“आज पूरे 20 दिन बाद बर्न हॉस्पिटल में विद्या को अपने जिंदा होने का एहसास हुआ”। अब वह पहले से काफी ठीक थी– सामने पति प्रभात और अपने माता-पिता ,भाई को देख आंखों से बरबस ही अश्रु धारा निकल पड़े फिर प्रभात की तरफ देखते हुए धीरे से कुछ बोलने की कोशिश की परंतु ४0% जल जाने की वजह से बोलने में असमर्थ विद्या के मनोभाव को समझते हुए
प्रभात जी बोले ••• “हम गुड्डू को नहीं बचा पाए”—-!” विद्या आज हॉस्पिटल में पश्चाताप के आंसू लेकर सिर्फ रो ही सकती थी और घटना को अपने अंतर्मन में याद करके कि काश•• गुड्डू की बात को वह पहले समझ गई होती तो उस छोटी सी बच्ची इतनी तनाव में ना रहती और यह दुर्घटना नहीं घटती—काश मैं इतनी जिद नहीं करती•••
मेरी बच्ची मेरे साथ रहना चाहती थी••• मैंने ही उसकी बात को समझा नहीं और हमेशा के लिए अपने से जुदा कर दिया•••! मैं अपराधी हूं अपनी बेटी की•• उसकी जिम्मेदारी लेने से घबराने लगी इसलिए तो वह सदा के लिए मुझे छोड़ कर चली गई••••। काश मैं बचपन से ही उसको अपने से दूर नहीं भेजती•••
मेरी बेटी मेरी शान थी इतनी छोटी सी आयु—सोच बड़ो वाली ।
जाने क्या-क्या विद्या मन में सोच रही थी— लेकिन अब पछता के क्या होत ,जब चिड़िया चुग गई खेत••।
“विद्या और प्रभात जी दोनों माध्यमिक विद्यालय की शिक्षक और शिक्षिका थे”। इस कारण उन्हें गांव में ही रहना होता••• विद्या की दो बेटी और एक बेटा था ।
बड़ी बेटी गुड्डू देखने में काफी सुंदर थी ऐसा लगता मानो जापानी गुड़िया हो– ।
प्रभात की बड़ी बहन नैना के तीन लड़के थे। बेटी की शौक की वजह से नैना प्रभात जी से गुड्डू को अपने पास रखने के लिए बोली। गुड्डू की अच्छी स्कूलिंग और अच्छी परवरिश हो जाए••
यह सोचकर दोनों गुड्डू को नैना के साथ भेज दिया••। साल में एकाद बार वह अपने माता-पिता से मिलने आ जाया करती— परंतु वह जब भी आती तो उसे जाने का मन बिल्कुल भी नहीं करता लेकिन विद्या की जिद से उसे वापस जाना पड़ता ।
देखते-देखते 10 साल गुजर गए बोर्ड परीक्षा के बाद गुड्डू अब अपने मां-बाप के पास अपने गांव रहने चली आई। 10 साल से मां बेटी अलग थी सो विद्या को भी लगा कि अब कुछ दिन तो बेटी मेरे साथ रहेगी फिर तो नैना दीदी के यहां ही उसे जाना होगा•••।
देखते देखते महीना गुजर गए•• एक दिन•••
बेटा•••! अब जाने की तैयारी कर ले– अपनी बुआ के पास•••!
मां सोचती हूं कि 11वीं और 12वीं आपके पास ही रहकर कर लूं•••!
परंतु बेटा—! यहां कोई अच्छा स्कूल नहीं फिर कैसे होगी तेरी पढ़ाई••••? अच्छा है कि तू बुआ के पास ही चली जा–वहां से तूने दसवीं किया है वहीं से तू 12वीं भी कर ले•••!
नहीं– मेरी बिल्कुल भी इच्छा नहीं है कि •••मैं फिर से आप लोगों को छोड़कर जाऊं••• जब मैं छोटी थी तब तो आपने मुझे मेरी मर्जी के खिलाफ भेज दिया•••!
तो क्या हुआ तेरी बुआ ही तो है••• कितना प्यार करती है तुझे और तू है कि बस••••!
मानती हूं कि उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया और आज मैं जो कुछ भी हूं उन्हीं की बदौलत•••पर••• अगर मैं आपके पास रहती तो क्या आप मुझे अनपढ़ छोड़ देती••••? क्या मेरे दोनों छोटे भाई बहन अनपढ़ है? क्या दोनों की परवरिश अच्छी नहीं हो रही•••? बल्कि— दोनों को आप दोनों का प्यार भी मिल रहा है इससे उनका बौद्धिक विकास भी अच्छा हो रहा है••••!
