जिस तरह अच्छे दिन जल्दी गुज़र जाते हैं उसी तरह बुरा वक्त भी निकल ही जाता है, अनुराधा के बिना भी वीरेश्वर मिश्रा, उनके मित्र भास्कर राव त्रिवेदी और सुलक्षणा का वक्त भी लखनऊ में उनके “ओल्ड होम” में वृद्धजनों की सेवा एवम् अन्य समाजसेवी कार्य करते हुए धीरे धीरे बीत रहा था, त्यौहारों में क़भी क़भी अनुराधा का आना और आकर अपनी ट्रेंनिग की ढेर सारी बातें बताना उस घर में एक नया उत्साह भर देता था। मग़र उसके वापस मसूरी जाते ही उन तीनों की दुनियां फिर उबाऊ हो जाती थी।
बीच बीच में सुलक्षणा और भास्कर राव ने अपने बेटे अरविंद के बारे में पता करने की काफ़ी कोशिश की पर उन्हें आस पास के किसी भी क्षेत्र में “अरविंद त्रिवेदी नाम” से कोई ऐसा पदाधिकारी नहीं मिला जिससे वह संपर्क करके, मिलने का प्लान बनाया जा सके।
★
अब वह दिन भी आ गया जब अनुराधा को ट्रेंनिग पूरी होने पर उसकी नियुक्ति पत्र मिला, उसे गाजियाबाद में कलेक्टर पद पर अगले 15 दिनों में ज्वाइन करना था।
वीरेश्वर मिश्रा की तो मानो मनमांगी मुराद पूरी हो गई थी, पूरे सप्ताह भर अनुराधा की धमकाचौकड़ी, मूवी देखना, जरूरी सामान की शॉपिंग और सुलक्षणा का अनुराधा के मनपसंद व्यंजनों का बना बनाकर खिलाना, और गाजियाबाद में उसके लिए अतिरिक्त मिठाईयां व नमकीन बनाकर रखा जा रहा था, घर में ऐसा लग रहा था कि मानो दीवाली आ गई हो, और हो भी क्यों न बेटी अनुराधा ने पूरे मिश्रा खानदान का नाम रोशन किया था, इसलिए तो उसके न जाने कितने जाने और अनजाने रिश्तेदार इन दिनों में उसे फ़ोन कर करके बधाइयां दे रहे थे, जिन रिश्तेदारों ने माँ गुज़र जाने के बाद कभी पलट कर मिश्रा जी का कुशल क्षेम भी नहीं पूछा, वो सब आज अनुराधा को अपने यहां आने का निमंत्रण दे रहे थे।
★
ठीक पंद्रहवें दिन नियुक्ति पत्र के निर्देशानुसार अनुराधा ने मेरठ के कमिश्नर के कार्यालय में जाकर अपना नियुक्ति पत्र दिखाया, कमिश्नर बी के श्रीवास्तव लगभग 50 वर्ष के रोबदार व्यक्ति थे, उन्होंने और उनके स्टाफ ने पुष्पगुच्छ देकर अनुराधा का स्वागत करते हुये परिचय कराया, जरूरी खानापूर्ति के बाद कमिश्नर सर ने अनुराधा को दोपहर अपहरांत से अपने कलेक्टर कार्यालय गाजियाबाद में ज्वाइन करने का निर्देश दिया, उन्होंने कहा कि अभी वह भी कुछ विशेष कार्य से गाजियाबाद के अपने अस्थाई कार्यालय में रहेंगे, कोई समस्या हो तो उसे तुरंत सूचित कर सकती है, कहकर उन्होंने अपना मोबाइल नंबर भी अनुराधा को शेयर किया।
