिम्मेदार रहूंगा।” माँ ने प्यार से गले लगाते हुए कहा, “ये हुई न मेरे राजा बेटा वाली बात, चलो अब खाना खा लो।” सुमित सामान्य होकर खाना खाने लगा।
चाँदनी झा