मेम से दीदीजी बन गई – चाँदनी झा  : Moral Stories in Hindi

“ऊषा मन नहीं कर रहा है तो छोड़ दो, अगले बार अच्छी जगह मिलेगी तो प्रमोशन लेना।”  ऊषा के पति अमित ने कई बार समझाया। ऊषा सरकारी विद्यालय में शिक्षिका है, उसका प्रमोशन हुआ, एक स्लम एरिया में। घर से काफी दूर, अविकसित जगह में, जो बाजार से काफी दूर, एक सुदूर देहात में, सुदूर विद्यालय में हुआ है।

विद्यालय भी संसाधन विहिन, और निर्जी अवस्था में है। ऊषा वर्तमान में जिस विद्यालय में कार्यरत थी, वो बाजार में था, काफी चहल पहल, हर चीज की सुविधा। डेरा भी आसानी से मिल गया था, और उसके अपने घर से दस किलोमीटर की ही दूरी थी। ऊषा ने विद्यालय के पास ही किराए का मकान ले लिया था,…और वहीं रहती थी।

वह विद्यालय उत्कृष्ट विद्यालय था। ऊषा के पति गाजियाबाद में काम करते थे, वहीं ऊषा के दोनों बच्चे भी पढ़ते थे। ऊषा अपनी नौकरी के कारण बिहार में ही अपने घर से थोड़ी दूर पर विद्यालय के पास किराए के मकान में अकेली रहती थी। पर कोई परेशानी नहीं थी।

कोई दिक्कत या जरूरत होती थी तो घर से भी लोग तुरंत आ जाते थे। कुल मिलाकर, ऊषा इस विद्यालय में संतुष्ट और खुश थी। विद्यालय के बच्चे भी काफी मिलनसार और जिज्ञासु थे। सहकर्मी सब भी काफी उच्च सोच रखते थे। उच्च सोच क्या, जैसा वातावरण होता है, लोग उसी के अनुकूल तो हो जाते हैं।

वहां के बच्चों की सीखने, समझने की शक्ति का स्तर काफी अच्छा था। सरकारी विद्यालय था, पर अनुशासन निजी विद्यालय को भी मात करता था। पढ़ाई-लिखाई से लेकर हर मामले में वह विद्यालय राज्य स्तर पर नामित था। ऊषा इस विद्यालय की शिक्षिका है, काफी गौरवान्वित महसूस करती थी। विद्यालय के बच्चे, सहकर्मी, रसोईया सब मिलकर स्कूल में स्वच्छ और सुंदर वातावरण बनाते थे।

ऊषा स्कूल के बच्चों से खूब प्यार करती थी तो, बच्चे भी उसपर जान छिड़कते थे। मेम को कोई परेशानी हो तो बच्चे सब काम छोड़ मेम की आवभगत में लग जाते थे। आज मेम का उपवास है कोई हल्ला नहीं करेगा, मेम आज उदास क्यों है? आदि आदि। और जिस दिन मेम छुट्टी पर रहती, बच्चे घर आ धमकते थे मेम कोई परेशानी तो नहीं है?

मेम को कोई जरूरत हो तो सारे बच्चे एक साथ खड़े हो जाते थे। मेम को गिफ्ट, कार्ड, घर की बनी सब्जी, कभी अपने खेत की सबसे अच्छी सब्जी, कभी घर का बना स्वादिष्ट भोजन, कभी फूल, मैडम को बच्चे देते ही रहते थे। खूब मना करती ऊषा, पर बच्चों के प्यार के आगे हार जाती थी। मैडम तो धन्य हो जाती थी बच्चों के बीच।

वहां के अभिभावक के दिलों में भी ऊषा के लिए काफी सम्मान था। पर प्रमोशन के बाद इस विद्यालय को छोड़ना पड़ेगा, और जाना भी कहां है…?अशिक्षित और असुविधा वाली जगह पर। जहां सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है। ऊषा कुछ निर्णय नहीं ले पा रही थी। सहकर्मी तो कह रहे थे, इतनी सुविधा छोड़कर, ऐसी जगह पर जाने का कोई औचित्य नहीं है।

वहां काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। बाजार भी दूर है, और तो और, किराए का मकान विद्यालय के नजदीक मिलना काफी मुश्किल है। आखिर सुदूर गांव में, कोई किराए के उद्देश्य से मकान कहां बनाता है। और विद्यालय भी अच्छी स्थिति में नहीं थी, रविवार को ऊषा ने विद्यालय जाकर  देखा तो मन रोने का करने लगा। ऐसी जगह पर मैं कैसे रह पाऊंगी?

