मैं हर जन्म ईश्वर से बेटी ही मांगूगी – शुभ्रा बैनर्जी : Moral Stories in Hindi

सीमा पढ़ाई में शुरू से ही बहुत होशियार थी।सभी कक्षाओं में प्रथम स्थान पर आती थी।रमेश जी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था,बेटी की कुशाग्र बुद्धि और विवेक देखकर। हायर सेकंडरी की परीक्षा समाप्त होते ही उस क्षेत्र के विधायक‌ ने रमेश जी से विनती की कि सीमा उनके नाती को घर पर एक घंटा ट्यूशन पढ़ा दे। रमेश जी सहमत नहीं थे।वे अभी नौकरी कर ही रहे थे,फिर बेटी को ट्यूशन पढ़ाने जाने की क्या जरूरत है? उन्होंने सीधे कल मिलकर मना करने का मन बना लिया।सीमा,जो तब खुद ही छोटी थी

उत्साहित होकर पिता से बोली”पापा,एम एल‌ ए हैं शर्मा जी।कल को अगर किसी बात पर अड़ा गए तो मुश्किल हो जाएगी।जाने दीजिए न मुझे।एक घंटे की ही तो बात है।”रमेश जी ने कहा”ठीक‌ है बेटा,पर अपने सिद्धांतों पर ही काम करना।”सीमा समझ गई थी जो पिता‌ ने बोला वह और जो बोल न पाए वह भी।सीमा के पढ़ाने से एम एल ए जी के नाती में काफी सुधार आ रहा था। देखते-देखते दो साल हो गए।अब वह बच्चा सीमा से बहुत खुल गया‌ था।समय पर गृह कार्य पूरा कर लेता था और उसकी स्मरण शक्ति भी बढ़ रही थी।

शर्मा जी सीमा से बहुत खुश थे।फीस के नाम पर तब सौ रुपए मिलते थे सीमा को,जो उसके लिए बहुत थे।एक दिन सुबह कॉलेज चले जाने के बाद पता चला‌ कि पापा को घर पर ही दिल का दौरा पड़ा है। अस्पताल ले जाने का समय ही नहीं मिला।सीमा के पहुंचने से पहले ही पापा  जा चुके थे।

सीमा अब घर की बड़ी बेटी ही नहीं मुखिया बन गई थी। शर्मा जी ने उस बुरे दौर में सीमा की नौकरी लगवा दी एक विद्यालय में।सीमा घर पर ट्यूशन भी पढ़ाती थी।इससे घर खर्च बड़ी मुश्किल से चलता था।जिस शर्मा जी के नाती को वह पढ़ाती थी,उसने और बच्चे जमा कर दूसरे क्षेत्र में एक सेंटर खुलवा‌ दिया सीमा के लिए।शाम के समय सीमा वहां जाकर पढ़ाती थी।बाद में अपनी कॉलोनी के बच्चों को।

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एक दिन विद्यालय से आकर सीमा ने देखा ,घर सजातीय लोगों से भरा‌ पड़ा  था।मां चाय -नाश्ता परोस रहीं थीं।सीमा मुंह -हांथ धोकर जैसे ही रसोई में पहुंची,मां ने सख़्त हिदायत देते हुए कहा”सभी हमारे समाज के लोग आएं हैं आज।उनके सामने अपनी मुंहफट जुबान को ज़रा काबू में रखना। चुपचाप उनकी बातें सुन लेना बस”।मां की बात पूरी कहां समझ सकी सीमा।कौन आए हैं यह तो दिख ही रहा था,पर क्यों आएं हैं इसकी जानकारी नहीं है पाई थी।सभी के लिए बैठक में चाय ले जाते हुए उनमें से किसी एक की आवाज सुनाई दी,