गाज़ियाबाद पदस्थ इंस्पेक्टर विनोद कुशवाहा के साथ नीली बत्ती की एंबेसडर से अनुराधा को गाजियाबाद भेजा गया, यह अनुराधा की जिंदगी का सबसे रोमांचक पल था, लगभग 1.30 घंटे बाद कार गाजियााद के कलेक्टर ऑफिस में आकर रूकी।
गाज़ियाबाद कलेक्टर कार्यालय में भी अनुराधा के स्वागत में उसका स्टाफ, स्थानीय विधायक और उनके लोग उपस्थित थे, पुष्पगुच्छ और मिठाई देकर विधायक ने अनुराधा का स्वागत किया, कुछ देर बाद कमिश्नर श्रीवास्तव जी ने अनुराधा को फ़ोन पर बताया की आज शाम से ही उसके लिए गेस्ट हाउस में रहने की व्यवस्था की गई है।
उसके लिए “सरकारी कलेक्टर आवास” निवर्तमान कलेक्टर “ए. कुमार” जिनका हाल ही में मथुरा में तबादला हुआ है, के मथुरा शिफ्ट होने के बाद साफ सफाई , मरम्मत करवाकर लगभग एक माह में अनुराधा को आवंटित हो जाएगा। तब तक उसे गेस्ट हाउस में रहने की अनुमति दी गई थी। और अनुराधा को उसे कार्य के बारे में “इंडक्टन” और विस्तृत जानकारी कल से यही पूर्व कलेक्टर ए.कुमार ही देने वाले हैं।
★
अगला दिन अनुराधा की जिंदगी का सबसे सुनहरा दिन था, वह आज अपने व अपने परिवार के वर्षो संजोए सपने “कलेक्टर” की कुर्सी पर पदासीन होने वाली थी। अनुराधा अपने ऑफिस वक्त से 15 मिनट पहले ही अपने कार्यालय में पहुंच गई तो देखा कि अभी चपरासी उसके दफ्तर की टेबल कुर्सियां साफ़ कर रहा था, इसलिए वह कार्यालय के ठीक सामने बने गार्डन में लगे फूल, पोधों और उन पर मंडराती तितलियों को देख कर खो सी गई थी। तितलियों को देखकर अनुराधा को भी स्वप्निल आकाश में अपने रंग बिरंगे पंखों से उड़ने का अहसास होने लगा।
तभी अचानक उस गार्डन के पास एक आदमी तेज़ी से उससे हल्का सा टकराते हुए आगे की तरफ बढ़ा, अनुराधा जो कल ही यहां की कलेक्टर बनी थी उसे यह इस व्यक्ति की ऐसी हरकत नागवार गुजरी, उसने चिल्लाकर उस व्यक्ति को रोक कर बोला सुनिए मिस्टर…अबतक अनुराधा को उस व्यक्ति के मुंह से शराब की दुर्गंध भी आ चुकी थी, वह भड़ककर ज़ोर से बोली, शर्म नहीं आती इस तरह से महिला को टक्कर मारकर चलते हुए, क्या आपके खानदान ने आपको यही संस्कार दिए है, आपके माता पिता को न जाने कितनी ग्लानि हुई होगी आपको पैदा करके….
अनुराधा भड़ककर बोले जा रही थी, तभी उस व्यक्ति के पीछे खड़ा इंस्पेक्टर अनुराधा को रोकने का बार बार प्रयास कर रहा था, मैडम सुनिये तो.. वह अपनी बात बोल ही नहीं पा रहा था, शायद अनुराधा को भी कल ही मिले सम्मान से कुछ ज्यादा बड़बोलापन आ चुका था। तभी वह आदमी उसके सामने शालीनता से हाथ जोड़कर बोला “I am extremely sorry for that, I was in hurry so I couldn’t able to control my steps.”
