अनुराधा यूँ ही बेड पर लेटे-लेटे कुमार सर के बारे में सोचते हुए कब सो गई उसे पता ही न चला, सुबह जल्दी जल्दी तैयार होकर वह ऑफिस जाने को निकली ही थी, तभी उसे याद आया कि कल उसने अपने पापा को शाम को तो फ़ोन ही नहीं किया था, पिछले दो वर्ष में यह शायद पहला मौका था जब उसने घर से बाहर होने पर अपने पापा की खैरियत जानने के लिए शाम को फ़ोन न किया हो, मार्केट में मोबाइल फ़ोन
आए करीब तीन वर्ष हो चुके थे, फिर भी अनुराधा अभी तक मोबाइल फोन को विलासिता की वस्तु ही मानती थी, इसलिए उसने अभी तक मोबाइल फोन नहीं खरीदा था, चूंकि गेस्ट हाउस का नंबर पिताजी के पास नहीं था, इसलिए उनका भी फ़ोन नहीं आया था। अन्यथा जब कभी ट्रेंनिग के दौरान मसूरी में अनुराधा व्यस्तता के कारण शाम को फोन नहीं कर पाती तो रात 11 बजे तक उसके पिता वीरेश्वर मिश्रा जी खुद ही फोन लगाकर अनुराधा की खैरियत पूछ लेते थे।
गेस्ट हाउस से अनुराधा का कार्यालय पैदल चलने योग्य दूरी पर था, इसलिए वह तुरंत यह सोच कर पैदल ही निकल गई की रास्ते में कोई पीसीओ मिला तो अपने पिता से संक्षिप्त में बात करके खैरियत तो पूछ ही लेगी। परन्तु रास्ते में को पीसीओ था, वो भी वो सुबह होने के कारण अब तक खुला भी नहीं था।
मन मारकर अनुराधा ने सोचा की अब वह कार्यालय पहुंचते ही ऑफिस के फ़ोन से अपने पिता से बात कर लेगी, परन्तु उसके ऑफिस पहुंचने के पहले ही कुमार सर और इंस्पेक्टर विनोद ऑफिस पहुंच चुके थे, उसने कुमार सर का अभिवादन किया तो कुमार ने अभिवादन स्वीकारते हुए कहा कि अच्छा हुआ आप जल्दी आ गई, हमें तुरंत ही पास के ओवरब्रिज का औचक निरीक्षण करना है, आप जल्दी गाड़ी में बैठो, बाकी बात हम कार में ही कर लेंगे।
कुमार सर ने इतने अधिकार से अपनी बात रखी कि अनुराधा मना नहीं कर सकी।
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आज कुमार सर कुर्ता पैजामा और इंस्पेक्टर विनोद जींस और टीशर्ट पहनकर आए थे, उनकी वेशभूषा को देखकर तो सहसा कोई भी उन्हें सामान्य आदमी जैसा ही समझ सकता था।
उस ओवरब्रिज तक जाने के लिए भी उन्होंने कोई प्राइवेट कार मगवाई थी जिसे इंस्पेक्टर विनोद ड्राइव कर रहा था, कुमार सर उसके साथ आगे की सीट पर थे और अनुराधा अकेली पीछे की सीट पर थी। कुमार सर ने किसी को मोबाइल से फोन लगाकर कहा कि सर, हम 30 मिनट में वहां पहुंच जाएंगे, आप सेफ्टी के लिए हमारे बेकअप में सिविल वर्दी में 20-25 लोगों की टीम पास में ही रखना, कोई अनहोनी की आशंका हो, तो मै आपको मोबाइल फोन पर एक रिंग देकर फ़ोन काट दूंगा।
कुमार सर को फ़ोन पर बात करते देख अनुराधा को याद आया कि उसे अपने पिता से बात करनी थी, उसने सहमते हुये कुमार सर से कहा कि सर, यदि रास्ते में कोई पीसीओ मिले, तो क्या आप 5 मिनट के लिए रोक सकते हैं, मैंने कल से अपने पिताजी से बात नहीं की है, वो मेरे लिए परेशान हो रहे होंगे।
उसकी बात सुनकर कुमार सर ने कहा कि हम ऐसे ऑपरेशन के समय किसी को भी फोन पर बात करने की अनुमति नहीं देते, अगर आपको बहुत जरूरी हो, तो मेरे मोबाइल से आप उन्हें संक्षिप्त में बता कर शाम को आराम से बात कर लेना, पर इस ऑपरेशन के बारे में कोई बात मत करना।