” अरे— बातें तो बड़ी-बड़ी करने लग गई है मेरी बिटिया— तू कहती है इनका बौद्धिक विकास अच्छा है तु कम है क्या—? हंसते हुए विद्या गुड्डू को छाती से लगा लिया।
नहीं मां—!”प्लीज मुझे नहीं जाना अब बुआ जी के पास••! कुछ ही साल तो बचे हैं फिर मुझे आगे की पढ़ाई के लिए बाहर जाना ही होगा— आप लोगों को छोड़ना ही पड़ेगा—! मुझे अपने ही पास रहने दीजिए•••!
फिर तेरी पढ़ाई का क्या—? उसकी टेंशन आप मत लो••• मैं “नॉन अटेंडिंग”क्लास बुआ के यहां से ही कर के 12वीं कर लूंगी—! आपको पता है—-? मेडिकल की तैयारी ऑनलाइन यहां से— भी कर सकती हूं–! वह भी अच्छी तरह से—!
पर–
पर-वर कुछ नहीं— बस ये मेरा अंतिम फैसला है– आप अब मुझे अपने से अलग मत कीजिए—! “ठीक है जैसी तेरी मर्जी– परंतु एक बार पापा से भी सलाह ले ले—!
थैंक यू मां•••! गुड्डू विद्या जी से लिपटते हुए बोली ।
बोर्ड का परिणाम आ गया गुड्डू प्रथम श्रेणी से पास हुई । सभी घर में बहुत खुश थे।
बेटा तू कब जाएगी बुआ के पास–? एक डेट मुझे बता दे तो मैं तेरा रिजर्वेशन करवा दूंगा•• ताकि तेरी आगे की क्लास मिस ना हो सके •••!
प्रभात जी अखबार पढ़ते हुए बेटी से पूछे।
क्या आपको मां ने कुछ बताया नहीं••?
क्या बताया नहीं••?
यही कि अब मैं यहीं से ऑनलाइन ही मेडिकल की तैयारी करूंगी और प्लस टू मैं डमी से कर लूंगी!
बेटा यह तो अच्छी बात है कि तू अब हमारे पास रहेगी प्रभात जी खुश होते हुए बोले।
सब कुछ सही से चल रहा था परंतु विद्या को अब पहले जैसी आदत नहीं रही थी जिम्मेदारियां उठाने की गुड्डू के चले आने से वह अपने आप को उसके दायित्व से बंधी हुई महसूस करने लगी••• क्योंकि•• अब उसके खाने-पीने से लेकर उसकी पढ़ाई-लिखाई का ध्यान रखना पड़ता तो अंदर ही अंदर परेशान होती ।
उसकी मानसिक स्थिति देखकर एक दिन प्रभात जी बोले बच्चों का यह स्टेज तो हर एक मां-बाप की जिंदगी में आता है विद्या तुम्हें तो एंजॉय करना चाहिए ना की इसको बोझ समझो ।
” मैं देख रहा हूं कि जब से गुड्डू हमारे साथ रहने आई है तब से तुम कुछ खींची-खींची सी रहने लगी हो••• अरे खुश हो जाओ•• की बच्ची इतने दिनों के बाद हमारे पास रहने आई है•• और अब यही दो-तीन साल•• फिर ••उसकी पढ़ाई ,शादी-ब्याह कहां उसे हमारे पास रहना होगा–
हां– वह सब तो ठीक है– पर मैं बाहर आ-जा नहीं सकती दिन भर स्कूल— फिर घर आओ तो ये बच्चें–उफ–! अब फ्री नहीं–!
” मैं चाय बना लाता हूं– तुम थोड़ी फ्रेश हो जाओगी••• प्रभातजी हंसते हुए बोले••।
क्या हुआ••अब तक गुड्डू यहां आई नहीं•••? अब स्कूलों में री एडमिशन होने लगा और तुम लोगों ने बच्ची को भेजा नहीं—-?
प्रभात की बात नैना दीदी से होता हुआ जान विद्या झट से उनके हाथ से फोन छीन
प्रणाम दीदी–!
हां खुश रह– वह गुड्डू के लिए फोन किया– क्या सोचा है तुम लोगों ने—? प्रभात कह रहा था कि अब वह नहीं जाएगी—!