उसका माफ़ी मांगने का अंदाज़ अनुराधा को अच्छा लगा, पर फिर भी वो उस पर रोब जमाते हुए बोली अगर तुम ड्रिंक करके नहीं आते तो तुम्हारे स्टेप्स तुम्हारे कंट्रोल में होते, तुम मुझसे इस तरह नहीं टकराते, दरअसल अनुराधा अचानक हाथ आये इस मौके का फ़ायदा उठाकर पूरे स्टाफ के सामने अपनी कड़क छवि का नज़ारा पेश करने में जुट गई थी वह इस अवसर को यूँ ही नहीं गवांना चाहती थी।
★
वह व्यक्ति उसे बिना कुछ बोले ही अनुराधा के कार्यालय की तरफ ही बढ़ गया, उसके साथ साथ पीछे से वह इंस्पेक्टर भी उसके ऑफिस में आया, अनुराधा ने मन ही मन सोचा चलो यह तो मेरे ही पास किसी काम से आया है, अब मै इसे और अच्छे से मजा चखाती हूं। अनुराधा जानबूझकर और 10 मिनट रुककर अपने ऑफिस में अंदर आई ताकि उस व्यक्ति को अनुराधा का इंतजार करना पड़े, न जाने एक ही दिन में अनुराधा में यह घमंड कहां से आ गया था।
कुछ वक़्त बाद अपने ऑफिस में पहुंचकर अनुराधा ने देखा कि वह व्यक्ति तो उसके बगल वाली कुर्सी पर ही बैठा है, अनुराधा आने से जहां सारा स्टाफ उठ खड़ा हुआ, जबकि वह व्यक्ति शांति से अपने साथ लाए दस्तावेज़ में खोया हुआ था। अनुराधा का पारा एक बार फिर सातवें आसमान पर पहुंच गया था, पर इस बार अनुराधा कुछ बोल पाती उस व्यक्ति के साथ आए इंस्पेक्टर ने उस व्यक्ति को अनुराधा का परिचय कराया, बोला She is miss Anuradha, New Joined Collector.
अनुराधा इससे पहले कुछ बोल पाती, वह व्यक्ति शालीनता से उठकर उसकी और हेंड शेक करने को हाथ बढ़ाते हुए बोला, Welcome Miss Anuradha, I am A Kumar, came here for your induction and to brief about your role and job responsibilities.
अनुराधा का मुँह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया, गलती उसकी भी नहीं थी, वह समझती थी कि लाखों रुपए तनख़ाह पाने वाले कलेक्टर ब्रांडेड कपड़े, इंपोर्टेड घड़ी, और महंगे जूते पहनने वाला व्यक्ति होगा, पर यह श्रीमान ए कुमार तो करीब 30-32 साल का बेतरतीब बिखरे बाल, साधारण से कपड़े, जूते और घड़ी पहने हुये थे शेविंग भी दो दिन से नहीं की, ऐसा व्यक्ति कैसे कलेक्टर हो सकता है।
तभी Mr A. Kumar ने अनुराधा से कहा, रिलेक्स, ऐसा होता रहता है, आप मुझे नहीं जानती थी, और मै आपको नहीं जानता था, परन्तु आपका ज्वॉइन करने के साथ ही अपने पोस्ट का इतना रोब जमाना भी ठीक नहीं है, इससे आपके पास दीन-दुखी और शोषित व्यक्ति आने में ही संकोच करेंगे, ऐसे में आप उनकी तकलीफ़ कैसे जान पाओगी?