अनुराधा को पहली बार लगा की कुमार सर कितनी जिम्मेदारी से काम करते है, उसने कुमार सर से अपने पिता वीरेश्वर मिश्रा जी के लखनऊ के लेंडलाइन फोन पर फोन लगाने को कहा, फोन पर दूसरी और से आवाज आते ही कुमार सर ने अपना मोबाइल अनुराधा को से दिया, अनुराधा ने कहा पिताजी प्रणाम, Sorry कल कार्य की अधिकता के कारण आपको फ़ोन नहीं कर पाई,
आज शाम को आपसे फ़्री होकर आराम से बात करूंगी, दूसरी ओर से उसके पिता की आवाज सुनाई दी, बेटी अनुराधा तुम ठीक को न, तुमने डयूटी ज्वाइन कर लिया न, कोई प्रॉब्लम तो नहीं है न वहां, रहने का कुछ इंतजाम हुआ क्या तुम्हारा, यहां हम सब ठीक है, तुम हमारी चिंता मत करो, अनुराधा ने संक्षिप्त में कहां पिताजी यहां सब ठीक है, मै आप सब से शाम को आराम से बात करूंगी।
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अनुराधा के फ़ोन काटते ही कुमार सर ने कहा, अच्छा हुआ आपने उनको फ़ोन कर लिया, आपके पिताजी तो बहुत परेशान हो रहे थे, आप हमारा ये ऑपरेशन खत्म होने के बाद ऑफिस पहुंचकर इत्मीनान से बात कर लेना, इतना कहकर कुमार सर न जाने किस बात को सोचते सोचते खो गए, उनके चहरे के भाव बहुत तेजी से बदल रहे थे, पर अनुराधा अपनी महज़ दो दिन की पहचान के दम पर उनसे इतना व्यक्तिगत प्रश्न नहीं कर सकती थी।
अनुराधा चुपचाप कार की खिड़की से पीछे छूटती गाडियां, झाड़, मनुष्य और भागती हुई सड़क को देख रही थी, गाजियाबाद आने का उसका यह पहला ही अनुभव था, इसलिए उसे इस शहर को जानने की उत्सुकता भी थी। लगभग आधे घंटे में एक अंडर कंस्ट्रक्शन ओवरब्रिज से लगभग 100 मीटर पहले कुमार सर ने अनुराधा को उतरने को कहा और एक फाइल लेकर वह स्वयं भी उतर गए।
इंस्पेक्टर विनोद कुशवाहा को उन्होंने आपात स्थिति होने की दशा में क्या करना है, यह पहले ही बता चुके थे, इसलिए विनोद कुशवाहा उस स्थान से कुछ दूर कार बंद करके कार का बोनट खोल कर, कार को इस तरह देखने लगे मानो उसमें कोई परेशानी आ गई हो और वह उसको समझने का प्रयास कर रहे हों।
कुर्ता पैजामा पहने हुए कुमार सर, और उनके साथ में इस तरह पैदल रास्ते पर चलती अनुराधा किसी भी परिस्थिति में उस इलाके के कलेक्टर तो ही नहीं लग रहें थे, उपर से कुमार सर ने अनुराधा को दुपट्टा सिर के ऊपर से ओढ़ने को कहा, इस तरह वह दूसरों को किसी शादी शुदा युगल होने का अहसास करवा रहे थे।
कुमार सर ने चुपचाप अनुराधा को किस वक्त क्या करना है, यह सिखा दिया था। उसी प्लान के अनुसार अनुराधा ने कुमार सर के साथ धीरे धीरे कंस्ट्रक्शन साइट में काम के लिए आए मजदूरों की तरफ देखकर, कुमार सर से कहा, सुनिए यदि हम इनसे ही सीमेंट ले लें तो हमें बहुत सस्ते दर पर सीमेंट मिल जाएगी न? कुमार सर ने अनुराधा की तरफ देखकर उस मजदूर को सुनाते हुए कहा कि हमें तो करीब छह ट्रक सीमेंट चाहिए
यह लोग इतनी ज्यादा सीमेंट थोड़ी ही दे पाएंगे। इतना कहकर उन मजदूरों को क्रॉस करके आगे की और बढ़े, तभी उनमें से एक मजदूर ने उन्हें रुकने का इशारा करके कहा, आपको कितना सीमेंट चाहिए, इस पर कुमार ने कहा अरे आप नहीं दे पाओगे मुझे दो दिन में पांच ट्रक सीमेंट लगेगी, और वह भी कम दाम में, वह मजदूर उन्हें वहीं रुकने का इशारा करके अपने ठेकेदार के लिए बने अस्थाई क्वाटर में गया, कुछ देर बाद उस मजदूर के साथ में ठेकेदार भी आ गया, उसने अनुराधा और कुमार सर को परखने के अंदाज़ से पूछा कि इतनी सीमेंट का आप लोग क्या करोगे?
