रात को एक बजे अपनी चार वर्षीय, बुखार से तपती बेटी को कंधे पर उठाए, वह तेज़ कदमों से चली जा रही थी, ऐसा लग रहा था मानो वह दौड़ रही हो, और कैसे ना दौड़ती माँ थी, उसके नाज़ुक कंधे अब मजबूत हो चुके थे…1 किलो मीटर पैदल चलना उसके लिए कुछ भी न था बस वो हॉस्पिटल पंहुच जाना चाहती थी…
आखिर वो अपनी मंज़िल तक पहुँच ही गई, बच्ची को हॉस्पिटल के बेड पर लेटाकर लगा जैसे अब उसे सुरक्षित कर दिया हो… डॉ ने देखा और कहा घबराने की कोई बात नहीं…
परहेज़ नहीं किया…? डॉ के पूछने पर उसने नजरे चुराते हुए कहा… हाँ डॉ शुबह में छुप के आइस क्रीम खा लिया था इसने…।
डॉ ने कहा मैंने चेक कर लिया हैं आप शुबह तक इसे घर ले जा सकती हैं…।
डॉ. के जाते ही उसने दिशा को देखा उसके माथे को सहलाने लगी और उसके टेडी जिसको वह बुखार में तपते हुए भी अपने हाथों में पकड़े यहां तक ले आई थी… उसे उठाकर उसके सीने पे रख दिया…और ख़ुद यादों की गलियारे में खो गई..।
उसकी शादी के दो महीने ही गुज़रे थे कि उसने ख़ुश खबरी सुना दी… सबने हँसी की बड़ी जल्दी बाजी करने पर लेकिन वह पति पत्नी बहुत खुश थे….।
उसके देवर की शादी पहले ही हो चुकी थी और उनकी एक लड़की थी। सब कहते थे इस खानदान में ल़डकियों की संख्या अधिक है…ख़ुद उसके पति मोहित चार बहनों के इन्तेज़ार के बाद हुए और फिर देवर… लेकिन इससे उसे कोई मतलब ना था पहला बच्चा था जो भी हो तंदरुस्त हो यही उसकी कामना थी…।
फ़िर उसने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया, रिया बहुत खूबसूरत और मन मोह लेने वाली बच्ची… सब अच्छा था इसी बीच देवर की दूसरी बेटी हुई… सास कहतीं बेटियाँ लक्ष्मी होती हैं लक्ष्मी… बेटियों से घर गुलजार रहता है… उसे बहुत खुशी हुई कि उसके ससुराल वाले संकीर्ण मानसिकता के लोग नहीं…।
रिया अब पांच साल की हो गई थी… दूसरी बार फिर उसने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया साथ ही देवरानी की तीसरी बेटी हुई… दोनों बच्चियाँ कुछ ही दिनों के अंतराल पर हुईं।
घर में अब पाँच लड़कियां हो चुकी थीं…घर वाले, जानने वालें बच्चियों के पैदाइश पर बधाइयों से ज्यादा संतावनाएं देते, बेटी होने के दुःख नहीं था लेकिन उन सांत्वनाओं को सुन उसकी आँखे भर जातीं, तरह तरह की बातें सुनने को मिलीं।
ससुर जी ने कहा – कोई बात नहीं, क्या हो गया बेटियाँ हैं तो, ख़ुद मेरी चार बेटियाँ है पहले।
कोई कहता – ओहो खानदान में एक भी बेटा नहीं, ल़डकियों की शादियों में परेशानी होगी, बिन भाइयों की बहनें….
