घर आकर अगले दिन सुलक्षणा ने भास्कर राव त्रिवेदी जी को नोएडा जाने की बात याद दिलाई , तो वह सीधा वीरेश्वर मिश्रा के कमरे में चले गए, और बोले दोस्त हमें यहां आए हुए लगभग 20-25 दिन हो चुके हैं, कभी लगा ही नहीं की हम अपने घर में नहीं है, और बेटी अनुराधा के साथ तो इस तरह घुल मिल गए थे जैसे मेरी और सुलक्षणा की खुद की ही बेटी हो, इसलिए हमें कभी यहां पर परायापन महसूस ही नहीं हुआ, लेकिन फिर भी अपना घर तो अपना ही होता है इसलिए अब तुम मुझे और सुलक्षणा को अपने घर नोयडा वापस जाने की इजाज़त दे दो।
वीरेश्वर मिश्रा ने रुंधे गले से भास्कर राव को कहा, तुम भी ग़ज़ब करते हो, पल में अपना और पल में पराया कर देते हो, यह घर भी तो अपना ही है, तो नोयडा वापस क्यों जाना चाहते हो, मुझसे कोई गलती हो गई हो या किसी चीज़ की कोई कमी लग रही हो तो मुझे बता दो मै तुरंत उस कमी को दूर करने का प्रयास करूंगा, वैसे भी अनुराधा के जाने के बाद आने वाले दो साल तो मुझे इस घर की दीवारों से ही बात करके काटना पड़ेगा।
बुरा न मानो तो मेरी एक सलाह है, नोयडा में वैसे भी तुम्हारे बेटे अरविंद ने तुम्हें कोई सुख नहीं दिया और तुम दोनों उसके बिना नोयडा में रहकर भी कोई खुश तो हो नहीं, क्यों न तुम जरूरी समान लेकर यहां हमारे साथ रहने आ जाओ और वह मकान किराए पर दे दो, मुझे भी यहां तुम्हारी कम्पनी मिल जाएगी, और तुम्हें भी वक़्त काटने के लिए मेरे जैसा दोस्त मिल जाएगा, खाली वक्त में हमें अपने “ओल्ड होम” में रहने वाले वृद्धजनों की सेवा करने का भी सुअवसर मिलता रहेगा।
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तभी उन दोनों की नज़र पीछे बात सुन रही सुलक्षणा पर पड़ी, तो वीरेश्वर मिश्रा ने चुटकी लेते हुए कहा और सबसे बड़ी बात यह कि मुझे भाभी जी के हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खाने को भी तो मिलेगा।
भास्कर राव त्रिवेदी ने सुलक्षणा की और प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा, तो सुलक्षणा ने असमंजस की स्थिति में वीरेश्वर मिश्रा से कहा कि भाई साहेब अभी हम इतनी जल्दी में इतना बड़ा निर्णय नहीं ले सकते, हम एक बार नोयडा पहुंच जाएं, फिर शांति से वहां की परिस्थितियों पर विचार करके आपको अवगत कराएंगे, वीरेश्वर मिश्रा समझ गए थे कि वह लोग बात को टाल रहें है, पर इससे ज्यादा वह कह भी क्या सकते थे, इसलिए उन्होंने भास्कर राव व सुलक्षणा जी के सामने हाथ जोडकर कहां, कि मै भी भगवान से प्रार्थना करूंगा की वहां की परिस्थतियां आपके लिए सुखद हो, परन्तु, यदि आपको जरा सा भी कोई परेशानी हो तो मुझे अपना छोटा भाई समझ कर निसंकोच यहां चले आइएगा।
भास्कर राव त्रिवेदी ने वीरेश्वर मिश्रा को गले लगाते हुए कहा कि बिल्कुल, अभी तो हम नोयडा जा रहें है, जल्दी ही मिलेंगे अन्यथा तुम ही कुछ दिनों के लिए हमारे यहां रहने के लिए नोयडा आ जाना, सुलक्षणा का स्वादिष्ट खाना तो तुम्हें वहां भी मिल जाएगा, फ्लैट थोड़ा छोटा जरूर है, पर तुम्हारे लिए एक कमरा तो खाली करवा ही लेंगे। वीरेश्वर मिश्रा ने उनकी बातों का कोई जवाब नहीं दिया बस भरी आँखों से उन दोनों को अपने यहां रुकने का मौन आग्रह करते रह गए।
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भास्कर राव त्रिवेदी ने उसी रात का लखनऊ से दिल्ली की ट्रैन का टिकिट कराकर अगले दिन सुबह नोयडा पहुंच गए। 20-25 दिन से बंद घर की साफ सफाई, जरूरी किराना, सामान, सब्जी-भाजी, टेलीफोन बिल, बिजली बिल, सोसायटी बिल आदि को निपटाते निपटाते दो तीन दिन तो यूँही निकल गए, उसके बाद शाम को भास्कर राव ने वीरेश्वर मिश्रा से उनकी कुशलक्षेम पूछने को फ़ोन पर बात की, फ़ोन के दोनों ही तरफ़ से अपने अपने यहां आकर रहने का आग्रह था।
