रवि और सुनयना में आज कहासुनी हो गई थी और छोटी सी बात बतंगड़ बन गई थी। कहते हैं कि जब इंसान गुस्से में होता है तो दिमाग और जुबान दोनों पर काबू नहीं रख पाता है और उसने सुनयना को कहा कि,” जा सकती हो अपने घर” ।
“अपने घर…ओह! तो ये घर तुम्हारा है? सुनयना का दिमाग चकराने लगा था। अच्छा तो मैं इतने वर्षों से तुम्हारे घर में रह रही थी। इस घर के हर कोनों और दीवारों में मैंने ।रंग भरे और अपनी ना जाने कितनी ख्वाहिशों को भुला कर दिन – रात दिए हैं…ये कभी नहीं सोचा की मैं तो किराए के मकान में रह रही थी। मुझे कभी भी यहां से निकलने का आदेश दिया जाएगा “और गुस्से में पांव पटकती हुई कमरे में चली गई।
उसके दिमाग में हलचल मच गई थी कि ” आखिर एक लड़की का वो कौन सा घर है जिसे वो अपना कह सकती है। जहां जन्म लिया वहां हमेशा ये सुनने को मिला कि पराई अमानत है
इसको तो दूसरे घर जाना है। ससुराल से जब मायके आई तो मेरे कमरे पर दूसरे का अधिकार हो चुका था यहां तक की किसी कोने में मेरी यादें शेष नहीं बची थी। सभी ने ये कहना शुरू कर दिया था कि ससुराल ही अब तुम्हारा घर है और मैंने भी स्वीकार कर लिया था क्योंकि मेरे साथ कोई नई बात नहीं हुई थी ये तो सामाजिक परंपरा थी।
जब एक मकान को घर में परिवर्तित करने में अपना वक्त और अपने अरमानों से सींचा तो आज फिर यही सवाल उठा कि ये मेरा घर नहीं है” ।सुनयना को जिंदगी का ताना-बाना समझ में नहीं आ रहा था और उसने घर छोड़ने का फैसला ले लिया था।जाना कहां था उसे भी नहीं पता था।
दूसरी तरफ रवि का ग़ुस्सा भी काफूर हो चुका था।उसे भी अहसास हो चुका था कि “उसने बहुत बड़ी ग़लती कर दी है,जिसकी माफी नहीं है। उसके ज़हन में भी ये बात आई कैसे? उसने सुनयना का दिल क्यों दुखाया। सचमुच में उसने इस मकान को घर में बदलने में कितना योगदान दिया था।वो तो सिर्फ पैसे ही कमाता था
और सुनयना ने कितने अच्छे तरीके से सजाया – संवारा था या यूं कहें सींचा था हर कोने को अपना कीमती वक्त दे कर। उसने अपनी इतनी अच्छी नौकरी भी छोड़ दिया था मां की बीमारी में।हर रिश्ता उसने इमानदारी से निभाया था” कहते हैं कमान से तीर जुबान से निकली बात वापस नहीं आती है।
रवि ने एक गिलास पानी का लिया और सुनयना के पास कमरे में गया। सुनयना ने अपनी अटैची बंद कर ली थी। रवि ने पानी का गिलास पकड़ाते हुए उसको बिस्तर पर बैठाते हुए कहा कि,” मुझे माफ कर दो सुनयना….ना जाने कैसे मेरे मुंह से ऐसी बात निकल गई।ये घर मेरा नहीं हमारा है…रथ के दोनों पहिए हैं हम दोनों अगर एक भी निकल गया तो रथ नहीं चल पाएगा।” पश्चाताप के आंसू उसकी आंखों से बह निकले थे।
सुनयना बिना कोई जबाब दिए सिर्फ रोई जा रही थी। रवि! “आज तुमने मुझे बहुत दुखी किया है ।एक औरत अपने घर में जिंदगी ही नहीं जीती बल्कि अंतिम सांसें भी वहीं लेने का ख्वाहिश रखती है और उस घर में जब उसके अस्तित्व पर ही सवाल उठाया जाए तो वो टूट कर बिखर जाती है। तुम्हारे लिए शायद वो एक वाक्य था पर मेरे लिए मेरे जिंदगी का सबसे कष्टदायक प्रश्न था।”
” कहा ना … मुझे माफ कर दो। आइंदा कभी भी मेरे जुबान पर ऐसी बातें नहीं आएंगी।”
मन का मैल पश्चाताप के आंसू के साथ बह निकले थे और सुनयना रसोई घर में जाकर अपने कामों में लग गई थी।
यही है जीवन की सच्चाई।घर गृहस्थी और परिवार में उतार चढाव चलता रहता है।इसी तरह जिंदगी अपनी रफ़्तार से फिर वैसे ही दौड़ने लगी थी।
प्रतिमा श्रीवास्तव
नोएडा यूपी