कोई कहता- अगली बार उम्मीद से हो, तो बताना एक बाबा हैं मेरी नजर में, उनके आशिर्वाद से कितनों को बेटे हुए।
कई तो धीमे आवाज़ में यहां तक कह देते पहले भी लड़की थी, इस बार लिंग जाँच नहीं कराए।
कोई कहता – बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा।
सारी बातों का उसके पास एक ही जवाब था- मेरी बेटियाँ मेरी सन्तान हैं, मेरी बेटियाँ भी उसी तकलीफ से हुईं, जितनी तकलीफ से बेटे होते हैं,
मेरी बेटियों ने भी मुझे वैसा ही ममता का एहसास कराया जैसे बेटे कराते हैं, अपनी बेटियों के दर्द मैं उतनी ही तड़प उठती हूँ जितने कि आप अपने बेटे के दर्द पर, मेरी बेटियाँ वही कुछ कर सकती हैं, जो आपके बेटे कर सकते हैं, और जरूरी नहीं कि बुढ़ापे का सहारा सिर्फ़ बेटे ही बने, बेटियां भी बनती हैं, जिनकी कोई औलाद नहीं होती उनके बुढ़ापे का सहारा कौन बनता है?
और फिर बेटी के लेने पर वैसे ही धारा फूटती है माँ के सीने से जैसा बेटे के होने पर, जब कुदरत भेद भाव नहीं करती तो हम क्यूँ करते हैं….!
कहने वाले चुप हो जाते,
उसे एक बात समझ नहीं आती लोगों की, किसी को एक बेटा और एक बेटी हो जाएं तो झट से राय देते हैं अब परिवार पूरा हुआ अब रहने दो, अगर दो बेटे हुए तो भी कहा जाता है, रहने दो बहुत अच्छा परिवार है, लेकिन किसी को दो बेटियाँ हुई तो यही राय मिलती है एक और देख लो… बेटा बेटी दोनों रहना ज़रूरी है… क्या दो बेटों वालों के लिए बेटी रहना जरूरी नहीं…
इन सब बातों से परे उसकी छोटी दिशा थोड़ा कमज़ोर पैदा हुई थी डॉ ने कहा था उसका इम्यून सिस्टम थोड़ा कमज़ोर है, समान्य बच्चों के मुकाबले ज्यादा देखभाल की ज़रुरत है,
अब वह बच्ची में ही व्यस्त हो गई थी, थोड़ी भी लापरवाही से दिशा को तुरंत बुखार आ जाता, उल्टियां करने लगती, इसीलिए वह अपना पूरा ध्यान बच्ची पे रखती।
दिशा जब दो साल की हुई तो सब कहने लगे – एक और बच्चा करना चाहिए, एक तो खानदान में कोई बेटा नहीं और फिर इस बच्ची का क्या भरोसा?
उसे बहुत दुःख हुआ लेकिन इसका भी ज़वाब उसके पास था उसने कह दिया – मेरी बेटी रोगी नहीं है, समान्य है डॉ ने कहा है, सात आठ सालों में इसकी ये समस्या भी दूर हो जाएगी, फिर इसे इतना परहेज भी नहीं करना पड़ेगा, मैं तीसरा बच्चा करके अपनी बच्ची के साथ अन्याय नहीं करूंगी, इसे अपना पूरा ध्यान दूंगी।
उन्हीं दिनों सासु माँ ने भी कहा मेरी चार बेटियों के बाद बेटा हुआ, तुम्हारी चाची सास की भी दो बेटियों के बाद बेटा हुआ, इतनी जल्दी हार नहीं मानते बेटा होगा ना!
सासु माँ की बातेँ सुन कर उसे सारी बातें समझ आ गई उसने कहा — माँ जी और मैं ये भी जानती हूं कि एक जिज्जी की (नन्द) तीन बेटियों के बाद बेटा हुआ और दूसरी जिज्जी की चार बेटियों पर एक बेटा हुआ, उनकी आर्थिक स्थिति आप देख रहीं हैं ना! कितने परेशानी होती है घर चलाने में।
वहीं बाकी दो जिज्जियों जिनके सिर्फ दो बच्चे हैं (एक बेटा और एक बेटी) वो कितनी खुशहाल हैं।
और मैं ये भी जानती हूँ आपकी सास की छह बेटियों के बाद दो बेटे हुए और आपकी चाची सास की बेटे की राह देखते देखते दस बेटियाँ हुईं लेकिन फ़िर भी बेटा ना हुआ,वह ज़माना और था जब ज्ञान का आभाव था लोग ज्यादा बच्चे पैदा करते थे…!