अब गलती कि माफ़ी मांगने की बारी अनुराधा की थी, उसने कहा, सॉरी सर मुझे लगा कि किसी ने मेरे साथ बदतमीजी की है इसलिए मै कुछ ज्यादा ही भड़क गई थी। आगे से मै अपने गुस्से को कंट्रोल करने की कोशिश करूंगी । अनुराधा स्वयं अपने इस बदले हुए व्यवहार से आत्मग्लानि से भर गई थी।
★
दिन भर के इंडक्शन में ए. कुमार सर ने उसे उसके काम की सारी बारीकियां समझाई, यह भी बताया कि जरूरी नहीं की सारी जानकारी जो आपका अधीनस्थ दे रहा हो वह एकदम सही हो, इसलिए जूनियर वर्ग के लोग जैसे क्लर्क और चपरासी तक से सूचना प्राप्त करते रहना चाहिए, और इन लोगो से इतना सहज व्यवहार करना चाहिए कि वो लोग आपसे अपनी बात कहने में कोई हिचक न महसूस करें। आपके पावर के डर से आपको सारी बाते पता चल सकती है ये जरूरी तो नहीं, इसी प्रकार लोकल नेताओं से बिना
किसी पार्टी की प्रतिबद्धता दिखाए, संतुलित व्यवहार करना चाहिए अन्यथा सरकार बदलते ही देर नहीं लगती, अपने आप पर किसी राजनैतिक पार्टी से प्रतिबद्ध होने का ठप्पा लगवाना फायदे से ज्यादा घाटे का सौदा हो सकता है, अपने सीनियर अधिकारी से कैसे काम करवाए, अपने समकक्ष से कैसे संपर्क में रहे, पुलिस और मीडिया में कैसा व्यवहार करें, आदि अनेक छोटी बड़ी बातें, ए. कुमार सर ने अपने इंडक्शन में अनुराधा को बहुत ही बारीकी से समझाई। उनके समझाने का तरीका इतना अच्छा था कि अनुराधा को लेश मात्र भी यह महसूस नहीं हुआ कि यही वह सीनियर अधिकारी हैं जिनसे आज सुबह उसने इतनी बदतमीजी से बात की थी।
★
अनुराधा को उन्हें बार बार ए. कुमार सर कहना अटपटा लग रहा था इसलिए उसने उन्हें सिर्फ कुमार सर कहना शुरू के दिया। शाम होते होते ही अनुराधा और कुमार सर इतने घुल मिल से गए थे मानो एक दूसरे को बरसों से जानते हो, अनुराधा ने महसूस किया कि कुमार सर के मन में बहुत दर्द भरा है, इसलिए उसे लगा कि यदि कुमार सर उसे रात को खाने को इनवाइट करेंगे तो वह मना नहीं करेगी, परन्तु ऑफिस में इंडक्शन ख़तम होते ही कुमार सर ने संक्षिप्त में कहा ओके अनुराधा कल सुबह 9.30 बजे आ जाना, तुम्हें एक सिविल कंस्ट्रक्शन वर्क का “औचक निरक्षण” कैसे करते है बताने के लिए साइट पर चलना है। अनुराधा जब तक अपना काम समेटती कुमार सर तेज़ी से अपनी कार ड्राइव करके निकल गए।
अनुराधा ने कुमार सर के साथ आए इंस्पेक्टर का नाम उसकी वर्दी पर देख कर पढ़ा, विनोद कुशवाहा, जी आप गाजियाबाद से ही हैं क्या?