जो मां से कह रहे थे”भाभी,जमाना बहुत खराब है,ऊपर से लड़की तुम्हारी सुंदर।इतनी दूर‌ ट्यूशन के लिए जाने की क्या जरूरत है?हम सभी मर गएं हैं क्या ?जो इतनी दूर जाकर पढ़ाना पड़ रहा‌ है।जल्दी से उसे रोको नहीं तो तुम्हारे खानदान पर धब्बा लग जाएगा,तुम कुछ दिनों के उसे हमारे पास भेज दो।मन भी थोड़ा बहल जाएगा।”सीमा ने अभी-अभी मां को वचन दिया‌ था कि उनकी सारी बातें मानेगी। अतिथियों के सामने मुंह नहीं खोलेगी।वह क्या करे,विवश कर दिया‌ उन लोगों ने।सीमा ने चाय की ट्रे मेज पर रखी

और उनसे कहा “अंकल आंटी जी,यह सच है कि अब पापा नहीं है।इस घर की दीवारों में सुराख दिखने लगा होगा आप लोगों को।आप लोगों को यह तो अच्छा लगेगा नहीं कि मेरी मां हर महीने आप सभी के पास अपना दुखड़ा रोए और मदद मांगें।कब तक भीख मांगकर घर चलाएंगे हम?इससे लाख गुना मैं समझती हूं अच्छा है कि अपनी मेहनत से कमाना।मैं सुंदर हूं इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अपने‌ रूप पर काबू नहीं पाऊंगी।मैं ट्यूशन पढ़ाकर अपने भाई-बहनों और मां की देखभाल करती हूं।किसके ऊपर धब्बा लगा रहें हैं

आप लोग।आप जैसे स्वार्थी लोगों के कुछ कह देने से मेरा चरित्र मलिन नहीं हो सकता।”आए हुए सभी आगंतुकों को सीमा का ज़वाब पसंद नहीं आया‌।सीमा की बातें सुनकर वे जल्दी ही चलते बने।मां को चिंता‌ हो रही थी  कि मुसीबत में अपना कुटुम्ब,समाज ही काम आता है।जाते हुए आगंतुकों को दरवाजे तक छोड़कर  जैसे ही सीमा वापस अंदर आई,मां ने  उसकी आंखों का गीलापन महसूस किया।शाम को फिर से उन्हीं लोगों को सम्मान पूर्वक बुलाया था सीमा की मां ने।सभी सोचने लगे कि बेटी अपने दुर्व्यवहार के  कारण माफी मांगना चाह रही होगी।

मां ने सबके सामने आकर हांथ जोड़ते हुए कहा”आप सभी की बातों का मैं तब  सही जवाब नहीं दे पाई थी , इसलिए फिर से बुलवाया है।आप लोगों के सामने आज मैं कुछ कहना चाहती  हूं,कहते हुए मां बोलने लगी”मेरी बेटी आग है आग।जो उसे छूने की कोशिश करेगा वह जल जाएगा।मेरी बेटी अपने पापा की मौत  का सदमा सहन कर रही है

और घर खर्च चला‌ रही है।अभी हम आप लोगों के पास से सहानुभूति लेकर उधार मांगें तब आप को धब्बा  नहीं लगेगा।अभी मेरी बेटी मेहनत करके चार पैसे कमा‌ रही है,तो समाज में धब्बा लग रहा है।ये कैसा समाज है जहां जरूरत पड़ने पर‌ कर्ज चढ़ाने के लिए‌ भीख मांगना स्वीकार है,पर मेहनत करके इज्जत के साथ दो पैसे‌ कमाने में समाज को धब्बा लगता है। लड़कियां हमारा गौरव हैं,फिर हमेशा‌ उनको शक की नजर से‌ क्यों देखा जाता है?

मेरी बेटी ने इतनी कम उम्र में अपने पिता की जगह भर दी इस परिवार में।पढ़ाई के अलावा इसे कुछ सूझता‌ ही नहीं।मैं  हर जन्म  ईश्वर से बेटी ही मांगूगी।बेटियां धब्बा नहीं हैं माथे पर बल्कि चंदन हैं।

शुभ्रा बैनर्जी

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