दोस्तों यह कहानी आज के जनरेशन के लिए है जो बधाओ से तुरंत विचलित हो जाते हैं और अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं— आज की कहानी कुछ इसी तरह की है जिसमें बाधाएं तो आई पर लाजो ने समय को ध्यान में रखकर लक्ष्य को प्राप्त किया । मुझे आशा है कि आप लोगों को ये कहानी जरूर पसंद आएगी ।
“सुखिया की उम्र यही कोई 50- 55 के आसपास थी वह गांव का मेहनती ईमानदार और सीधा-साधा व्यक्ति था जो गांव के मुखिया बंसी लाल जी के यहां खेती-बाड़ी का काम देखता ।पत्नी को मरे 20 साल हो गए उसकी एक बहुत ही प्यारी बेटी लाजो जो 2 साल की थी। मरने की समय लाजो की मां ने सुखिया से एक वादा लिया कि चाहे जो भी हो, बेटी की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ेगा और उसे अपने पैर पर खड़ा करेगा ।
“कभी-कभी सोचता कि बेचारी बच्ची को मैं समय भी नहीं दे पाता अच्छा है कि लाजो को उसके नानी के यहां छोड़ दूं ताकि मैं निर्भय होकर काम कर सकूं••• परंतु बेटी की मोह में वह उसे छोड़ भी नहीं पता ।
समय के साथ-साथ बच्ची बड़ी होती गई—–बेटी का नामांकरण गांव के ही एक प्राइवेट स्कूल में करा दिया। लाजो देखने में जितनी सुंदर थी उतनी ही पढ़ाई लिखाई में होशियार—-स्कूल के सारे शिक्षकगण उसकी बहुत प्रशंसा करते और प्रशंसा सुनकर सुखिया का सीना चौड़ा हो जाता•••। इसी स्कूल में बंसीलाल जी का बेटा निलेश भी पढता था—किसी समारोह या टीचर्स मीटिंग में जब सुखिया और बंसी लाल आपस में मिलते तो बंसी लाल लाजो की प्रशंसा करते नहीं थकते कहते कि यह लड़की एक दिन जरूर इस गांव का नाम रौशन करेगी—-! सुनकर निलेश चीढ़ जाता पिताजी मेरी प्रशंसा तो आप कभी नहीं करते उस लाजो की प्रशंसा तो बहुत करते हो—–बंसीलाल हंस कर उसे पुचकार देते !
लाजो की क्लास में इतनी प्रशंसा और उसका बढ़ता आत्मविश्वास देखकर निलेश भी अपनी पढ़ाई जोर-शोर से करने लगा ताकि वह लाजो से पीछे ना रहे लेकिन फिर भी हर बार लाजो उससे आगे ही रह जाती ।
इस तरह नीलेश के मन में लाजो के प्रति नफरत की भावना घर कर गई अब वह उसे नीचा दिखाने की ताक में लगा रहता। कभी-कभी अपने दोस्तों के ग्रुप में भी उसकी बेइज्जती करने से पीछे नहीं हटता । इन सब के बावजूद भी वह अपने लक्ष्य की ओर केंद्रित थी ।
दसवीं का परिणाम घोषित हुआ पूरे जिले में लाजो टॉप आई और निलेश का द्वितीय स्थान ••• ।
इस समय भी उसे बहुत दुख हुआ कि कैसे लाजो एक बार फिर उससे आगे हो गई।
“पिताजी••• मुझे आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना पड़ेगा–! लाजो सुखिया से बोली । ” बेटा तुझे जो अच्छा लगे तू कर मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है—-! लाजो अपने आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर चली आई।
इधर निलेश भी पढ़ाई करने के लिए शहर चला गया।
7 साल बाद ।
पिताजी मेरी पढ़ाई अब पूरी हो चुकी है आगे की तैयारी में गांव में ही कर लूंगी सोचती हूं घर लौट आऊं—और साथ ही साथ कुछ वक्त आपके साथ गुजारने का मौका भी मिल जाएगा•••! लाजो ने सुखिया से एक दिन फोन पर बात की ।
ठीक है बेटा— जैसी तेरी मर्जी–!
” निलेश की भी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और प्रतियोगिता की तैयारी के लिए उसने भी घर पर ही रहने का फैसला किया—- ।
गांव आते ही ओहो– कितना गंदा कर रखा है आपने घर को— ! क्या कभी सफाई भी नहीं करते थे मेरे जाने के बाद—? कमर पर दुपट्टा बांधते, झाड़ू उठाते हुए लाजो बोली!
” अब तू आ ही गई है तो देख ले–!
हां हां आप अभी जाओ– मुझे घर की सफाई करनी है—- फिर खाना भी बनाऊंगी!
