झूठा नाटक – सहदेव सिंह शेखावत : Moral Stories in Hindi

भाई की तबीयत का समाचार पाकर गर्विता परेशान सी हो गई। चाय देने गई तो चेहरा देखते ही सास इस बात को समझ गई कि बहू किसी दुविधा में है। उन्होंने बड़े अपनेपन से पूछा कि क्या बात है। गर्विता ने बता दिया। उन्होंने पूरे अधिकार से कहा कि वह भाई को देखने जाने की तैयारी करे,

और उनके बेटे यानी अपने पति को उनके पास भेजे। वह तुरंत अपने कमरे में आकर तैयारी करने लगी और गौरव को अपनी सास के पास जाने को कहा। भावना जी जानती है थीं, कि उनके बेटे को सफर बिल्कुल पसंद नहीं है, लेकिन ऐसे समय में उसको बहू के साथ जाना चाहिए, यह उन्हें उचित लगता था। सो उन्होंने आदेश दिया कि वह गर्विता को लेकर ससुराल जाए और अपने साले की तबीयत पूछ कर आए। उन्होंने गौरव को कुछ रुपये भी दिए कि जरुरत पर काम आएंगे।

बेटा बहू दोनों बिना अपने बच्चों की चिंता किए चले गए। उन्हें पता था कि भावना जी उनके बच्चों को अच्छे से संभाल लेंगी। हमेशा ऐसा ही होता था।

गर्विता भी ससुराल के सभी सदस्यों को किसी भी प्रकार से अपने परिवार से कम नहीं समझती थी। उसने भी शादी के तुरंत बाद से ही अपने सास-ससुर, देवर-देवरानी की छोटी से छोटी जरूरत और सुविधा का पूरा ध्यान रखती थी। गौरव और उसके छोटे भाई की शादी एक ही हफ्ते में हुई थी।

ससुर और सास को कभी कुछ भी बोलने का अवसर नहीं दिया गर्विता ने। उनकी दवाई और खाने का इतना ध्यान रखती थी कि कभी दस मिनट भी देर नहीं होने देती थी। ससुर जी सैना में थे सो उनको हर काम समय पर करना पसंद था और गर्विता उनके विचारों का हमेशा पूरा सम्मान करती थी।

सासु माँ ने कभी कहा नहीं लेकिन मन ही मन वह हमेशा ईश्वर को धन्यवाद कहती थी कि आजकल के समय में उन्हें गर्विता जैसी बहू मिली थी। साथ ही वह हमेशा गर्विता की मां की इस बात के लिए हमेशा मन ही मन में सम्मान करती थीं कि उन्होंने गर्विता को ऐसे अच्छे संस्कार और शिक्षा दी थी कि वह ससुराल वालों को मन से अपना सकी। लेकिन मुंह से कभी कहती नहीं थीं।

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गर्विता जब पीहर पहुची तो भाई की हालत में थोड़ा सुधार हो चुका था। अब चिंता की कोई बात नहीं थी। फूड पॉईज़निंग की वजह से इंफेक्शन हो गया था जिसके कारण पेट में बहुत दर्द हो रहा था। डॉक्टर को अंदेशा था कि कोई गांठ वगैरह ना हो। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। इंफेक्शन की दवाई से आराम आ रहा था। और टेस्ट के बाद संतुष्टि थी कि सिर्फ इंफेक्शन ही था।

दो दिन बाद डॉक्टर ने छुट्टी देदी और खाने-पीने में कुछ दिन सावधानी बरतने को कहा। अस्पताल में जब तक थे तो सबकुछ ठीक था लेकिन घर आने के बाद पता नहीं क्यों मां का हर बात पर गर्विता के ससुराल वालों को लेकर कुछ ना कुछ बड़बड़ाना चालू हो गया। किसी न किसी बहाने मां हर बात में गर्विता के ससुराल वालों को खींच लाती और पता नहीं क्या-क्या बिना सिर पैर की बातें कहने लगती।

ससुराल वालों के खिलाफ कुछ भी गर्विता को सहन नहीं होता था। आखिर गर्विता ने मां से कहा कि “आपको मेरे ससुराल वालों से नहीं शायद मेरे यहां रहने से तकलीफ है, इसलिए उनकी बुराई कर के आप मुझे गुस्सा दिलाना चाहती हैं, ताकि मैं चली जाऊं। उसके लिए ऐसे नाटक की जरूरत नहीं है। मैं यहां अपनी मर्जी से या ऐश करने नहीं आई हूँ। भाई बिमार था, इसलिए आई हूँ।”

