मम्मी जी.. खाना खा लो 2:00 बज गए, हां बहू.. कितनी बार कहेगी हमें भी पता है! अभी 10:00 बजे हमने दलिए का नाश्ता किया है तुझे खाना बनाने में इतना जोर आता है तो रहने दे हम हमारा खाना खुद बना लिया करेंगे! नहीं मम्मी जी… मैं तो ऐसे ही कह रही थी! दरअसल अभी तरुण ने 3 महीने पहले ही बेंगलुरु से अपना ट्रांसफर कोलकाता की कंपनी में करवा लिया तब तरुण की मम्मी पापा ने कहा…. की बेटा अपने नीचे वाले पोर्शन में तुम रह लेना वैसे भी वह किसी किराएदार को ही देते हैं!
एक बार को तो यह बात तरुण और रिद्धि को बुरी लगी लेकिन उन्होंने सोचा कि हम शायद कुछ अलग ही मतलब निकाल रहे हैं और वह दोनों अपनी मम्मी पापा के साथ खुशी से रहने आ गए! तरुण की शादी को अभी साल भर हुआ था शादी के 8 दिन बाद ही अपनी पत्नी को लेकर बेंगलुरु चला गया था
किंतु उसका अपनी मम्मी पापा के बिना मन नहीं लगता था अतः उसने अपना तबादला कोलकाता की ब्रांच में करवा लिया, अब ऊपर के पोर्शन में मम्मी पापा और नीचे के पोर्शन में तरुण और रिद्धि रहते लगे रिद्धि के साथ ससुर 10:00 बजे नाश्ता करते और कभी 2:00 बजे कभी 2:30 बजे खाना खाते, रिद्धि को दिन में सोने की आदत थी
और जब तरुण 9:00 बजे ऑफिस निकल जाता रिद्धि 11:00 बजे तक अपना खाना खा लेती, कई बार रिद्धि सोचती ठीक है तरुण चले गए और मम्मी पापा भी 2:30 बजे से पहले खाना नहीं खाएंगे तो मैं सो लेती हूं जैसे ही रिद्धि सोने जाती सासू मां ऊपर से आवाज लगाती घर की बहुएं इतनी जल्दी बिस्तर पर चली जाए अच्छा नहीं लगता,
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चल ऊपर आकर मेरी अलमारियां जम बा देना किचन की सफाई करवा दिन थोड़े कपड़ों पर प्रेस भी कर देना, जब हम खाना खा ले उसके बाद तेरे पास काम ही क्या है दिन भर सोने के अलावा, कभी सास ससुर 12:00 बजे ही खाना खाने आ जाते कभी 2:00 बजे तक भी नहीं खाते,
कभी कहते खाने में यह सब्जी बनाना पर खुद कभी बैठी बैठी सब्जियां भी साफ नहीं करती रिद्धि सुबह से शाम तक कभी सब्जियां साफ करती कभी बाजार भाग दौड़ करती रहती, उसके ससुर जी तो एक काम के लिए भी बाजार नहीं जाते यही हाल शाम को होता 2:00 बजे का खाना खाने वाला आदमी 7:00 बजे खाना कैसे खा लेगा,
रिद्धि को रात को भी काम से फ्री होते होते 10 11 बज जाते तब तक तरुण सो गया होता, तरुण कहता …तुम्हारे पास तो मेरे लिए समय ही नहीं है रिद्धि उसे क्या समझाती, बेंगलुरु रहते थे तब भी अगर सुबह की सब्जी ज्यादा बच जाती तो उसी को शाम को काम ले लेते, किंतु यहां तो सास कहती….
बहु हम बासी खाना नहीं खाएंगे हमें तो दोनों टाइम ताजा खाना बना कर दिया करो, अगर कोई उनकी पसंद की सब्जी सुबह बनी होती तो उसे शाम को अवश्य मांगती, अगर घर में कोई भी मेहमान होता सभी लोग खाना रिद्धि के यहां ही खाते और फिर भी सास कभी मदद के लिए नहीं कहती, एकदिन रिद्धि शॉपिंग करने के लिए बाजार चली गई
उसको 7:00 बज गए उसने सोचा चलो आज पुलाव बना लेती हूं तरुण को वैसे भी बहुत पसंद है और जैसे ही पापा मम्मी खाना खाने आए एकदम से बिखर गए… यह क्या बना कर रख दिया अब इस उम्र में हम चावल खाएंगे वह भी रात को, हमें तो तू दाल रोटी बना दे, बहु तुझे कितना जोर आता है
तुझे दो जनों का खाना भी सही से नहीं बनता हम तो पहले कितने जनों का खाना बना लेते थे, तुझे तो कुछ आता ही नहीं है तुझे अपनी सास ससुर की सेवा भी ढंग से नहीं करनी आती, अरे हम सिर्फ दोनों समय का खाना ही तो खाते हैं उनको नहीं पता उनके दो समय खाना खाने से रिद्धि की पूरी जिंदगी डिस्टर्ब हो गई,
मम्मी पापा तो समझने को बिल्कुल तैयार ही नहीं होते एक दिन रिद्धि अपनी सास से बोली…. मम्मी जी क्यों ना हम खाना वाली लगा ले ताकि दोनों समय गरम-गरम खाना मिल सके और मैं भी थोड़ा सा स्वतंत्र हो जाऊं ताकि मुझे बाहर जाने के बाद यह टेंशन नहीं रहे कि आप दोनों भूखे बैठे होंगे, तभी सास बोली…. हां बस एक यही कमी रह गई थी बहू,
