माँ जी आपका खर्च अब हम नहीं चला सकते – मीनाक्षी सिंह : Moral Stories in Hindi

आज 1 तारीख थी …..बहु देविका ने सास सविताजी को सब्जी का थैला पकड़ा दिया….

और उनकी लाई गई पेंशन में से ₹200 निकालकर उन्हें सब्जी लाने के लिए भेज दिया…..

बेचारी 70 वर्षीय सरिताजी हर महीने की 1 तारीख को इसी तरह कभी सब्जी लेने ,,,कभी परचून का सामान,,,लेने तो कभी कोई और काम करने निकलती  हैं ,,,,,क्योंकि इसी दिन उनकी पेंशन आता है …..

पेंशन भी कितनी साड़े  तीन हजार ……

जिसकी आस  उनकी बहू को पूरे महीने रहती है ……

उसमें भी सुनाती रहती हैं कि जितना यह देती नहीं……

उससे ज्यादा तो इन पर खर्च हो जाता है ……

और सामान भी बेचारी  सविता जी ही लेकर के आती हैं ……

पति पर समय ही नहीं है……

वह बाहर रहता है ऑफिस के काम से सुबह ही निकल जाता है ……

उसे तो यह भी नहीं पता कि उसकी मां हर महीने सामान लेकर आती है …….

बेचारी सविता जी हाथों में अपना डंडा लिए धीरे-धीरे थैला लिए निकल आई हैं ……

रास्ते में सभी लोग उनसे राम-राम करते हैं ……

और उनको देखकर तरस खाते हैं ……

अब  सविता जी भी क्या करें …..

दो वक्त की रोटी का जो सवाल है …..

अगर वह यह ना करें तो वह भी उन्हें नसीब नहीं होगी…..

मन  में खुद भी सोचती हैं कि 3500  हजार  में उन्हें कौन रोटी खिलाएगा …..

वह सब्जी वाले की दुकान पर आ गई है …..

सब्जी की लिस्ट तो बहुत बड़ी थी …..

अब ₹200 में इतनी सब्जियां आना तो बड़ा मुश्किल था …..

लेकिन सविता जी की उम्र को देखते हुए सब्जी वाले लिहाज कर जाते थे …..

और उन्हें थोड़ा कम दाम लगाकर सब्जियां दे देते थे…..

सब्जी लेने के बाद सविता जी आज ज्यादा ही थक गई थी……

क्योंकि गर्मी बहुत थी…..

उन्होंने रिक्शे  वाले को आवाज दी …..

बिटवा अर्जुन नगर  चलोगे का ??.

हां अम्मा  चलेंगे…..

कितना रुपए लोगे??

दे देना ₹20…..

अरे यही पास ही में तो है गली में…..

₹10 ले लेना ठीक है……

अम्मा तुम कहती  हो तो ले लूंगा ……

सविता जी का थैला उस रिक्शे वाले ने अपने रिश्ते पर रखा …..

और उन्हें लेकर के उनकी गली में आ गया….

बहू देविका ने आज ऊपर बालकनी से ही सविता जी को रिक्शे  पर आता हुआ देख लिया…..

अब तो वह आग बबूला  हो गयी….

जैसे ही सविताजी अंदर आई …..

वह हांफ  रही थी…..

आकर के वही गेट के पास बैठ गई …..

ले आई सब्जी ……

आपके ठाठ  बाट अभी भी नहीं गए …..

3500हजार रूपल्ली देती हैं …..

उसमें भी यह रिक्शे  से आती हैं……

दूर ही कितना है बाजार……

10 कम की दूरी नहीं……

उसमें भी रिक्शा करना पड़ गया…..

कितने फूंक  आयी रिक्शे वाले पर  …..

बहू ज्यादा नाये बस ₹10 ही लिए उसने …..

बहुत हार  गई थी …..

और वजन भी बहुत हो गया था सामान का….

अब नहीं उठाया जाता वजन…..

10 साल से तो मैं ही लेती आ रही हूं सामान……

अब तू  बता देना…..

1 घंटे के बाद किराने वाले से भी सामान ले आऊंगी……

अब आप रहने ही दीजिए…..

फिर रिक्शा करके जाएंgee और रिक्शा करके आएंगी ….

