सुधीर जी का परिवार अपनी परंपराओं और मूल्यों से बहुत दूर हो चुका था। गांव की सादगी और रिश्तों की गहराई में पले-बढ़े सुधीर जी, शहर की भागदौड़ में उलझ गए थे। जब तक उनके पिताजी जीवित थे, वह हर साल गांव जाते और परिवार का दायित्व निभाते। लेकिन पिताजी की मृत्यु के बाद, उनकी माँ अकेली रह गई थीं।
माँ को अकेले छोड़ना उनके संस्कारों के खिलाफ था, इसलिए उन्होंने माँ को अपने साथ शहर ले आने का निर्णय लिया। माँ को शहर में लाना आसान नहीं था, क्योंकि वह गाँव की सादगी की आदी थीं। उनके लिए यह तेज़ रफ्तार, शोरगुल और मशीनी जीवन बिल्कुल अनजाना था।
जब सुधीर जी माँ को अपने घर लाए, तो उनकी पत्नी मधुमती और बच्चों को यह बात अच्छी नहीं लगी। मधुमती को लगता था कि सासु माँ की उपस्थिति उनकी आजादी और आराम में खलल डालेगी। बच्चे भी दादी को बोझ समझने लगे थे, क्योंकि उनके पास अपने दोस्तों और आधुनिक जीवन के लिए समय था, लेकिन दादी की कहानियों और सलाहों के लिए नहीं।
माँ ने शुरू में सबके प्रति बहुत प्रेम और अपनापन दिखाया। वह सुबह जल्दी उठकर पूजा करतीं, घर का आँगन साफ करतीं, और सबके लिए अपने हाथों से नाश्ता बनातीं। लेकिन मधुमती को यह सब फालतू लगता था। वह चाहती थी कि सासु माँ अपने कमरे तक ही सीमित रहें।
मधुमती ने बच्चों को भी यह सिखाना शुरू कर दिया कि दादी के तौर-तरीके पुराने हैं और उनका अनुसरण करना समय की बर्बादी है। धीरे-धीरे, माँ खुद को घर में एक अजनबी की तरह महसूस करने लगीं।
एक दिन, सासु माँ ने मधुमती से कहा, “बेटी, घर का खर्चा थोड़ा कम रखना चाहिए। हमें पैसे बचाने चाहिए, ताकि भविष्य में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।”
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यह सुनकर मधुमती भड़क उठी। “माँजी, आपको हमारे खर्चों में दखल देने की जरूरत नहीं है। हम अपना घर कैसे चलाते हैं, यह हमें पता है।”
माँ चुपचाप अपने कमरे में चली गईं। लेकिन उस दिन से मधुमती ने ठान लिया कि सासु माँ को किसी भी तरह से घर से बाहर करना है।
मधुमती ने धीरे-धीरे सुधीर जी को यह समझाना शुरू किया कि माँ को वृद्धाश्रम में भेज देना ही बेहतर होगा। उसने कहा, “सुधीर, मैं तुम्हारी माँ की इज्जत करती हूँ, लेकिन उनकी देखभाल करना अब मुश्किल हो गया है। यहाँ हमारे पास समय भी कम है, और बच्चों की पढ़ाई और हमारी नौकरी के बीच उनका ध्यान रखना संभव नहीं। वृद्धाश्रम में उनके जैसी और भी महिलाएँ होंगी, उनके दोस्त बनेंगे, और वह खुश रहेंगी।”
सुधीर जी यह बात सुनकर परेशान हो गए। वह माँ को वृद्धाश्रम भेजने की सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन मधुमती के लगातार दबाव डालने के कारण वह उलझन में पड़ गए।
माँ को इस योजना का पता चल गया। वह रातभर रोती रहीं। उन्होंने सोचा, “जिस बेटे को मैंने अपनी जान से ज्यादा प्यार किया, उसकी खुशी के लिए अपनी हर ख्वाहिश दबाई, क्या वही अब मुझे घर से बाहर भेज देगा?”
लेकिन माँ ने किसी से कुछ नहीं कहा। वह अब और भी चुप रहने लगीं। उनकी आँखों में दुख साफ झलकता था, लेकिन वह किसी से शिकायत नहीं करती थीं।
एक दिन, माँ ने सुधीर जी से कहा, “बेटा, अगर तुम्हारी पत्नी और बच्चे मुझसे परेशान हैं, तो मुझे वृद्धाश्रम भेज दो। मैं तुम्हें तकलीफ में नहीं देख सकती।”
यह सुनकर सुधीर जी का दिल टूट गया। उन्होंने माँ को गले लगाते हुए कहा, “नहीं माँ, आप कहीं नहीं जाएँगी। यह घर आपका है, और आप यहाँ रहेंगी।”
सुधीर जी ने उसी दिन एक बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने अपने वकील को बुलाया और अपने घर का मालिकाना हक माँ के नाम कर दिया।
जब वकील साहब घर आए और सुधीर जी ने यह बात अपने परिवार को बताई, तो मधुमती और बच्चों के होश उड़ गए। सुधीर जी ने कहा, “जिसने यह घर बनाने के लिए अपने गहने बेचे, हर मुश्किल में मेरा साथ दिया, वह मेरी माँ हैं। अगर किसी को यहाँ समस्या है, तो वह घर छोड़कर जा सकता है।”
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यह सुनकर मधुमती और बच्चे सकते में आ गए। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। मधुमती ने माँ से माफी माँगी और कहा, “माँजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको गलत समझा। आपने हमारे लिए इतना कुछ किया, और मैं ही आपको सम्मान नहीं दे पाई।”
बच्चों ने भी दादी से माफी मांगते हुए कहा, “दादी, हमें आपकी कहानियाँ सुननी हैं। आप हमें अपनी पुरानी यादें सुनाएँ।”
माँ ने सबको माफ कर दिया। उन्होंने कहा, “रिश्ते तभी मजबूत होते हैं, जब हम एक-दूसरे को समझें और सहारा दें। मैं तुम सबको दिल से माफ करती हूँ।”
इस घटना के बाद, घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। अब माँ घर की धुरी बन गईं। मधुमती ने सासु माँ के अनुभवों से सीखना शुरू किया, और बच्चे अपनी दादी के साथ समय बिताने लगे।
यह कहानी हमें सिखाती है कि बुजुर्ग हमारे जीवन का अनमोल हिस्सा हैं। उनका सम्मान और देखभाल करना हमारा कर्तव्य है। जो परिवार अपने बुजुर्गों का आदर करता है, वही सच्चे सुख और शांति का अनुभव करता है।
मौलिक रचना : प्राची अग्रवाल