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अब तक आपने पढ़ा- अपने प्रेमी मेजर बृजभूषण पांडे के कारगिल युद्ध में शहीद होने के शोक में डूबी उर्वशी, भीषण अवसाद “क्रोनिक डिप्रेशन” का शिकार हो जाती है, जहाँ उसे मेडिकल ग्राउंड के आधार पर इलाज के लिए छुट्टी मिल जाती है, वह अपनी वन्दना दीदी और पंकज जीजीजी के यहां रहकर गुड़गांव में साइकोलॉजिस्ट से 6 महीने इलाज करवाने के बाद पुनः स्वस्थ होने लगती है।
उसी पंकज जीजीजी की विंग में रहने वाले करोड़पति उद्योगपति उमेश त्रिपाठी के इकलौते बेटे विनोद त्रिपाठी द्वारा स्वयं ही उर्वशी के लिए विवाह का प्रस्ताव आने के बाद उर्वशी के परिजन मेजर पांडे के पिता की सहमति से उर्मिला का विवाह विनोद त्रिपाठी से कर देतें हैं।
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अब आगे..
अपनी “सुहागरात” को लेकर जहां दूसरी लड़कियों में अज़ीब सी बेचैनी और उमंग रहती है, उर्वशी पूर्णतया उदासीन थी..
विनोद के रिश्ते की भाभियों ने उर्वशी का श्रृंगार करवाकर उर्वशी को सुहाग सेज पर भेज दिया था.. मगर उन्होंने विनोद को बिना नेग लिए कमरे के अंदर नहीं आने दिया..
विनोद ने उस कमरे के अंदर आते ही, सुहाग सेज पर उदास बैठी उर्वशी को देखा.. उसने उर्वशी से कहा.. तुम फ़िक मत करो उर्वशी मुझे तुम्हारी मनोदशा पता है, मैं तुम्हें तुम्हारी मर्ज़ी के बिना हाथ भी न लगाऊंगा..
यह सुनकर पहली बार उर्वशी ने नज़र उठाकर विनोद की तरफ़ देखा.. बस फ़ीकी सी मुस्कान बिखेरकर, अपने कपड़े बदलकर वह सोफ़े पर लेट गई, विनोद ने अकेले ही पलंग पर बैठकर अपनी सुहागरात काटी।
सुबह उठते ही विनोद ने उर्वशी से कहा देखो हमारे बीच जो भी कुछ है वह इस कमरे से बाहर न जाने पाये, मेरा परिवार मुझे बहुत प्रेम करता है, औपचारिकतावश ही सही मगर उन सबके सामने मेरी इज्ज़त बचाये रखना।
उर्वशी ने सिर हिलाकर विनोद की बात से सहमती जताई.. उसे विनोद का यूँ मित्रवत व्यवहार बहुत अच्छा लगा।
वह विनोद के परिजनों के बीच हल्का फुल्का श्रृंगार करके खुद को नई नवेली दुल्हन की तरह प्रसन्न दर्शाने लगी.. विनोद और उर्वशी हनीमून मनाने फिलीपींस के मनीला द्वीप गये..वहाँ भी विनोद ने उर्वशी को छुआ तक नहीं.. विनोद के इस तरह कमिटमेंट के पक्के होने से उर्वशी का भरोसा विनोद पर बढ़ता जा रहा था। वह एक मित्र की तरह विनोद से व्यवहार करने लगी.. इस हनीमून ट्रिप के दौरान वह विनोद से काफ़ी खुल चुकी थी।
वापस दिल्ली आने के बाद विनोद के कहने पर उर्वशी ने अपनी शिमला वाली नौकरी से इस्तीफा दे दिया.. अब उर्वशी एक अच्छी गृहणी की तरह घर के कामों में हाथ बंटाने लगी, उसने विनोद की रुचि के अनुसार खाना बनाना, उसका ध्यान रखना, उसकी पंसद के अनुसार कपड़े पहनना शुरू कर दिया। उसके मन के किसी कोने से मेज़र पांडे की यादें धुंधली होकर उसपर विनोद की छवि की परत चढ़ना शुरू हो गया था।
विवाह हुए अब तक 3 महीने बीत चुके थे.. वह अब विनोद के पास रात को सोने से पहले पूर्ण श्रृंगार करके उसके बगल में एक ही पलंग पर सोने लगी।
वह चाहती थी कि विनोद ही पहल करें.. मगर विनोद ने तो उर्वशी को स्पर्श तक नहीं कर रहा था..