हालांकि गर्विता को आश्चर्य होता था कि उसकी माँ इतनी कैसे बदल गई!! उन्होंने ही तो हमेशा ससुराल को ही अपना घर मानने की और सबकी दिल से इज्जत करने की शिक्षा दी थी। बचपन से कहती थी कि कभी भी पीहर और ससुराल के सदस्यों में भेद नहीं करना। जैसा यहां भाई है वैसा ही वहां जेठ या देवर को समझना।

जैसे तेरे लिए मैं और तेरे पिताजी हैं उससे भी बढ़कर अपने ससुर और सास को समझना। और अबकी बार तो माँ ससुराल वालों के नाम से भी चिड़ जा रही है। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। खैर अगले दिन ही वह ससुराल आ गई और फिर से अपने परिवार में व्यस्त हो गई।

चार दिन बाद उसने अपनी सास को किसी से बात करते हुए सुना। थोड़ा सा सुनने से ही उसे अंदाजा हो गया कि फोन के दूसरी तरफ शायद उसकी अपनी माँ है। इधर से सास फोन पर कह रही थी कि “मैंने तो आपसे पहले ही कहा था कि वह हम सबका बहुत ध्यान रखती है लेकिन फिर भी आपने उसका दिल दुखाया। इसकी क्या जरूरत थी!!

दुसरी तरफ से कुछ कहा गया। जिसे गर्विता नहीं सुन सकी।लेकिन वह सास की बातें ध्यान से सुन रही थी और समझने की कोशिश कर रही थी।

थोड़ा रुक कर उन्होंने कहा कि आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आप अपनी बेटी के ससुराल वालों का इतना ध्यान रखती है और उसके लिए इतनी सजग हैं। लेकिन आपकी बेटी आपकी दी हुई शिक्षा को कभी भूलती नहीं है, और अब तो शायद उसके दिल में ससुराल वाले इस तरह बस गए हैं, कि वह हमको खुद से अलग ही नहीं समझती। वो जिस तरह से हम सबके लिए कुछ भी करती है, आप आंखों से देखेंगी, तो शायद आपको भी जलन ना होने लगे।

दूसरी तरफ से फिर कुछ कहा गया। जिसके जवाब में भावना जी ने कहा कि “आपको अपनी दी हुई शिक्षा पर गर्व होना चाहिए।”

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अब गर्विता को थोड़ा बहुत समझ में आ रहा था, लेकिन वह आश्वस्त नहीं थी। उसे अब भी लग रहा था, कि ऐसा नहीं हो सकता। मां झूठा नाटक नहीं कर सकती। गर्विता की सास ने देख लिया कि गर्विता ने शायद सबकुछ सुन लिया है। लेकिन वे चुप रही। आखिर गर्विता को ही पूछना पड़ा, कि फोन पर कौन था

और किसके बारे में बात हो रही थी। भावना जी को लगा कि गर्विता को अब सबकुछ बता देना चाहिए। उन्होंने उसे बताया कि उसकी मम्मी जानबूझकर हमारी बुराई करती थी, ताकि वह जान सकें कि तुम अपने ससुराल के लोगों के प्रति कैसे विचार रखती हो। कहीं तुम उनकी दी हुई शिक्षा भूल तो नहीं गई?? कहीं स्वार्थ रिश्तों में खटास तो नहीं घोल रहा है। जैसे जैसे इंसान की उम्र बढ़ती स्वार्थ आदमी की बुद्धि में घर करने लगता है।

“तो मैं आप लोगों की परीक्षा में पास हुई या फेल मम्मी जी??

“200% नंबरों से पास हुई हो तुम बहू! तुम्हारी मम्मी को ही नहीं, हम सबको भी गर्व है तुम पर; और तुम्हारी मां की दी हुई शिक्षा पर। ईश्वर की तुम पर हमेशा कृपा बनी रहे और तुम हमेशा ऐसे ही विचारों से संस्कारित रहो।  दूदो नहाओ-पूतो फलो । ईश्वर सबको तुम्हारे जैसी बेटी और बहू दे।” भावना जी की आवाज में गर्व का पुट स्पष्ट महसूस किया जा सकता था।

सुन कर गर्विता की आंखों में गर्व और खुशी के आंसू आ गए। भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। वह चुपचाप अपने काम में लग गई। उसने निश्चय किया कि वह इस बात को अपने दिमाग में हावी नहीं होने देगी। वर्ना यह गर्व ही उसका दिमाग खराब कर सकता है।

स्व रचित एवं मौलिक :-सहदेव सिंह शेखावत

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