मैं अपने अहंकार में रिश्तों के महत्व को भूल गई थी – प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’ : Moral Stories in Hindi

“बेटा, तुम कब तक आओगे अब तो घर से ही ऑफिस का काम करना होता है तो यहीं आ जाओ….मेरी तबियत भी इन दिनों ऐसी ही चल रही है तो मुझे भी मधु का सहारा हो जाएगा….कामवालियों का सहारा था तो अब वो भी नहीं आ पा रहीं….”

“नहीं मां, हम नहीं आ पाएंगे क्योंकि शिफ्टवाइज ड्यूटी जाना होता है तो सप्ताह में दो दिन मुझे भी जाना पड़ता है ….इसलिए मां हम नहीं आ पाएंगे….आप कुछ दिनों के लिए दीदी को बुला लीजिए न….आगरा से मथुरा ज्यादा दूर भी नहीं है …जब मन करेगा चली जाएंगी लेकिन हमारा इतनी दूर से आना नहीं हो पाएगा….” शौर्य ने अपनी मां जानकी जी से कहा।

“अच्छा ठीक है मैं देखती हूं तुम लोग अपना ध्यान रखना….” कहकर जानकी जी ने फोन रख दिया

थोड़ी देर बाद वह अपनी बेटी कामिनी के पास फोन करती है, ” बेटा कैसी है?”

“(बुझे मन से)ठीक हूं मां….इस कोरोना ने तो सारा रूटीन ही बिगाड़ दिया है …सब लोग घर में ही रहते हैं और कामवाली भी अब नहीं आ रही तो सारा काम मुझे ही करना पड़ता है…और आप तो जानती हो मां कि अब तक घर में नौकर और कामवाली आते थे जिससे मुझे ज्यादा काम करने की आदत भी नहीं है तो इतना थक जाती हूं कि पूछो ही मत…..”

“हां बेटा ये तो है यही परेशानी यहां हो गई है कर्फ्यू की वजह से कामवाली भी नहीं आ रही और तुझे तो पता है कि इस उम्र में मुझसे काम नहीं होता…एक काम क्यों नहीं करती तू कुछ दिनों के लिए यहां आ जा…तुझे भी आराम मिल जाएगा और मुझे भी थोड़ा सहारा मिल जाएगा… वहां तो तेरी सास और ननद मिलकर कर ही लेंगी लेकिन यहां तो मैं बिल्कुल अकेली हूं….अगर तू कहे तो मैं दामाद जी से बात करके कह दूं तुझे भेजने की…”

“ये क्या कह रही हो मां….ऐसे कैसे आ सकती हूं मैं…एक तो ऐसे इन हालातों में आना अच्छा नहीं लगेगा और मान लो आ भी जाऊं तो वहां आपके पास तो कोई है भी नहीं….भगवान न करे अगर हम दोनों में से किसी को कुछ हो गया तो कौन और कैसे डॉक्टरों के पास भागता फिरेगा…..इसलिए आप मुझे यहीं रहने दीजिए….” कहते हुए कामिनी ने फोन रख दिया। उसने ये तक पूछना उचित नहीं समझा कि उसकी मां की तबियत कैसी है।

जानकी जी आंखें मूंदे वहीं अपनी आराम कुर्सी पर बैठ गईं तभी उनके दरवाजे पर दस्तक हुई।

इस समय ऐसे हालातों में कौन हो सकता है सोचते हुए उन्होंने जाकर दरवाजा खोला तो सामने अपनी बहू मधु के माता–पिता सुधाकरजी और मालती जी को देखकर दंग रह गईं

” आ…..आप लोग य..हां…”

“माफ करना बहन जी हमें इस तरह बिना बताए आना तो नहीं चाहिए था लेकिन क्या करें जब से मधु ने आपकी तबियत के बारे में बताया तो हमसे रहा ही नहीं गया इसलिए आपको अपने साथ अपने घर ले जाने के लिए चले आए…”

“क्या…ये आप क्या कह रहे हो…अपने घर….” जानकीजी ने चौंकते हुए उनसे कहा।

“देखिए बहन जी हमारा घर आपके जैसा बड़ा और सुविधाओं वाला तो नहीं है किंतु ऐसे समय में एक दूसरे का साथ ही सबसे बड़ी सुविधा है और इस मुश्किल घड़ी में रिश्तेदार ही काम न आ सकें तो फिर रिश्तों का क्या फायदा….अब ज्यादा मत सोचिए जल्दी से अपने कुछ कपड़े बैग में रखकर हमारे साथ चलिए, यहां ऐसे हालातों में आपका अकेले रहना उचित नहीं है उस पर भी तब जब आपकी तबियत खराब चल रही है….” सुधाकर जी ने कहा तो जानकी जी उनके साथ चल दीं।

पूरे रास्ते वह यही सोचती आईं कि जिन पैसों के घमंड में मैं किसी को कुछ नहीं समझती थी आज वही रुपए पैसे किसी काम नहीं आ रहे और मैं ये सोचकर कि गरीब की बेटी को बहू बनाकर लाऊंगी तो वह दबकर रहेगी मधु को बहू बनाकर घर ले आई और जब चाहा उसको और उसके माता पिता को अपमानित करती रही आज वही लोग बिना किसी शिकायत के मेरा साथ दे रहे हैं जबकि मेरे सभी सगे संबंधी जहां तक कि मेरे बेटे बेटी भी किसी न किसी बहाने मुझसे किनारा कर गए, …मेरे यहां काम करने वाले दुगुने वेतन पर भी काम करने को तैयार नहीं हैं और एक मेरी बहू जिसको मैंने कितना जलील किया उसके मायके वालों को भलाबुरा कहती रही वो आज बिना कहे मेरी सहायता के लिए आगे आ गए….

जानकी जी अपने विचारों में खोई ही हुई थीं कि

“आइए बहन जी….चलिए…घर आ गया….” मालती जी ने कहा।

जानकी जी भारी कदमों से आत्मग्लानि से भरी हुई उनके छोटे से घर में जिसके लिए वह बातों ही बातों में मधु को ताना देने से पीछे नहीं रहती थी चल दीं….

एक कमरे में जानकी जी का बैग रख जैसे ही मालती जी ने कहा “आइए बहन जी ..जब तक हालात सही न हों तब तक आप यहां आराम से रहिए और किसी चीज की आवश्यकता हो तो निसंकोच कहिएगा….” जानकी जी की आंखों से आंसू छलक पड़े और वह हाथ जोड़ते हुए बोलीं ” मैं पहले से ही बहुत शर्मिंदा हूं,…मुझे माफ कर दीजिए, मैं अपने अहंकार में रिश्तों के महत्व को भूल गई थी….”

“अरे नहीं नहीं बहन जी ये आप क्या कर रही हैं और वैसे भी हम बेटी वाले हैं…आपको ऐसे हाथ जोड़ना…..”

मालती जी की बात बीच में काटते हुए, ” नहीं बहन,  आज मुझे अहसास हो गया कि पैसे से धनवान होना ही सब कुछ नहीं होता, असली धनवान तो आप बेटी वाले हो जिनकी इतनी संस्कारी बेटी है कि जिसने मेरे बिना कहे ही मेरी परेशानी को समझ लिया और धन्य है आप लोग कि उसके कहने पर मेरी मदद के लिए बिना किसी शिकायत के आ गए….” कहते कहते जानकी जी के आंसू बहने लगे जिनमें उनका सारा अहंकार बह गया और वह मालती जी के गले लग गईं।

प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’

मथुरा (उत्तर प्रदेश)

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