नीला रसोई में चाय बना रही थी। दोपहर का समय था और हर दिन की तरह वह अपने घर के कामों में लगी हुई थी। तभी अचानक बाहर से तेज़ आवाज़ में चीख सुनाई दी। नीला घबराई हुई दौड़कर बाहर आई और देखा कि उसकी सास पुष्पा देवी, चेहरे पर चिंता की लकीरें और गुस्से के भाव लिए, उसकी बड़ी बेटी आयुषी को थप्पड़ मार रही थीं। यह देखकर नीला हैरान रह गई और तुरंत बीच में आकर बोली, “क्या हुआ माँजी? इतनी तेज़ क्यों हो रही हैं?”
पुष्पा देवी ने गुस्से से भरे स्वर में कहा, “पूछो अपनी बेटी से! क्या कर रही थी ये आज स्कूल के बाद? मैंने कितनी बार तुझसे कहा था कि इसे इतनी छूट मत दो। देखो, क्या कर आई है!”
नीला की आँखों में चिंता और सवाल उमड़ पड़े। उसने घबराते हुए पूछा, “क्या किया है आयुषी ने, माँजी?”
“तेरी बेटी स्कूल के बाद अपने दोस्तों के साथ मॉल में घूम रही थी। वहाँ एक लड़के के साथ हंसी-ठिठोली कर रही थी। इसका सब कुछ मैं अपने पड़ोसी शेखर से जान चुकी हूँ। ये सब करने के लिए ही हमने इसे पढ़ने भेजा है?” पुष्पा देवी ने झुंझलाते हुए कहा। उनकी आवाज़ में गुस्से के साथ-साथ निराशा भी झलक रही थी।
नीला ने गहरी सांस ली और आयुषी को पास बुलाया। वह धीरे-से बोली, “आयुषी, सच बताओ। क्या यह सब सच है?”
आयुषी की आँखों में आँसू भर आए और उसने धीमी आवाज़ में कहा, “माँ, मैंने कुछ गलत नहीं किया। मेरे दोस्त बस मॉल में मिलने गए थे। कोई गलत इरादा नहीं था। हम सिर्फ बातचीत कर रहे थे।”
नीला को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे या क्या करे। वह खुद को दोषी मानने लगी। “शायद मेरी ही गलती है। मैंने आयुषी को बहुत ज्यादा छूट दी। उसे दोस्तों के साथ बाहर जाने दिया, मोबाइल भी दिया। हर चीज़ उसकी माँग पर तुरंत मुहैया करवा दी। शायद मैं ही उसे संभालने में चूक गई।” यह सोचते हुए नीला के चेहरे पर गहरी चिंता की लकीरें उभर आईं।
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पुष्पा देवी ने अपने गुस्से को थोड़ा थामा और नरम लहजे में बोलीं, “नीला, बच्चों की परवरिश में गलती हो जाती है, पर अभी भी वक्त है उसे सुधारने का। तुम्हें हिम्मत करनी होगी। हम मिलकर आयुषी को सही रास्ता दिखा सकते हैं।”
तभी दरवाजे पर खड़ा शेखर, जिसने आयुषी को मॉल में देखा था, धीरे-से बोला, “भाभी जी, मैं आपका पड़ोसी हूँ। आप चिंता मत कीजिए। मैंने अपनी बहन समान आयुषी को उस मॉल में देखा और तुरंत आपको खबर दी ताकि कोई गलत बात न हो जाए। मेरी मंशा सिर्फ उसे बचाने की थी।”
नीला ने राहत की सांस ली। उसे महसूस हुआ कि शेखर की मंशा सही थी और उसने उसकी बेटी को किसी बड़े संकट से बचा लिया। “शेखर भैया, आपने जो किया उसके लिए मैं तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ। आपने हमारा घर बचा लिया,” नीला ने कृतज्ञता से कहा।
पुष्पा देवी ने अपनी पोती आयुषी की ओर देखते हुए कहा, “बेटा, गलती हर कोई करता है, लेकिन उसे सुधारना भी जरूरी है। अब से तुम्हें अपनी हर हरकत पर ध्यान देना होगा। तुम्हारी माँ और मैं तुम्हारे साथ हैं। बस हमें तुम्हारा भरोसा चाहिए।”
नीला ने आयुषी को गले लगाया और उसकी आँखों में देख कर कहा, “तुम अभी बच्ची हो, और इसलिए मैंने तुम्हें जो छूट दी थी, शायद वह मेरी गलती थी। लेकिन अब से हम दोनों एक-दूसरे का ध्यान रखेंगे। मैं चाहती हूँ कि तुम सही राह पर चलो और अपने हर कदम का सही इस्तेमाल करो। तुम मेरी बेटी हो और मैं तुम्हें हमेशा सही मार्ग दिखाने के लिए यहाँ हूँ।”
आयुषी ने अपनी माँ की आँखों में आँसू देखे और वह समझ गई कि उसका हर कदम अब परिवार की इज्जत और उसके भरोसे का सवाल है। उसने अपनी माँ से वादा किया कि वह अब से अपने हर काम को सोच-समझकर करेगी और अपने परिवार का सिर गर्व से ऊंचा रखेगी।
उस रात नीला और पुष्पा देवी ने बैठकर कई बातें कीं। उन्होंने आयुषी के साथ मिलकर उसकी दिनचर्या में बदलाव लाने का फैसला किया। उन्होंने तय किया कि आयुषी को अपनी पढ़ाई और दोस्तों के साथ समय बिताने की आजादी तो मिलेगी, लेकिन एक हद तक। उसे अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों का एहसास कराना जरूरी था। नीला ने यह भी समझा कि बच्चों को छूट देना और उन पर विश्वास करना जरूरी है, लेकिन साथ ही उनके साथ संवाद भी उतना ही जरूरी है।
पुष्पा देवी ने नीला की ओर देखकर कहा, “बेटा, हम माँ हैं। हमसे गलतियां हो सकती हैं, लेकिन हमारा फर्ज है कि हम अपनी गलती को सुधारें और अपने बच्चों को सही रास्ता दिखाएं। मैं जानती हूँ कि तुम एक अच्छी माँ हो और आयुषी एक समझदार बच्ची है।”
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नीला ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसे अब अपनी माँ और परिवार का पूरा सहयोग महसूस हो रहा था। उसने आयुषी का हाथ थामा और उसे अपने पास बैठा लिया। “तुम मेरी सबसे बड़ी ताकत हो, आयुषी। मैं चाहती हूँ कि तुम हमेशा खुश रहो, लेकिन सही राह पर चलकर।”
आयुषी ने भी अपनी माँ और दादी को वादा किया कि वह उनकी उम्मीदों पर खरी उतरेगी और कभी उनका सिर झुकने नहीं देगी। यह सुनकर पुष्पा देवी ने अपनी बहू और पोती को गले लगा लिया। उनके दिलों में अब एक नई उम्मीद और विश्वास जाग चुका था।
दूर खड़ी शेखर ने यह सब देखा और मन ही मन खुश हुआ कि उसने सही समय पर सही कदम उठाया। उसे भी अब इस परिवार का हिस्सा बनने जैसा महसूस हो रहा था।
उस दिन के बाद से नीला और पुष्पा देवी ने आयुषी को न सिर्फ समझाया बल्कि उसके साथ समय भी बिताया। उन्होंने उसे सही-गलत की पहचान सिखाई और अपने जीवन के अनुभवों से उसे जीवन के सबक दिए। इस तरह, पूरे परिवार ने मिलकर एक-दूसरे का सहारा बनकर अपनी जिंदगी की चुनौतियों का सामना करने का संकल्प लिया।