सुमि और सूरज का बड़ा अरमान था कि उनका बेटा डॉक्टर बने इसके लिए उन्होंने अभि को कोचिंग के लिए कोटा पढ़ने भेज दिया। कुछ दिन अभि का मन वहाँ बिल्कुल भी नहीं लगता था हर समय घर- परिवार की याद सताती रहती उसे।
सुमि ने कभी भी उससे घर का कोई काम नहीं करवाया था इसलिए जरा भी कुछ करना पड़ता तो आँखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती और वह तुरंत उन्हें फोन लगा कर दिल की बातें करता।
धीरे- धीरे समय गुजरता जा रहा था और साथ ही अभि के फोन भी कम होने लगे थे अब वह जब भी फोन करता तो सिर्फ औपचारिक बातें करके या पैसों की जरूरत बता कर फोन रख देता। उसमें आये इस परिवर्तन को माँ- पिता दोनों ही महसूस कर रहे थे। टेस्ट में भी उसके नम्बर दिन पर दिन कम आने लगे थे अतः सुमि ने फैसला किया
कि वह अभि के पास जा कर रहेगी ताकि उस पर नज़र रख सके आखिर उसके भविष्य को बनाना भी तो उन्हीं का उत्तरदायित्व था।
रास्ते भर वह यही सोचती रही कि उन्हें देखकर अभि खुशी से झूम उठेगा पर उनकी सोच को एक जोरदार झटका तब लगा जब खुशी जताने की जगह अभि के चेहरे पर उन्हें देखकर हवाईयां उड़ने लगीं।
आपको बता कर आना चाहिए था मम्मी और आप को अब मेरी देखभाल की जरूरत नहीं है, बच्चा नहीं हूँ मैं।
उसकी बातों का अर्थ कमरे में सिगरेट की महक और डस्टबिन में पड़ी बोतलें समझा रही थी पर सुमि ने अपने को किसी तरह नियंत्रित कर आराम से उसे समझाने का फैसला किया उसे लगा कि उसके वहाँ रहने से समय के साथ सब ठीक हो जायेगा।
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लेकिन ऐसा नहीं हुआ अभि बात- बात पर चिड़चिडाता रहता कभी खाने में मीन- मेख निकालता तो कभी किसी और बात पर उखड़ जाता। माँ के रहने से उसकी आज़ादी छिन गई थी अब वह फिजूल खर्च नहीं कर पाता था। माँ पढ़ने के लिए भी बार- बार टोकती रहती थी उसे ऐसा लगता
कि एक अनजानी तलवार उसके सर पर हरदम लटकी रहती है। सुमि महसूस कर रही थी कि# जब बच्चों को अकेले रहने की आदत पड़ जाती है तो बड़े- बुजुर्गों से उन्हें बंधन दिखाई देने लगता है पर वह भी हार मानने वाली नहीं थी। वहीं डटी रही और स्थिति को सामान्य करने की कोशिश करती रही।
कहते हैं न कि करत- करत अभ्यास से जड़ मति होत सुजान
रसरी आवत- जात से सिल पर परे निसान।
और आखिर एक दिन उसका प्रयास सफल हुआ जब बेटे का सिलेक्शन मेडिकल में हुआ तो वह उसके गले लग कर फफक पड़ा- माँ अगर आप यहाँ मुझे संभालने न आई होतीं तो न जाने मेरा क्या हाल होता। मैं तो गलत रास्ते पर बढ़ गया था पर आप देवी स्वरूपा हैं आपने मुझे हाथ पकड़ कर दलदल से बाहर खींच लिया।
अब सब ठीक हो जायेगा बेटा,मुझे तसल्ली है कि अब हमारा परिवार और हमारा भविष्य उज्जवल है तुम खुश तो हम खुश।
#जब बच्चों को अकेले रहने की आदत पड़ जाती है तो बड़े- बुजुर्गों से उन्हें बंधन दिखाई देने लगता है।
कमलेश राणा
ग्वालियर