कुमार सर ने कहा कि हमारी यहां पास के ही गांव में करीब 20 एकड़ की खेती की जमीन है, उसकी पक्की फेंसिंग करना है, साथ ही एक कुँआ भी बनवाना है थोड़ा जल्दी..
ठेकेदार ने फिर पूछा इतनी जल्दी क्यों है आप लोगों को?
कुमार ने कहा कि हम लोग भले ही गाँव में ही रहते है पर मेरा छोटा भाई न्यूयार्क में आईटी कंपनी में काम करता है, उसी ने हमें पैसे भिजवाकर जताया है कि दो महीने बाद जब वह भारत में आयेगा तब तक पक्की फेंसिंग और कुँए का काम हो जाना चाहिए।
ठेकेदार अब थोड़ा आश्वस्त हुआ, उसने कहा की माल का कोई बिल नहीं मिलेगा, तो कुमार ने कहा कि भाई हम लोग गांव के लोग है हमें बिल वगैरह से क्या करना है, बस आप एक कागज पर लिख कर सील लगा कर दे देना वहीं बिल मै अपने भाई को भी दिखा दूंगा।
अंत में सीमेंट के रेट की बात तय करना था, कुमार सर ने 40 रुपए बोरी का रेट मांगा, मार्केट रेट सीमेंट का रेट 90 रुपए बोरी था, परन्तु ठेकेदार 50 रुपए बोरी से नीचे देने को तैयार नहीं था,जब कुमार ने उसे कहा कि भाई मुझे करीब 2000-2200 बोरी सीमेंट लगेगी तो वह बोला की ठीक है आप मुझे एक लाख रुपए दे देना और 2500 बोरी सीमेंट ले जाना, लेकिन गाड़ी की लोडिंग की जवाबदारी और ट्रक का भाड़ा आपको ही देना पड़ेगा, माल रात को ही लोड करना होगा।
कुमार के बिछाए जाल में वह ठेकेदार पूरी तरह से फंस रहा था, कुमार सर ने अपने कुर्ते से बीड़ी का बंडल निकाला और एक बीड़ी ठेकेदार को देते हुए उसने स्वयं भी माचिस से बीड़ी जलाई और बीड़ी का कश मारते हुए उस ठेकेदार से बोला भाई इसकी क्या गारंटी है कि आप मुझे मिलावटी सीमेंट नहीं दोगे? और क्या आपके पास इतना सारा सीमेंट मिल जाएगा वो भी सिर्फ दो से तीन दिन में?
ठेकेदार के हिसाब से वह कुमार को शीशे में उतार चुका था, इसलिए वह ठेकेदार अपनी डींगे हांकते हुए बोला भाई तुम तो कुछ नहीं जानते हो, हमें मिलावटी सीमेंट बेचने की क्या जरूरत है, जब यही अच्छी सीमेंट हमें मिट्टी मोल मिल जाती है?
कुमार सर ने चौंककर कहा क्या बात करते हो ?? मिट्टी मोल!!
इसी के साथ कुमार सर ने तम्बाकू कि डिबिया निकाली और चूना रगड़ रगड़ कर तंबाकू बनाने लगे, उस समय उनको बीड़ी पीते और तम्बाकू बनाते देख कर, कोई भी यकीन नहीं कर सकता था, कि वह कितना पढ़ा लिखा इंसान है। कुमार सर ने अपनी बनाई तम्बाकू ठेकेदार को शेयर करते हुए कहा कि भाई माजरा क्या है कुछ मुझे भी कुछ बताओ, समझ आ गया तो आगे भी माल आपसे ही लूंगा।
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ठेकेदार ने अपनी लेबर को इशारे से दूर जाने को कहा, फिर उसने कुमार सर के कंधे में हाथ रखकर वह यूँ समझाने लगा मानो कुमार सर नहीं वह कोई गांव का भोला भाला आदमी हो।
ठेकेदार ने कहा ये हमारा “आर.टी. कंस्ट्रक्शन” का काम मंत्री जी के करीबी “रीतेश ठाकुर जी” का ही है, गाजियाबाद में किसी भी सरकारी सिविल कंस्ट्रक्शन के काम का टेंडर निकलता है, उसे लेने के लिए डाले जाने वाले सारे टेंडर हमारे मंत्री जी के करीबी आदमियों की कंस्ट्रक्शन कंपनी के ही होते है, उन लोगों के अलावा कोई और टेंडर डाल दे तो मंत्री जी उसकी जान तक ले लेंगे।