देख बेटा ज्यादा काम-वाम पर ध्यान मत दे•••किताबें लाई है तो पढ़ ले और वो क्या बनना चाहती है तु—— उसे क्या कहते हैं••••? जज•••पिताजी !
हां–वही! मेरी बच्ची खूब पढ़ लिख और इतना नाम काम की पूरा गांव तेरा उदाहरण दे•••••!
लाजो को आए अभी दो ही दिन हुए थे कि एक दिन सुखिया बीमार पड़ गया ।
“पिताजी आपको तो तेज बुखार है— आज आप काम पर मत जाइए—!
बेटा आज तो खेतों में रोपनी का काम होगा मेरा वहां जाना जरूरी है । नहीं आप किसी भी हालत में वहां नहीं जाएंगे–!
पर बेटा— मुखिया जी के घर संदेश तो छोड़ आऊं ताकि वो अपनी दूसरी व्यवस्था कर सकें।
मैं उन्हें बता देती हूं उनकी हवेली जाकर–!
ठीक है जा– पर जल्दी आ जाना।
2 दिन आराम मिलने से वह जल्दी स्वस्थ हो गया।
सुखिया अब कैसी है तेरी तबीयत—? बंसीलाल जी बोले। “अब ठीक हूं मालिक– नीचे बैठने ही वाला था कि चल कुर्सी पर बैठ बंसी लाल जी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए बोलो।
नहीं-नहीं मैं यहां ठीक हूं–! आज मैं तुझे अपने बराबर का बनाने वाला हूं–जी मैं कुछ समझा नहीं–!
” मैं अपने बेटे के लिए तेरी लाजो का हाथ मांगता हूं–” पर सरकार मैं आपकी बराबरी में नहीं–घबराते हुए सुखिया बोला। ये सब बोलने की जरूरत नहीं– परसों मैं और कमला हम दोनों ने लाजो को देखा हमें बहुत पसंद आई और नीलेश की भी जिद है कि वह शादी करेगा तो सिर्फ लाजो से—-।
“पर सरकार अभी तो उसकी पढ़ाई अधूरी है उसको जज बनना– है !
हां हां पढ़ लेगी क्या हमने उसे रोक रखा है मेरा निलेश भी तो “जज की तैयारी कर रहा है दोनों इकट्ठे शादी के बाद भी तो पढ़ सकते हैं—! वह बंसी लाल जी के सामने कुछ बोल नहीं पाया । जा-जा अब शादी की तैयारी शुरू कर दे–!
अब सुखिया उदास सा रहने लगा ना खाना ठीक से खाता ना चैन से सो पता ।
पिता की बेचैनी को लाजो ने भाप लिया–।
इधर कई दिनों से देख रही हूं आप बेचैन से लग रहे हैं क्या बात है बेटी की हमदर्दी सुन सुखिया ने सारी बात लाजो को बता दी ।
क्या तुझे यह रिश्ता पसंद है बेटा—? मैं तुझ पर छोड़ता हूं तू जैसा बोलेगी मैं वही करूंगा–! कहीं ना कहीं लाजो भी बचपन से निलेश को पसंद करती थी लेकिन उसके इस व्यवहार की वजह से उसने कभी जाहिर नहीं होने दिया लेकिन अब चुकी उसने ये सुना की निलेश सामने से उसे शादी के लिए बोल रहा है तो पिताजी— अगर आपकी मर्जी हां— में है तो मैं भी शादी के लिए तैयार हूं—! रही बात पढ़ाई की तो मैं किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्य को पाने के लिए कठिन से कठिन परिश्रम करूंगी ये मेरा” पहला और अंतिम फैसला” है—-!