अब तो वह ज़माना भी ना रहा कि जैसे तैसे बच्चे पल गए… बच्चों की परवरिश उन्हें अच्छी शिक्षा देना कितना महंगा है।
क्या गारंटी है कि तीसरी बार में मेरा बेटा ही हो.. मैं बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं बनुंगी…
और ना ही लिंग जांच करा,बच्चा गिरा,कानूनी अपराधी और भगवान की नजर मे पापी बनुंगी…
मेरी बेटियां मेरे लिए काफी हैं।
उसकी बात पर सासु माँ को चुप्पी लग गई बात सही थी,
उसके इस कदम पर देवरानी ने भी उसका साथ दिया उसने भी तीन बच्चियों के बाद चौथा बच्चा करने से इंकार कर दिया…. और जाहिर सी बात है उनके फैसलों में उनके पति भी उनके साथ थे तभी ये सम्भव हो पाया।
हालांकि यह निर्णय बहुत मुश्किल था, लेकिन निर्णय तो लेना था देवरानी के यूटेरस में समस्या हो गई थी अब वह लाख दबाव सही लेकिन खानदान को वारिस देने के चक्कर में अपनी जान जोखिम में नहीं डाल सकती थी।
सबकी नजरें अब उसकी तरफ थीं लेकिन उसने कह दिया था मेरी दोनों बेटियाँ मेरी वारिस हैं। मोहित और वह अपना निर्णय ले चुके थे, वह शिक्षित थे, घर की जिम्मेदारियां, बच्ची का बीमार पड़ना सबने उन्हें दृढ़ बना दिया था, और मोहित घर की आर्थिक स्थिति देख कुछ सालों के लिए विदेश जाने का सोच रहा था, और वह अपने फैसले पर दृढ़ता से कायम थी।
दिशा की आवाज़ पर वह यादों की गलियारों से निकल आई, दिशा अब बिल्कुल ठीक थी..
शुबह वह दिशा को लेकर घर चली आई।
उसकी देवरानी ने बड़े शहर,पति के पास जाकर कपड़े का बिजनेस कर लिया था।
और वह रिया और दिशा में व्यस्त हो गई थी साथ ही उसे लिखने का शौक था तो सोशल मीडिया पर अपना ब्लॉग बना लिया था, पांचो बच्चियाँ अच्छे स्कूलों में पढ़ रहीं थीं।
घर की महिलाओं के खर्चों में हाथ बटाने से आर्थिक स्थिती भी सुधर गई थी, सब ठीक हो गया था कहने वाले भी चुप हो गए थे।
उसने इस बात को साबित कर दिया था कि एक स्त्री जब अपने हक के लिए आवाज उठाती है तो वह कई स्त्रियों के लिए आवाज़ उठा रही होती है। उसने खानदान की बेटे की बाट जोहने वाली परम्परा बदल डाली थी,
मौलिक एवं स्वरचित
सुल्ताना खातून
दोस्तों मैंने समाज के बहुत ही अहम मुद्दे को उठाने का प्रयास किया है, आपको मेरी रचना कैसी लगी अपनी राय देकर मेरे प्रयास को सफल बनाने में मेरी मदद करें…धन्यवाद
सुल्ताना खातून जी बढ़िया कहानी लिखी….मुद्दा अच्छा उठाया आपने
पर ज्यादा अच्छा नहीं होता इसे आप मुस्लिम समाज के ही परिपेक्ष में लिखतीं। आप तो जानती ही होंगी ये समस्या मुस्लिम समाज में ज्यादा विकराल है.. वहां 8,10 बच्चे होना आम बात है। तो अगर आप उन्हें सीख देने की कोशिश करतीं तो ज्यादा उचित न्याय होता आपकी कहानी के साथ।।