इस तरह टेंडर डालने से पहले ही मंत्री जी जानतें हैं कि उनके किस आदमी को कितना रेट टेंडर में भरना है, सामान्यतः अपनी वास्तविक लागत से दस गुना तक का रेट भरकर टेंडर का रेट कॉन्ट्रैक्ट मंत्री जी द्वारा ही निश्चित किया जाता है, और मंत्रीजी उस आदमी से अपने कॉन्ट्रैक्ट दिलाने के एवज में भारी भरकम कमिशन लें लेते हैं, इस कार्य के लिए हमें शासन द्वारा कंट्रोल रेट पर सीमेंट, गिट्टी और रेत मिल जाती है, हम लोग शासन को तीन भाग रेत और एक भाग सीमेंट के हिसाब से सीमेंट का व्यय दिखाते हैं और वास्तविक में सात से आठ भाग रेत और एक भाग सीमेंट मिलाकर कंस्ट्रक्शन कर देते है। और इस तरह से बची हुई सीमेंट ब्लैक में तुम जैसे लोगों को बेच देते हैं।
इस पर कुमार ने अचंभित होते हुए कहा कि फिर तो ब्रिज खराब क्वॉलिटी का बनेगा और जल्दी ही गिर भी तो जाएगा न, इस पर ठेकेदार कुमार को आँख मारकर बेशर्मी से बोला तभी तो बार बार ब्रिज बनाने का टेंडर निकलेगा और हमें बार बार काम मिलेगा।
कुमार को जो जानकारी चाहिए थी, वह सब उसे मिल ही चुकी थी, ठेकेदार के लिए चारा डालकर बड़ी मछली यानी मंत्री जी का शिकार करना था, यह सब तभी हो सकता था जब उन सबको रंगे हाथ पकड़ा जा सके, इसलिए कुमार सर ने अनभिज्ञ बनते हुए कहा कि भाई मेरा पांच ट्रक सीमेंट बिना बिल के जाने पर पुलिस मुझे परेशान तो नहीं करेगी न?
ठेकेदार बोला एक तो मंत्री जी के नाम के आगे पुलिस कभी हमारे पास तक आती ही नहीं, और अगर आ भी गई तो यहां पर हर कोई बिका है जी, 100-200 रुपए उनके मुंह पर मारो तो खुद आगे आकर नाका क्रॉस कराने तक की जवाबदारी ले लेते है। कुमार के साथ साथ अनुराधा को भी इस बात पर थोड़ा आश्चर्य हुआ।
खैर!! प्लान के मुताबिक कुमार ने उस ठेकेदार से कहा कि ठीक है जी मै कल आता हूँ ट्रक लेकर, ट्रक किधर लगाना है यह बता देना।
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ठेकेदार ने कहा कि भाई ये सब काम एडवांस पर होता है, मुझे 50% कैश भी एडवांस दो तब मै माल मंगवा कर रखूंगा, कुमार की पढ़ाई स्क्रिप्ट के अनुसार अनुराधा ने अपनी पर्स खोल कर सारे रुपए गिनने का अभिनय करते हुए कहा कि, सुनिए अभी तो मेरे पास सिर्फ पांच हजार रूपए ही है, आपके पास कितने है, कुमार ने अपनी पर्स से हज़ार रुपए निकाल कर कुल छ हज़ार रुपए ठेकेदार को पकड़ाकर बोला कि अभी यह रुपए तो रखो, बाकी के पैसे घर और बैंक से लाकर परसों आपको दे दूंगा, बिना पैसे लिए आप हमें सीमेंट मत देना।
ठेकेदार चिढ़ते हुए बोला कि भाई पैसे लेकर ही बात करना था न, बिना पूरे पैसे लिए मै एक बोरी सीमेंट भी नहीं उठाने दूंगा, और इसके लिए मै आपको अधिक से अधिक कल शाम तक का ही वक्त देता हूं, तुम नहीं आए तो यह एडवांस भी भूल जाना।
कुमार ने उसे कहा कि ठीक है भाई मै कल शाम से पहले ही बाकी के पूरे पैसे लेकर आपसे मिलता हूँ जब हम पूरे पैसे दे दे तभी हमें सीमेंट दे देना। उसके बाद कुमार और अनुराधा वहां से निकल आए, कुछ दूर आगे इंस्पेक्टर विनोद कुशवाहा उन दोनों को अपनी तरफ़ पैदल आते देख ही रहा था, उसे इशारे से पीछे आने को कहकर कुमार सर और अनुराधा मुख्य सड़क तक आ गए।
सड़क पर इंस्पेक्टर विनोद कुशवाहा जब कार के आया तो, उन्होंने सावधानी से देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है फिर वह दोनों कार में बैठ गए, उसके तुरंत बाद उन्होंने कमिश्नर साहेब को मोबाइल से इत्तिला दी कि सर प्लानिंग के मुताबिक काम हो गया है।
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कुटील चाल (भाग-7) – अविनाश स आठल्ये : Moral stories in hindi
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अविनाश स आठल्ये
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