सभी चीजों के लिए तो तूने काम वाली लगा रखी है तुझसे खाना भी नहीं बनता और रिद्धि को न जाने क्या-क्या उल्टा सीधा बोल दिया! रिद्धि रोती हुई हुई नीचे आ गई, बात दो समय के खाने की नहीं थी किंतु मम्मी जी की तो तरह-तरह की खाने की फरमाइश ही पूरी नहीं होती ऊपर से वह कोई काम में मदद भी नहीं करती,
एक दिन रिद्धि को अपने मामा की लड़की के यहां जो कोलकाता में ही रहती थी एक कार्यक्रम में जाना पड़ा और उसे आते-आते रात के 9:00 बज गए, रिद्धि तो खाना खाकर आई थी, आकर उसने देखा तरुण और उसकी मम्मी पापा तीनों भूखे बैठे हैं और तीनों अग्नि नेत्रों से उसे घूर रहे हैं किंतु रिद्धि के तो इतनी बस की भी नहीं थी कि वह 9:00 बजे जाकर खाना बना दे
क्योंकि वह दिन भर की थकी हुई थी, सास जैसे ही कुछ कहने को हुई तब रिद्धि ने कहा… मम्मी जी क्या यह घर आपका नहीं है आप तो बिल्कुल पूरी तरह से हमारे ऊपर निर्भर हो गए हैं क्या मैं सभी जगह आना जाना बंद कर दूं सिर्फ आप दोनों के खाने के लिए, मम्मी जी क्या आप तीनों का खाना नहीं बना सकती थी
या फिर आप बाहर से मंगा लेते जबकि मैं कह कर गई थी मुझे लेट हो जाएगा, अब मैं आपको क्या खाना बना कर दूं आप मुझे परेशान करने का एक भी मौका नहीं छोड़ती, आपको बहू नहीं नौकरानी चाहिए थी ऐसा लगता है हमने यहां आकर अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारी है, अब ससुर जी को भी गुस्सा आ गया वह बोले……
बहू की जिम्मेदारी होती है अपने सास ससुर को खुश रखना ना कि खुद आराम की जिंदगी जीना, तू तो आए दिन कहीं ना कहीं घूमती ही रहती है तो क्या हम तेरे चक्कर में भूखे मर जाएं, पापा जी… मैं बाजार जाती हूं घर के सामानों के लिए ही घूमने फिरने नहीं, आपसे तो इतना भी नहीं होता कि आप जाकर सब्जियां ही ले आए
या घर का राशन पानी का सामान ले आए, जब हम लोग यहां नहीं थे उससे पहले भी आप सारे काम करते थे अभी आपकी उम्र भी तो 50-50 साल ही है अभी तो आप ऐसे बुजुर्ग नहीं हुए, मम्मी जी आप को कितना भी अच्छा करके दे दो कभी खुश नहीं होती हर बात पर जलील करती हैं हर बात पर मेरे आत्मसम्मान को आप ठेस पहुंचाते हैं,
मैं भी इंसान हूं मेरी बर्दाश्त की एक सीमा है मैं तरुण को आपके बारे में कुछ नहीं बताती ताकि आप दोनों के बीच में कोई गलतफहमियां ना पैदा हो किंतु आप दोनों तरुण को मेरे खिलाफ उल्टा सीधा बोलते रहते हैं! बहू …. कोई आत्मसम्मान अपने सास ससुर से बढ़कर नहीं होता और तू क्या समझती है
तू खाना देकर हमारे ऊपर एहसान कर रही है अरे अगर तुम दोनों यहां नहीं रहते ना तो मेरे तो इस पोर्शन का ₹10000 किराया आता था, मेरा तो ₹10000 का नुकसान हो रहा है हर महीना जो अलग, मां की ऐसी बातें सुनकर आज तरुण को भी बहुत गुस्सा आ गया की मां तो हमको किराएदारों से भी कमतर मानती है
इसका मतलब मां अपने 10000 की पूर्ति इसी तरह कर रही है ताकि हम उनको दोनों समय खाना बना कर दें और वह किसी भी प्रकार का खर्चा ना करें, इसीलिए आजकल पापा मम्मी की दवाइयां भी मुझसे ही मंगवाते हैं, ताकि उनके 10000 की भरपाई हो, तब तरुण बोला….. मां हमसे बड़ी भूल हो गई कि हमने आपके ₹10000 का नुकसान किया
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, अच्छा होता हम कहीं और किराए का घर लेकर रहते ताकि आप भी अपनी जिंदगी आराम से जीते और हम भी, आपने 3 महीना में जितना रिद्धि को परेशान किया है उसकी भरपाई के आगे तो यह 10000 भी कुछ नहीं है और हां मैं आपको 3 महीने के पूरे ₹30000 दे दूंगा किंतु मैं अपने आत्मसम्मान के लिए एक फैसला लेता हूं
मैं जल्द से जल्द आपका मकान खाली कर दूंगा और अपनी पत्नी को लेकर कहीं और चला जाऊंगा ताकि आपके मन में कभी यह ना आए कि हमारे बेटे की वजह से हम नुकसान में रहे और ऐसा कहकर भारी मन से तरुण और रिद्धि नीचे आ गए,
तरुण और रिद्धि सोच रहे थे क्या बच्चों की खुशी से बढ़कर पैसा सब कुछ है! आज तक तरुण इसका भूल में था कि माता-पिता अपने बच्चों को अपने साथ देखना चाहते हैं किंतु नहीं मां-बाप भी स्वार्थी हो सकते हैं!
हेमलता गुप्ता स्वरचित
कहानी प्रतियोगिता (एक फैसला आत्म सम्मान के लिए )