इंस्पेक्टर विनोद ने उन्हें आदर से कहा जी नहीं मैडम मै गोरखपुर से हूं, अनुराधा ने इंस्पेक्टर विनोद को सामने की चैयर पर बैठने को कहा, साथ खड़े चपरासी से दो चाय लाने को कहा,जब तक चाय आती अनुराधा में इंस्पेक्टर विनोद से उसके परिवार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसकी पांच वर्ष पूर्व शादी हुई थी, उसका तीन साल का बेटा भी है, इसकी पत्नी और वह पुलिस क्वार्टर में ही रहते है, उसके माता पिता विनोद के छोटे भाई के साथ ही गोरखपुर के पास के गांव में खेती बाड़ी देखते है, इस बीच चाय आ गई
तो अनुराधा ने स्वयं ही केतली से चाय उड़ेल कर इंस्पेक्टर विनोद को दी, इस सम्मान से वह बहुत खुश हो गया था। अन्यथा अनुराधा के सुबह के व्यवहार से तो वह उसे सनकी औरत ही समझ रहा था, चाय पीते पीते ही विनोद ने अनुराधा से हिम्मत कह कर कह ही दिया कि मैडम छोटा मुंह बड़ी बात होगी पर सुबह जब ए. कुमार सर तेज़ी से ऑफिस आ रहे थे, मै आपको गार्डन में देखकर पहचान कर रुक गया था कल मैं ही कमिश्नर ऑफिस से कार ड्राइव करके आपको इस
कार्यालय तक लेकर आया था, मेरे अचानक रुकने से अनभिज्ञ ए कुमार साहेब मुझसे बचते हुए किनारे से निकलने की कोशिश में आपसे हल्का सा टकरा गए थे, इसमें उनकी तो कोई गलती भी नहीं थी, इतने सीनियर होने के बाद भी वो भरे ऑफिस के सामने आपकी गालियां भी आपको सॉरी बोल रहे थे, पर आप तो कुछ सुन ही नहीं रही थी, मै उसी समय यह बात क्लियर करना चाह रहा था पर आपने मुझे भी बोलने नहीं दिया।
अनुराधा को जब पूरी बात पता चली तो उसके मन में कुमार सर के लिए इज्जत और बढ़ गई, सच में उनकी कोई गलती नहीं होने के बाद भी अनुराधा ने कुमार सर को पूरे ऑफिस के सामने खूब ज्यादा खरी खोटी सुना दी थी, उसके बाद भी वह अनुराधा को सॉरी बोलकर निकले थे, यही नहीं उन्होंने कितनी
शालीनता से बिना घमंड दिखाए इंडक्शन दिया। उनकी जगह अनुराधा स्वयं होती तो ऐसी हालत में चार बातें तो सुना ही जाती। अनुराधा के मन में कुमार सर के लिए इज्जत और बढ़ गई थी। अनुराधा ने इंस्पेक्टर विनोद कुशवाहा से घूमा फिराकर ए. कुमार सर के बारे में जानकारी लेते हुए पूछा कि कुमार सर कि बीबी बच्चे भी गाजियाबाद में ही होंगे, इस पर इंस्पेक्टर विनोद ने कहा, अरे कहां उन्होंने तो शादी ही नहीं की अब तक, इससे ज्यादा उनके बारे में किसी को नहीं पता है, और वो किसी से अपने दिल की बात शेयर भी नहीं करते।
अनुराधा ने इंस्पेक्टर कुशवाहा को कुरेदते हुये कहा तो फिर को शाम को कुमार सर क्या करते है? अनुराधा मन ही मन उनके साथ डिनर का प्लान बना रही थी, तो इंस्पेक्टर विनोद ने कहा कि उनकी एक ही तो खराबी है रोज शाम में किसी न किसी “बार” में बैठ कर जी भर के पीते है फिर खाना खाकर, मुझे बुलाते हैं अपने सरकारी आवास तक छोड़ने के लिए, कई बार तो इतना पी जाते है कि उनको खुद का भी होश नहीं रहता।
अनुराधा को याद आया कि सुबह कुमार सर मुँह से शराब कि बदबू आ रही थी जिस कारण वह ए कुमार सर को बेवड़ा और बदतमीज समझ कर अनाप शनाप सुना रही थी । अनुराधा अपने गेस्ट हाउस में पहुंच कर रात को डिनर लेकर जब सोने लगी तो उसके विचारों में ए.कुमार सर ही थे, वह सोच रही थी कि इतना मृदुभाषी, संयमित और संतुलित इंसान शराब के नशे का आदी कैसे हो गया, जरूर उसके सीने में कुछ न कुछ दर्द है, जिसको भुलाने के लिए वह शराब का सहारा ले रहा है..
अगला भाग
कुटील चाल (भाग-6) – अविनाश स आठल्ये : Moral stories in hindi
स्वलिखित
अविनाश स आठल्ये
©® सर्वाधिकार सुरक्षित