देखते देखते 6 महीने बीत गये… मगर विनोद के अंदर न जाने किस विश्वामित्र की आत्मा घुसी थी कि वह उर्वशी के साथ संसर्ग तो क्या स्पर्श भी नहीं कर रहा था।
आखिर एक रात उर्वशी ने ही पहल की उसने विनोद से कहा कि जब हमारी शादी हुई तब मैं मेज़र पांडे के प्रेम में डूबी हुई थी, इसलिए यदि मेरी उदासीनता को आपने अपने प्रति नफ़रत समझ लिया हो तो मैं आपसे माफ़ी माँगती हूँ, मेज़र पांडे मेरा पहला प्रेम थे..उनको भूलना नामुमकिन था,
मगर आपने मित्रवत व्यवहार से मुझमें, अपने प्रति प्रेम उत्पन्न कर दिया है, मैं अब सिर्फ कागजों में ही नहीं वास्तविक जीवन में भी आपकी पत्नी बनना चाहती हूँ।
मेरे किसी व्यवहार से आप या आपके परिवार में किसी को ठेस पहुंची हो तो मैं क्षमा मांगती हूँ।
उर्वशी की बात सुनकर विनोद ने अट्टहास करते हुए कहा कि यदि तुम्हें यह लग रहा है कि मैं तुम्हें अपने दिए कमिटमेंट की वजह से स्पर्श नहीं कर रहा हूँ.. तो तुम बहुत भोली हो.. मुझे “सैक्चुअल प्रॉब्लम” है, जिस वज़ह से मैं नपुंसक हूँ.. अब तक तुम्हें मेज़र पांडे के गम में डूबा देखकर मुझे अपनी यह बात कहने की क़भी ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
तुम इस घर में इस तरह जब तक चाहो रानी बनकर रह सकती हो.. मग़र ध्यान रखना कि यदि यह बात किसी भी तरीके से इस घर से बाहर गई तो मैं खुद तुम्हें हमेशा के लिए छोड़ दूंगा।
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विनोद की बात सुनकर उर्वशी को यूँ लगा कि जैसे किसी ने उसके कानों में बम फोड़ दिया हो..
ओह्ह तो यह राज है इसके “संयम” का.. मेरे मेज़र पांडे के वियोग में होने की आड़ में यह महाशय अपनी कमजोरी छुपा रहे थे, और मैं इनको देवता समझने लगी थी। एक पल में ही उर्वशी को घृणा सी होने लगी विनोद से..वह सोच रही थी अभी इसी वक्त अपना सामान लेकर वापस अपने पिता के पास चली जाये।
घृणा इसलिए नहीं कि वह नपुंसक है और उसे शारीरिक सुख नहीं दे सकता, बल्क़ि इस वजह से कि वह विनोद पिछले 6 महीनों से ‘हमदर्दी” का ढोंग रचा कर उसके विश्वास के साथ छल कर रहा था।
पल भर में ही विनोद और उर्वशी के बीच गर्मजोशी भरे रिश्ते महज़ औपचारिक रह गये।
उस रात उर्वशी की आँखों से नींद ग़ायब थी.. वह अपने गुज़रे दिनों के पन्ने पलट रही थी। कितनी ख़ुश रहा करती थी वह मेज़र पांडे से मिलने के बाद, क्या क्या हसीन ख्वाब बुन रखे थे उसने..