यहां तो न मन मिलेगा मेरा, न किसी को मैं समझ पाऊंगी। वैसे ऊषा को स्कूल के पास कुछ लोग मिले, बात करने से ऊषा को समझ आ गया, अभी ये सौ साल पीछे हैं, वर्तमान दुनिया से। वातावरण भी एकदम उसे अनुकूल नहीं लग रहा था। ऊषा उधेड़बुन में थी, क्या करे, क्या न करे?

वहीं वर्तमान स्कूल के बच्चों,..का मैडम चली जायेगी, सुनकर रो-रो कर बुरा हाल था। ऊषा इस वर्तमान उत्कृष्ट विद्यालय, और नया संसाधन रहित विद्यालय की तुलना करती तो, मन कहता, यहीं रह जाओ, छोड़ दो प्रमोशन, अगले बार अच्छी जगह मिलेगा तो फिर देखा जाएगा। वैसे इस विद्यालय में दस साल हो गया है, तो एक अलग ही लगाव हो गया था।

मन तो उसका भी रो रहा था। और नए विद्यालय में सुविधाएं नगण्य, आखिर जान-बूझकर क्यों परेशानी मोल लेना? पर ऊषा ने बहुत सोच-विचारकर, स्वयं एक चुनौती लेने का फैसला किया। अपने पति अमित से बोली, मन तो नहीं कह रहा, पर एक कोशिश करना चाहती हूँ।

परेशानी तो होगी, पर हर जगह का मजा लिया जाए। आखिर ज़िंदगी सिर्फ सुविधाओं का ही नाम तो नहीं है न। अमित ने कहा, सोच लो अच्छे से, घर से काफी दूर है, और गांव में कोई रहने का ठिकाना विद्यालय के आस-पास मिले या न मिले। और वहां खुद को कैसे ढालोगी, सब सोच-विचार लो फिर कोई कदम बढ़ाना।

ऊषा का अंतर्मन कह रहा था, नई जगह, नए लोग, नया वातावरण, नई चुनौतियां, आखिर ज़िंदगी का असली मजा तो इसी में है। सुविधाओं में तो सब कुछ आसान है, पर मुश्किलों को खुद के अनुकूल बनाना, बेहतरीन है। दिल की बात सुनी ऊषा ने और प्रोन्नति स्वीकार कर लिया।

नए विद्यालय में योगदान देने आई तो, दिल कुछ उदास था,…वहां के लोग उसे अजीब नजर से देख रहे थे, जैसे वो कोई उन लोगों से अलग हो। योगदान तो ऊषा ने कर लिया, पर आस-पास रहने का ठिकाना,,… को लेकर चिंतित थी। एक विशेष बात उस विद्यालय का था कि ऊषा से पहले सभी वहां पुरुष शिक्षक थे, जो अपने वाहन से बीस किलोमीटर दूर बाजार से आते थे। पर ऊषा को बाइक चलाना नहीं आता था, और उतने दूर से आना जाना भी उसे संभव नहीं लगा।

वहां के लोगों से बात किया तो सभी ने दिल खोलकर उसका स्वागत किया। हां, ये बात अलग थी कि वो सब अपनी देहाती भाषा में बात करते थे, या टूटी-फूटी हिंदी बोल पाते थे। सभी लोगों ने कहा,  दीदीजी मेरा घर देख लीजिए, तो मेरे घर में रहिए, आदि, आदि। ऊषा को रहने लायक कोई घर नहीं जँचा।

सभी के घर में कोई सुविधाएं थी ही नहीं। न ढंग की रसोई, न वॉशरूम, घर है पर पानी दूसरे के चापकल या सरकारी नल-जल पर आश्रित। वो कैसे रह पायेगी यहां? उसने सभी ग्रामीण से अपनी परेशानी को बताया। कि उसे स्प्रैट और सुविधा वाला घर चाहिए। यदि है तो बताया जाए।

ग्रामीणों ने उसका साथ दिया, और स्कूल से दो किलोमीटर दूर, एक घर था, जिसमें सारी सुविधाएं थी, और घरवाले दूसरे शहर में रहते थे। ये घर बंद रहता था, वो लोग छुट्टियों या त्योहारों में यहां आते थे। बड़ी मुश्किल से  गांववालों के सहयोग से मकानमालिक, दो रूम किराए पर देने के लिए तैयार हो गया।