बड़ी धूमधाम से निलेश और लाजो की शादी हो गई ।
निलेश के द्वारा लाजो को पाने की जिद प्यार नहीं एक’ षड्यंत्र ‘था उसको फिर से जलील करने का— । उसे इस बात का मलाल था कि वह गरीब की बेटी होकर मुझसे आगे कैसे जा सकती है••••।
सुहागरात के दिन जब लाजो नीलेश के इंतजार में बैठी थी लेकिन उसका कहीं कोई अता पता नहीं था रात के 2:00 चुके थे। बाथरूम के लिए जब वह बाहर आई तो पति निलेश और उसके कुछ दोस्तों के बीच हुई वार्तालाप सुनकर उसके तो पैर तले जमीन खिसक गई।
“मैंने ये शादी सिर्फ उसे गरीब घमंडी लड़की का घमंड तोड़ने के लिए किया सो कर दिया है– अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका आगे क्या होगा—” बड़ी आई थी “जज बनने—!अब उसका और उसकी मां का सपना अधूरा रह जाएगा—! “पर यार– आज सुहागरात है कम से कम सुहागरात तो मना ले–
सुहागरात तो दूर मैं उसे गरीब सुखिया की बेटी को देखना भी पसंद नहीं करता—! सारी बात सुनकर लाजो के तो होश ही उड़ गए वह चुपचाप अपने कमरे में आकर रोने लगी। क्या करूं– पिताजी को अगर इस बात की जानकारी मिली तो वह जिंदा नहीं बचेंगे— अब मुझे ही इस परिस्थिति से निकलने का कुछ उपाय ढूंढनी होगी ।
सुबह-सुबह किचन में लाजो ने सबके लिए नाश्ता तैयार किया— बंसीलालजी और पत्नी कमला देवी बहुत प्रसन्न थे।
हमारी बहू तो साक्षात लक्ष्मी का रुप है –यह खानदानी कंगन जो मेरी सास ने मुझे दिया अब मैं तुम्हें दे रही हूं कमला लाजो के हाथ में कंगन पहनाते हुए बोली— । तभी– आओ आओ समधी साहब— आप सही समय पर आए हो– लाजो— ! पिताजी को अपनी बनाई खीर तो खिलाओ–! चारपाई पर बैठने का इशारा करते हुए बंसीलाल घर के अंदर चले गए ।
सब ठीक तो है ना बेटा—-!
यहां सब अच्छे हैं पिताजी—! पिताजी आपको मेरे लिए एक काम करना होगा ।
हां बोल—!
मेरी सारी किताबें आप पीछे के दरवाजे से मुझे दे देना किसी को पता नहीं चलनी चाहिए—!
अब मेरे परीक्षा के चार महीने ही रह गए हैं।
किताबें लाजो को मिल गई।
उधर निलेश लाजो को किचन में खाना बनाते तथा सास ससुर की सेवा में दिन गुजरते देख बहुत खुश हो रहा था–” चलो अब आई ऊंट पहाड़ के नीचे”
जब नीलेश के सोने का समय होता उधर लाजो की पढ़ाई शुरू होती— ।
दोपहर में लाजो काम-वाम निपटाकर दो-तीन घंटा सो जाया करती ।” अब परीक्षा का डेट नजदीक आ गया ।
परीक्षा हॉल में बैठने की ख़्वाहिश जरुर पूरी हो जाएगी सोचते हुए निलेश हंस पड़ा– परीक्षा हॉल से निकल कर वह काफी दुखी था परंतु लाजो अंदर ही अंदर खुशी से झूम रही थी परंतु चेहरे की भाव सामान्य थे ।
जब परिणाम घोषित हुआ तो निलेश असफल तथा लाजो उत्तीर्ण हो चुकी थी ।
अब वह “जज “बन चुकी थी पूरे गांव में लाजो का ही नाम हो रहा था।। बंसीलाल जी ने गांव में भव्य समारोह का आयोजन किया। बधाई हो सुखिया—-बेटी जज बन गई—-!आपको भी बधाई—! कहते हुए दोनों एक दूसरे से गले मिले ।
इधर निलेश काफी परेशान सा था ।
बहुत-बहुत मुबारक हो तुम्हें जज बनने के लिए—निलेश लाजो से नज़रे चुराते हुए बोला।
मैं तुमसे कुछ पूछ सकता हूं—? हिचकिचाते हुए पूछा।
“मुझे पता है तुम्हारे मन में ये सवाल उठ रहे होंगें कि इतनी व्यस्तता के बावजूद भी मैंने कैसे समय निकाला—?
हां—! निलेश झट से बोल पड़ा।
सुहागरात के दिन मैंने तुम्हारीऔर तुम्हारे दोस्तों के बीच हुई बात को सुन लिया था । समय की कमी और कोई बाधा ना हो इसलिए जब तुम सो जाते थे तब मैं पढ़ती—!
“सॉरी—–! मुझे माफ कर दो— मैंने तुम्हें नीचा दिखाने की बहुत कोशिश की जिसकी सजा मुझे भगवान ने दे दी—!
कोई बात नहीं— “मैं तुम्हारी पत्नी हूं तुम्हारी अर्धांगिनी तुम्हारे सुख दुख की भागीदारी—!फिर दोनों एक दूसरे के गले मिले– । नीलेश अब अगली बार के परीक्षा की तैयारी में लग गया—-परंतु इस बार उसके साथ लाजो थी ।
दोस्तों अगर आपको मेरी कहानी पसंद आई हो तो प्लीज इसे लाइक्स ,शेयर और कमेंट्स जरुर कीजिएगा ।
धन्यवाद ।
मनीषा सिंह