दो चार दिन और गुजरने के बाद सुलक्षणा ने भास्कर राव से अरविंद ने मिलने कि इक्छा जताई, भास्कर राव का मन तो नहीं था परन्तु वह सुलक्षणा को मना नहीं कर सके, शाम को वह दोनों आटो रिक्शा लेकर जब अरविंद के सरकारी आवास पहुंचे तो पता चला कि अरविंद के अत्यधिक शराब पीने की आदत व अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से दुर्व्यवहार के कारण उसका किसी दूसरे शहर में दंडात्मक तबादला हो गया है।
दुःखी मन से भास्कर राव त्रिवेदी व सुलक्षणा अपने घर वापस आ गए, अरविंद ने अपने कार्यालय में इतनी खराब परिस्थिति कर रखी थी कि भास्कर राव जी को उस कार्यालय जाकर अरविंद का पता लगाना बहुत ही अपमानजनक लगा इसलिए उन्होंने घर पर ही आकर अपने निकटस्थ सूत्रों से अरविंद के बारे में पता करने की कोशिश की पर अरविंद के बारें में कुछ पता नहीं चल सका।
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अभी तक तो सुलक्षणा को अरविंद की वापसी का मोह था पर उसके तबादले के बाद तो सुलक्षणा का नोएडा में रहने का लगाव ही खत्म हो गया था, लगभग यही हाल भास्कर राव का भी था। एक दिन भास्कर राव ने हिम्मत करके सुलक्षणा से कहा कि देखो अब हमें नोयडा में रहकर को अरविंद से मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं रही, घर भी अब काटने को दौड़ता है, लगभग यही हालत लखनऊ में वीरेश्वर मिश्रा की भी अनुराधा बेटी के बिना होगी, क्यों न यह घर किराए पर दे कर लखनऊ में वीरेश्वर के यहां चले जाएं, हम एक और एक ग्यारह हो सकते है, सुलक्षणा को भी यह बात जम गई, उसी शाम उन्होंने वीरेश्वर मिश्रा को फ़ोन करके पूरी बात बताई और अपना लखनऊ आने का विचार बता दिया, वीरेश्वर मिश्रा ने खुशी से कहा जरूर, मै बेसब्री से आप दोनों के आने की प्रतीक्षा करूंगा।
अगले पंद्रह दिनों में भास्कर राव ने एक एजेंट के माध्यम से घर किराए पर देने का इश्तहार दिया, और गैर जरूरी सामान को औने-पौने भाव में बेच कर बाकी का आवश्यक सामान पैक कर लिया, हफ़्ते भर में ही एक बैंक मैनेजर मोहंती जी किरायेदार बन कर आ गए, जरूरी एग्रीमेंट और दो महीने का अग्रिम किराया लेकर भास्कर राव त्रिवेदी व सुलक्षणा नोयडा से रवाना हो गये, उन्होंने उस एजेंट को ही घर की साफ सफाई, टूट फूट मरम्मत और घर की पुताई का काम व पैसा देकर एक सप्ताह बाद नए किरायेदार मोहंती जी को शिफ्ट होने के लिए कह दिया।
लखनऊ पहुँचकर भास्कर राव ने फ़ोन के माध्यम से एजेंट और मोहंती जी से बीच बीच में बात करके, अपना वह फ्लैट मोहंती जी को किराये पर दे दिया।
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एक सफ्ताह बाद ही मोहंती जी भास्कर राव त्रिवेदी के घर में शिफ्ट हो गए।
इधर लखनऊ में आकर एक बार फ़िर से सुलक्षणा,भास्कर राव और वीरेश्वर मिश्रा कि जिंदगी का सूनापन दूर हो गया था, वीरेश्वर जी का घर फिर से हँसी के ठहाकों से गूंजने लगा था, रोज़ दोपहर को वीरेश्वर मिश्रा और भास्कर राव ओल्ड होम में जाकर वृद्ध जनों के साथ उनकी जिंदगी के अनुभव सुनते, एक दूसरे का दर्द बांटते और शाम अनुराधा फ़ोन करके उन सभी का हालचाल पूछती और अपनी ट्रेंनिग की बाते विस्तार से बताती। सुलक्षणा का वक्त भी इन दोनों के लिए मनपसंद खाने बनाने और रात को अनुराधा के साथ गप्पे लड़ाते हुये सुखमय व्यतीत हो रहा था, कुल मिलाकर भास्कर राव त्रिवेदी के लखनऊ शिफ़्ट होने ने निर्णय न सिर्फ उनके परिवार बल्कि वीरेश्वर मिश्रा के परिवार को भी बहुत मददगार साबित हुआ।
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कुटील चाल (भाग-5) – अविनाश स आठल्ये : Moral stories in hindi
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अविनाश स आठल्ये
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