एक झटके में वह सब युँ चला गया जैसे कि वह कोई हसीन सपना था।
उसके बाद इस विनोद के परिवार ने उसे सहारा दिया, अपनाया दिखावें के लिए ही सही मगर विनोद ने उसे प्यार तो दिया.. अब तक तो उसे विनोद और उसके परिवार ने कोई तकलीफ़ नही दी.. फिर क्यों वह उन सबको छोड़कर चली जाना चाहती हैं.. महज़ शरीरिक सुख के लिए..
इतनी कामुक तो क़भी थी ही नहीं.. फिर विनोद को छोड़कर वह कहां रहेगी ?
जॉब तो उसने पहले ही छोड़ दिया था। उर्वशी ने मजबूरीवश हालातों से समझौता करना सीख लिया था।
लगभग दो वर्ष तक तो सब इसी प्रकार चलता रहा..एक दिन वंदना दीदी का फ़ोन आया कि उनके पिताजी नहीं रहे.. उर्वशी पर तो दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा.. मायके आने का एकमात्र दरवाजा भी अब सदा के लिए बन्द हो चुका था..उन दोनों बहनों ने गाँव की खेती बाड़ी की देखभाल के लिए गाँव के ही एक व्यक्ति को रख दिया और उसके मार्फ़त खेतीबाड़ी सम्हालने लगीं।
ईश्वर भी उन्हीं की परीक्षा ज़्यादा लेते हैं जो परीक्षा देने से घबराते नहीं है।.. विवाह के ढाई वर्ष बीत जाने पर भी जब उर्वशी और विनोद को कोई बच्चा न हुआ तो उसके माता पिता ने उर्वशी को बच्चे के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया..
जब उर्वशी पर विनोद के माता पिता का बच्चा पैदा करने का दबाव लगातार बढ़ने लगा तो उर्वशी ने एक दिन उन्हें कह ही दिया कि बच्चा न होने का दोषी वह नहीं उनका पुत्र विनोद है। उसी को दिए वचन के कारण वह अबतक खामोश हैं।
यह सुनते ही विनोद के मातापिता हतप्रभ रह गये.. मग़र उन्होंने भी खानदान की इज्ज़त की ख़ातिर उर्वशी से कहा कि यदि ” विनोद नपुंसक हैं” यह बात किसी को नही बतायेगी तो भी एक दो वर्ष में बच्चा पैदा न होने पर सब समझ जायेंगे की तुम दोनों में से किसी एक में समस्या है तभी बच्चा नहीं हो रहा।
फिर इतनी बड़ी प्रोपर्टी के लिए कोई वारिस भी तो होना चाहिए.. विनोद के पिता उमेश जी ने कहा।
उर्वशी बोली.. जी आजकल कृतिम गर्भधान तकनीक बहुत बढ़ गई हैं. हम किसी और के “स्पर्म ” से “आई वी एफ” तकनीक द्वारा भी बच्चा पैदा कर सकतें हैं। मैने पढ़ रखा हैं इसके बारें में।
परन्तु बेटा.. इससे तो डॉक्टर को पता चल जाएगा कि विनोद नपुंसक है.. यही बात तो किसी को पता नहीं चलने देना हैं।
शाम को घर आते ही जब विनोद को पता चला कि उर्वशी ने उसके नपुंसक होने की बात पिताजी को बता दी है तो उसने गुस्से से उर्वशी पर हाथ उठा दिया..
उस दिन से शुरू हुई विनोद की यह हिंसक मर्दानगी उर्वशी ने अगले दो वर्ष तक और सही.. परन्तु विनोद की प्रवृत्ति पैशाचिक होती जा रही थी, वह उर्वशी को जितना ज़लील करता उतना ही उसे आत्म संतुष्टि मिलती थी।
एक बार फिर से उर्वशी के जीवन में दुःखद मोड़ आता है, और वह इतने बड़े आलीशान घर में सारे अत्याचार सहते हुये भी “सोने के पिंजड़े में कैद बुलबुल” की तरह रहने लगी।
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कारगिल एक प्रेमकथा (भाग-19) – अविनाश स आठल्ये : Moral stories in hindi
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अविनाश स आठल्ये