” मर्यादा ” – सीमा वर्मा

 हिमांशी अकेली सैर कर रही हो साहिल नहीं आता है तुम्हारे साथ ?

‘ नहीं ‘

हिमांशी कुछ समझ नहीं पा रही है, उसके दिल में हजारों सवाल है। वह जितना ही इन सवालों के घेरे से निकलने की कोशिश करती है उतनी ही उलझती जाती है।

साहिल और उसके बीच का रिश्ता पति-पत्नी के जैसा मधुर नहीं है।

उसके लिए हिमांशी सजी-सजाई स्त्री देह मात्र है जिसे वह नित्य नोंचता -खसोटता और दांतों से काटता रहता है। जिसकी गवाही हिमांशी के पूरे शरीर पर पड़े निशान देते हैं।

वह अपने प्रति साहिल के इस मर्यादा विहीन व्यवहार को समझ नहीं पाती है। उसे लगता है उसकी किस्मत उससे आंख मिचौली खेल रही है।

सामने से आ रहे पड़ोस वाले शुक्ला जी और उनकी पत्नी की नजर अकेली बैठी हिमांशी पर पड़ी। दोनों पति-पत्नी हर दम साथ ही रहते हैं उन्हें देख कर हिमांशी सोचती है कुछ लोगों को कैसी सजी-सजाई ज़िन्दगी मिलती है।

और तब उसे अपना खालीपन और भी अखरता है। उन्हें अपनी ओर आता देख कर वह शर्मिंदा सी उठने को तैयार हुई कि ,

– मिसेज शुक्ला ने उसके हाथ पकड़ कर पास ही बैठा लिया

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‘ बैठो तो जरा’  हिमांशी को लगा जैसे चोरी पकड़ी गई हो।

‘ पिछली रात साहिल की कितनी तेज-तेज आवाज आ रही थी तुम कुछ करती क्यों नहीं हो ? ‘

हिमांशी समझ गई अब उसके और साहिल के बीच की बात घर से बाहर निकलने लगी है।

वह कट कर रह गई और कर भी क्या सकती है ?

खून का एक थक्का सा जमता लगा दिल में कल रात की तमाम बातें कानों में गूंजने लगी जब उसने शाम में ही साहिल के बार-बार तंग करने पर टोक दिया था तो वह उसके बालों को उंगलियों में कस कर खींचते हुए चिल्ला पड़ा ,

‘ नो मोर डिस्कशंस ऑन दिस टाॅपिक मुझे चाहिए तो बस चाहिए मेरे प्रति तुम्हारी लापरवाही मुझे एक क्षण भी बर्दाश्त नहीं है ‘

हिमांशी के अंदर छन्न से शीशे की तरह कुछ टूटा था। अंतस के दर्द का असर शारीरिक दर्द से कई गुणा ज्यादा होता है।

— शुक्ला आंटी ,

‘ यूं चुप रहने से हर सवाल हल नहीं होते हैं हिमांशी तुम समझदार हो अच्छी तरह जानती हो ,

‘ विरोध की एक आवाज हमेशा जिन्दा रखनी चाहिए भले ही वह धीमी और बेअसर क्यों ना हो , नहीं तो जुल्म और जो़र-जबरदस्ती सहने की आदत हो जाती है ‘

हिमांशी उठी और आंसुओ से लिथड़ते चेहरे को पोंछती हुई आगे बढ़ गई।

थोड़ी देर बाद अपने घर के दरवाजे पर खड़ी लंबी -लंबी सांसें ले रही थी कि चिर-परिचित सी कर्कश आवाज ,

हिमांशी … हिमांशी कहां हो तुम पार्क में इतनी देर क्या करती हो तुम वहां किसी से प्रेम-व्रेम का तो चक्कर नहीं चला रही हो ?

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क्या मैं अकेला काफी नहीं हूं तुम्हारी गर्मी शांत करने के लिए ‘

उफ्फ … मन ही मन कराह उठी कान में पिघले शीशे जैसी लहूलुहान करती आवाज।

चारों तरफ कांच के टूटे टुकड़ों पर पांव कैसे और किस तरह बढ़ाएं ?

फिर शुक्ला आंटी का मृदुल चेहरा नजर के सामने नाच उठा।

अचानक दृढ़ आवाज में,

‘ क्या बोल रहे हो साहिल, तुम्हारी पत्नी हूं। शब्दों की मर्यादा का तो ख़्याल रखो! ‘

हिमांशी की गर्म आवाज साहिल को कभी नहीं रास आती है। उसने झपट कर उसे अपनी ओर खींच कर बिस्तर पर पटक दिया ,

‘ अभी बताता हूं तुम्हें ‘

हिमांशी जिस गति से बिस्तर पर गिरी उससे भी दोगूने वेग से उठ कर खड़ी हो गई,

‘ लिसन केयरफुली साहिल, मैं ने तुमसे शादी की है पर यह अधिकार तुम्हें नहीं दिया है कि तू यह तय करें कि मैं क्या करूं और क्या ना करूं?

हमारी शादी को अभी दो साल नहीं हुए हैं समझ ले तू और अगर सात बर्षों के अंदर कोर्ट में चली जाऊं तो तेरा क्या हश्र होगा ? ‘

‘ और हां एक बात और तू मुझसे दूर ही रह कर पहले मर्यादा में रहना सीख ले फिर आना मेरे पास तब दिल से स्वागत करूंगी उस वक्त ‘।

सीमा वर्मा/ नोएडा

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