कर्तव्य – शुभ्रा बनर्जी : Moral Stories in Hindi

शांति त्रिपाठी के पति कम्युनिस्ट दबंग नेता थे।समाज में उनका रुतबा था बहुत।दो बेटे थे उनके।बड़े बेटे को विदेश भेजकर पढ़ाया था उन्होंने,और छोटे बेटे को भी फार्मेसी करवायी थी उन्होंने।बड़ा बेटा स्वदेश लौट कर अच्छी नौकरी करने लगा था।छोटे बेटे की नौकरी भी घर के पास लग गई थी।

बड़े चाव से छोटे बेटे की शादी कॉन्वेंट से शिक्षित लड़की से करवाई। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने की वजह से काफी प्रसिद्धि मिली थी छोटी बहू को।स्थानीय विद्यालय में लेक्चरर की नौकरी कर रही बहू सास-ससुर के साथ ही रहती थी।नाती और नातिन की पूरी देखभाल दादा-दादी ही करते।समय बीतने के साथ छोटे बेटे ने अपना बड़ा सा घर बना लिया था।तब तक माता -पिता बूढ़े हो चले थे।

घर के उद्घाटन पर मेहमानों को बड़े चाव से घर दिखा रही थी छोटी बहू।शांति देवी एक कोने में बैठी थीं।बहू की सहकर्मियों ने पूछा”अरे !इस घर में तेरे सास-ससुर का कमरा कौन सा है??”

“कैसा कमरा?ये दोनों तो अपनी पार्टी वाले कमरे को छोड़ना ही नहीं चाहते।”बहू ने मासूमियत से जवाब दिया। शांति देवी बहू की अदाकारी से अनभिज्ञ नहीं थी।सब के सामने असलियत बताकर उसे छोटा करना उचित नहीं समझा उस अनपढ़ महिला ने।बेटे के उस बड़े से घर में बहू की मां के लिए कमरा बना था, क्योंकि पति की मौत के बाद विदेश में रहने वाले बेटे और शहरों में नौकरी पेशा बेटियों के लिए मां को रखना असंभव था।

बच्चे बड़े हो चुके थे,नानी के आगे-पीछे घूमते रहते।दादा -दादी से मिलने जाते थे कभी -कभी।आज्ञाकारी बेटा साप्ताहिक बाजार से सब्जी खरीदकर भिजवा देता था।

शांति देवी अपने बूढ़े और कमजोर हो चुके शरीर के साथ पति के साथ पार्टी के कमरे में एक विश्वासपात्र नौकर के साथ ही रहती थी।अभी कुछ समय से त्रिपाठी जी भूलने लगे थे।सड़क पर निकल कर परिचितों से बातें करने लग जाते।पैसे मांगने लगते थे।बेटे-बहू की तो नाक कटवा दी उन्होंने।बहू विद्यालय में अपने छात्रों को मानवीय मूल्यों की शिक्षा अनवरत देती रही। बुजुर्गों की देखभाल करना हमारा कर्तव्य है,जिस घर में दादा-दादी का सम्मान होता है,वहां ईश्वर का वास होता है,आदि आदि ऐसी बहुत अच्छी -अच्छी बातें बहू कॉलोनी में भी बोलती थी।

इस कहानी को भी पढ़ें: 

एक था नंदू……… – शिव कुमारी शुक्ला : Moral Stories in Hindi

धीरे-धीरे लोग भूलने लगे कि त्रिपाठी जी बीमार हैं,उन्हें परिवार की जरूरत भी है। बेटे-बहू को भी आदत हो गई थी माता-पिता को महीने में जाकर मिल आने की।एक दिन खबर मिली त्रिपाठी जी नहीं रहे।एक दबंग नेता की असहाय मौत पर बेटे-बहुओं के मगरमच्छ वाले आंसुओं को देखकर शांति देवी को समझ नहीं आ रहा था कि रोएं या हंसे।

तेरहवीं के दिन जब रिश्तेदारों ने पूछा छोटी बहू से कि क्या अब माताजी अकेली रहेंगी तो बहू ने जवाब दिया”अकेली क्यों,उनके साथ पिताजी की आत्मा हमेशा रहेगी।इस घर में इतना लंबा वक्त बिताया है दोंनो ने,अब इस घर से उन्हें  दूर करके हम पाप के भागीदार नहीं बनेंगे।”

पार्टी के कद्दावर नेताओं में गिनती होती थी त्रिपाठी जी की।पत्रकार आए थे उनकी मृत्यु पर शोक जताने।जैसे ही एक ने पूछा शांति देवी से”मां जी,आखिरी समय में भी बाबूजी अकेले ही थे क्या?”बहू ने तुरंत कहा”ऐसा मत बोलिए,हमारे परिवार की आधारशिला थे वे,बच्चों के साथ ही वक्त बिताते थे आखिरी समय में”।शांति देवी को पहले से ही समझा दिया गया था कि जवाब नहीं देना है किसी सवाल का।पति की मौत से बदहवास हो गईं हैं वह,ऐसा लगना चाहिए।

पत्रकार ने फिर आखिरी सवाल पूछा”तो अब माता जी आपके साथ ही रहेंगी ना???”

“क्यों नहीं?हमने इतना बड़ा घर बनाया किसके लिए है?अलग से कमरा तो पहले ही बनवा लिया था, पर पिताजी की अकेले रहने की जिद के कारण माताजी को हम सब से अलग रहना पड़ा।” छोटी बहू के चेहरे में आते -जाते रंग देखकर शांति देवी सोचने लगी क्या गिरगिट ने रंग बदलना इंसानों से ही सीखा है???

लेखिका : शुभ्रा बनर्जी

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!