ऊषा ने राहत की सांस ली, चलो रहने का ठिकाना तो हो गया। सारा समान ऊषा ने मंगवा लिया, और नई जगह पर….खुद को एडजस्ट करने की कोशिश करने लगी। पहले दिन से ही ऊषा की चिंताएं कम होने लगी थी। इस सुदूर देहात से दूर रहकर जिन मुश्किलों का उसने कल्पना किया था, उतनी भी दुश्वारियां नहीं थी यहां।

यहां उसे एक अजीब सुकून और अपनेपन का एहसास होने लगा था। यहां के लोग, निरक्षर, अशिक्षित, कम विकसित सोच रखनेवाले, शहर से काफी दूर, असुविधाओं से घिरे, कम संसाधनों में रहने वाले जरूर थे, पर दिल के बहुत अच्छे थे। ऊषा को सब काफी सम्मान देते थे। ऊषा समझ गयी थी, यहां जो भी असुविधाएं हो, पर दिल लोगों का काफी बड़ा है।

लोग खुद से ज्यादा दूसरों की फिक्र करते थे। ऐसी बात नहीं है कि एक-दो दिन से ही ऊषा सामान्य होने लगी, पर कोशिश जारी थी, इन लोगों के बीच रहकर ही खुद को सामान्य किया जाए। ऊषा मन ही मन सोचती,… पहला बदलाव, मेम से दीदीजी हो गयी। चलो अच्छा है,…..।

थोड़ा अटपटा लगता था उसे,….पर अचानक तो कुछ बदला नहीं जा सकता है न। यहां के लोगों का रहन-सहन निम्न स्तर का था। ज्यादातर मजदूर वर्ग और निम्न कोटि के लोग रहते थे इस क्षेत्र में। सरकारी सुविधाएं लगता है, सबसे बाद में यहां पहुंचती होगी। ऊषा वहां के लोगों को समझने का प्रयास करती।

धीरे-धीरे उनकी जिंदगी को नजदीक से देखा ऊषा ने,….तो अच्छा लगने लगा उसे, क्योंकि, बाजार से बहुत ज्यादा अपनापन छुपा था यहां के लोगों में। इस गांव में एक अजीब अपनापन था। अब बात उस विद्यालय के बच्चों का, मैले-कुचले, दबे सहमे, अजीब सी चमक आंखों में,….पढ़ाई में बहुत पीछे।

शर्म, झिझक जैसे उनका गहना हो। विद्यालय आना, जाना बस एक कर्तव्य हो। बात भी बच्चे अपनी भाषा में ही करते थे। सभी शिक्षक तो वहां के वातावरण में ढल चुके थे, और बदलाव की कोई संभावना से उन लोगों को कोई लेना-देना नहीं था। पर ऊषा चाहती थी, मौका मिला है उसे बदलाव करे वो, इस क्षेत्र का, वो जहां पहले विद्यालय में थी, वो तो पहले से विकसित था, ज्यादा बदलाव का मौका कहां मिला उसे।

पर….यहां कुछ कर सकती है। उसने खुद से वादा किया, वह यहां बदलाव करेगी, और उसके संकल्प के साथ वहां के लोगों ने खूब साथ दिया ऊषा का। ऊषा अकेली रहती थी, पर….वहां के लोग उसे अकेला महसूस नहीं होने देते थे। हर पर्व-त्योहार में उसे शामिल कर ही लेते थे।

बच्चे,….जब ऊषा ने बच्चों पर प्यार बरसाना शुरू किया तो, बच्चे ऊषा से ऐसे चिपके रहते, जैसे सगे से भी सगा हो। घर की बनी चीजें, अपने पसंद के चॉकलेट, बच्चे दीदीजी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते। बस यहीं से ऊषा ने बदलाव करना शुरू किया, बच्चों को डांटकर, या शर्मिंदा कर नहीं, खेल-खेल में दुनिया से अवगत करने लगी।

हिन्दी में हम बात करने की कोशिश करेंगे। ऊषा ने बच्चों से कहा, आपकी मातृभाषा(क्षेत्रीय भाषा) बहुत प्यारी है, पर आपको शहर जाना पड़े, तो वहां आपकी भाषा कोई नहीं समझेगा तो आपको दिक्कत होगी न? इसलिए हम अंग्रेजी बाद में सीखेंगे, पर पहले हिन्दी बोलना जरूर सीखेंगे। ऊषा का बदलाव रंग ला रहा था।