नहीं नहीं ऐसी बात नहीं दीदी– वह जरूर जाएगी–बच्ची है उसे क्या पता कि क्या अच्छा•• और क्या बुरा••• हम मां-बाप है उसकी जिंदगी बन जाए हमसे बेहतर कौन सोच सकता है–? बच्ची है•• हमें देखकर मोह-माया में फस गई•• जल्दी ही रिजर्वेशन कराती हूं और उसे भेजती हूं•••!
ठीक है चल रखती हूं— !
कहते हुए फोन रख दिया । प्रभात जी अचंभित होकर गुड्डू की तरफ देखने लगे। गुड्डू मां की तरफ देख आंखों में आंसू लेकर अपने कमरे में चली गई— ।
यह क्या रुला दिया तुमने बच्ची को—!प्रभात जी गुस्से से बोले ।
इतना मोह-माया ठीक नहीं जो भविष्य के लिए अच्छा है मैंने वो किया— अब मुझे स्कूल जाना है तुम गुड्डू का टिकट परसों का बनवा लो और हां– साथ में मेरा भी बनवा देना उसके साथ कुछ दिन रह लूंगी तो वह भी खुश हो जाएगी••••!
पागल हो तुम••! कहते हुए प्रभात जी वहां से चले गये ।
“कोई बात नहीं पापा— मां सही कह रही है “नॉन अटेंडिंग” क्लास ठीक नहीं होता और मुझे मेडिकल की तैयारी भी करनी है सो वहां कोई कोचिंग ज्वाइन कर लूंगी आप टेंशन मत कीजिए– पिता से लिपटते हुए गुड्डू बोली ।
बेटा••! मैं समझता हूं तेरी भावना को•• भगवान ने तुझे इतनी कम उम्र में ही इतना समझदार बना दिया कि तू मां के फैसले को सही बता रही है और तेरी प्लानिंग का क्या जो तूने कहा था•••!
बस पापा•• अब मैंने तय कर लिया आप अब मेरे निर्णय को कमजोर मत कीजिए•••
ठीक है बेटा जैसे तुम्हारी मर्जी•••!
शाम में विद्या जब स्कूल से लौटी तो उसके सिर में काफी दर्द हो रहा था— बेटा– क्या एक कप चाय बना देगी आज काफी थक गई हूं और सर दर्द हो रहा है–!
हां मां—हाथ में पानी पकराते हुए गुड्डू किचन की तरफ चली गई कि कुछ ही मिनटों में•• अचानक उसके चिखने आवाज आई । विद्या दौड़ के किचन में आई तो देखा, गुड्डू की ड्रेस में आग लग गई है और वह आग को बुझाने की कोशिश में है–विद्या के हाथ पैर सुन्न हो गए वह भी आनन-फानन आग बुझाने की कोशिश करने लगी
और आग उसके साड़ी में भी लग गई । आवाज सुनकर प्रभात जी किचन के तरफ दौड़े विद्या और गुड्डू को जलते हुए देखकर उन्होंने फटाफट आग बुझाने की कोशिश की तब तक गुड्डू बहुत जल चुकी थी ।
और विद्या का हाथ और ऊपर वाला हिस्सा जल चुका था। समय को नष्ट न कर कर दोनों को हॉस्पिटल में दाखिला करवाया गया परंतु गुड्डू हॉस्पिटल पहुंचते ही दम तोड़ चुकी थी•• लेकिन डॉक्टर ने विद्या को बचाने की पूरी कोशिश की ४0% जल जाने के बावजूद भीअब विद्या खतरे से बाहर थी ।
दोस्तों यह कहानी उन मां-बाप के लिए है जो अपने ही बच्चों की जिम्मेदारी निभाने से कतराते हैं। जन्म तो दे देते हैं परंतु उनका पालन-पोषण किसी दूसरे के भरोसे होता हैं। फलत: बच्चों में मां-बाप के लिए अटैचमेंट काम हो जाता है और मां-बाप कहते कि आजकल के बच्चों में संस्कार ही नहीं ।
आज के दौड़ में माता-पिता दोनों वर्किंग होते हैं पैसों की उनके पास कोई कमी नहीं होती पर हां समय की कमी जरूर होती है। वह कहते हैं ना की हर चीज का रिवर्स हमें मिलता है अगर आप बच्चों को प्यार देंगे तो बच्चे भी आपसे ता उम्र प्यार करेंगे–!
दोस्तों अगर आपको मेरी कहानी पसंद आई हो तो प्लीज इसे लाइक्स और शेयर जरूर कीजिये इस कहानी को पढ़ने के बाद कॉमेंट्स में मुझे जरूर बताएं कि आज के दौर में दोनों का वर्किंग होना कितना सही है—?
धन्यवाद।
मनीषा सिंह