आप तो मुझे लुटा देंगी …..

आपको पता भी है आप  पर कितना खर्च होता है …..

सविता जी अपनी साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पोंछने लगी ….

भूख भी बहुत लगी थी…

बोली….

बहू खाना बन गया हो …..तो खाना मिलेगा …..

बैठी रहिए …..

1 घंटे बाद मिलेगा …..

पहले यह सब्जी रख लूं …..

1 घंटे के बाद खाना आया…..

उसमें सूखी आलू की सब्जी और दो रोटी…..

रोटी  में भी घी नहीं लगा था……

जबकि  सभी परिवार वाले घी लगाकर ही रोटियां खाते  थे सिवाय सविता जी के……

और दही का भी स्वाद लेते थे …..

लेकिन मजाल है आज तक सविता जी की थाली में कभी दही आया हो …..

बेचारी किसी तरह से आलू  को मसोदकर उसमें रोटी को अच्छी तरीके से दबाकर रोटी खाती है ……

कि पेट तो भरना ही है …..

अगर जीना है तो…..

किसी तरह उन्होंने पानी ख्व साथ रोटी खत्म की …..

और अपने कमरे में आकर खाट पर लेट गई …..

अपनी करनी पर उन्हें रोना आता कि मेरे पति ने मुझे रानी की तरह रखा…..

और अब क्या मेरी दुर्दशा हो रही है …..

और इसका अंदाजा मेरे बेटे तक को नहीं है …..

आज शिवम  जल्दी ही घर चला आया था…..

मां  पर बहु देविका चिल्लाने में लगी थी…..

ठंडा पानी पियेंगी ….अच्छा खाना खाएंगी …..

सामान लेने जाएंगी तो रिक्शे  से जाएंगी…..

3500  लेकर के आती हैं ……

उसमें इनका खर्चा …..

मुझसे  नहीं होगा आज से …..

आपको जो दो टाइम की रोटी मिलती है…..

वह भी एक टाइम की ही मिलेगी …..

आप समझ लीजिए खाना हो तो खाइये…..

नहीं तो आप कहीं भी जा सकती हैं……

शिवम यह सुनकर तो जैसे बूत  बन गया…..

उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई …..कि यह उसकी वही पत्नी है जो रात जो रोज कितनी अच्छी बनती  है……कि आज मैंने मां जी को यह दिया …..

आज यह खिलाया …..

शिवम पर नहीं रहा गया…..

वह सीधा अंदर आया उसने मां सविताजी को उठाया…..

और रोते हुए उन्हें अपने गले से लगा लिया……

ओ मां …..

तुम्हारी यह हालत मैं नहीं देख सकता …..

देविकातुम अपने घर जा सकती हो …..

तुम्हारे लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद है …..

आइंदा  घर के अंदर आने की कोशिश भी मत करना …..

समझी तुम….

ऐसा मत बोल बिटवा …..

माँ तुम चुप रहो…..

मेरी मां के साथ ऐसा व्यवहार करती आई हो……

मैं  कैसा बेटा हूं ……जो अपनी मां के साथ इतना अत्याचार होता हुआ देखता रहा ……

और समझ भी ना पाया ……

मां…….पापा भी मुझे माफ नहीं कर पाएंगे…..

देविका तो जैसे शुन्न पड़ गई……

शिवम के पैरों में पड़ गई…..

तुम भी इतना ज्यादा कमाकर  नहीं लाते हो…..

अगर उनकी भी पेंशन नहीं लूंगी तो कहां जाती मैं ……

तुम्हारे लिए कमा  कर ला रहा हूं ना……

मुझे तो लगा कि माँ अपनी पेंशन को इकट्ठा करके रख रही है…..कि उन्हे ……कभी उनके लिए काम ही आएगी …..

मुझे क्या पता था कि हर महीने तुम उनकी पेंशन को सफाचट कर देती हो …..

निकल जाओ…..मेरे घर से…..

देविका   चिल्लाती रही……

लेकिन शिवम ने उसकी एक न सुनी…..

उसने शाम को ही वकील को बुलाकर तलाक के कागज तैयार करने को कह दिया ……

क्या शिवम ने सही कहा सही किया अपनी राय दीजिए……

मीनाक्षी सिंह की कलम से

आगरा

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