बच्चों खुद को विकसित करना चाह रहे थे। और ऊषा के साथ थे। ऊषा ने स्वच्छता की बातें समझाई, तो बच्चे विद्यालय साफ रखने लगे, कपड़ों की सफाई पर भी ऊषा ने ध्यान दिलवाया। समय की महत्ता, और रोज पढ़ना हमारे लिए कितना जरूरी है। ऊषा ने देखा, बच्चे बहुत जल्दी विकास कर रहे हैं।

बच्चों में बदलाव से उस गांव में ऊषा की महत्ता और बढ़ गयी।  ऊषा बच्चों की प्यारी दीदीजी बन गयी थी। ऊषा पहले वाले विद्यालय को अब भूलने लगी थी। पुराने विद्यालयों की सुविधाओं से उसका मोह भंग हो चुका था। और यहां की असुविधाओं से प्यार……उसे जब कभी इस सुदूर देहात में कोई परेशानी महसूस होती तो, वहां रहनेवाले लोगों के जीवन की कल्पना करती और खुद को सामान्य कर लेती थी।

अब बच्चे पढ़ने लगे थे, बच्चे अब हल्ला कम करते थे और जिज्ञासु ज्यादा हो गए थे। ऊषा को यहां कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। बच्चे खूब घुल-मिल गए थे। बच्चों में अनुशासन और पढ़ाई के पार्टी उत्सुकता देख ऊषा प्रफुल्लित होती। उस क्षेत्र के अभिभावक भी सर आंखों पर रखते थे ऊषा को।

खूब मान-सम्मान और इज़्ज़त और शोहरत मिल रहा था यहां। बच्चे अपनी सारी बातें बताते ऊषा से, खूब सीखते और खूब बातें करते थे। विद्यालय का माहौल बदल गया था। पढ़ाई के स्तर में, बात-चीत, तौर-तरीके भाव सब बदलने लगा था बच्चों का। बच्चों को ऊषा प्रोत्साहित करती, तो बच्चे भी खूब मन लगाकर खुद में सुधार कर रहे थे।

ऊषा वहां के बच्चों और ग्रामीणों के लिए प्रेरणा बन गयी थी। अच्छी और बहुत प्यारी दीदीजी का उसे तमगा मिल गया था। वो जिधर से गुजरती, सभी उससे बातें करते और सम्मान देते थे। इस गांव में उसने महसूस किया कि, भेद-भाव नाम की कोई चीज है ही नहीं। सभी के दिलों में सिर्फ प्यार है।

इसलिए बहुत सारे संसाधनों के अभाव के बावजूद यहां के लोगों को जीवन गुजरने में ज्यादा परेशानी नहीं होती है। गांव वाले ऊषा के लिए हर मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। ऊषा को नए विद्यालय में योगदान करने से पहले सबने समझाया था, देखो,….वहां असुविधाओं के ढेर में, अशिक्षित और अनपढ़ क्षेत्र में खुद को नहीं ढाल पाओगी।

प्रोन्नति का मोह छोड़ दो, नहीं तो ये सुविधाएं छूट जायेगी। पर ऊषा ने दिल की सुनी और यहां योगदान कर देखा,….महसूस किया। भले यहां के लोगों के पास संसाधनों का आभाव है, शिक्षा से काफी दूर हैं, जीने का स्तर निम्न है, पर….दिल बहुत बड़ा है यहां के लोगों का। इतना बड़ा कि, आज बच्चे उसके एक साल पूरा होने का जश्न मना रहे हैं, विद्यालय में केक काटकर।

कब, कैसे एक साल बीत गया, इन लोगों के प्यार के आगे पता ही न चला? मेम केक काटिए न, श्वेता, कोमल, शिवम और सारे बच्चों ने जब एक साथ कहा तो, अतीत से निकल, भींगे आँखो को पोछते हुए ऊषा ने चाकू उठाया, केक काटा और सारे बच्चों को अपने हाथों से खिलाया।

बच्चों ने भी मेम को केक खिलाया, और खुश इतने हो रहे थे जैसे उन्हें कोई खजाना मिल गया हो। कितने प्यारे और मासूम हैं ये बच्चे? और यहां के लोग भी छल-कपट रहित,….अपने फैसले पर नाज हो रहा था ऊषा को। जगह छोटा कह सकते हैं, पर लोगों का दिल यहां काफी बड़ा, फिर मैं भी क्यों न,…इनकी खुशियों में शामिल होकर खुश रहूँ। इसी सोच के साथ ऊषा ने भी अपना दिल बड़ा किया, और सारे बच्चों को अपने आगोश में समेट चूमने लगी। 

लेखिका : चाँदनी झा

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