ईश्वर का न्याय – डॉ. पारूल अग्रवाल : hindi stories with moral

hindi stories with moral : वेदांत अपने घर का इकलौता लड़का था। उससे बड़ी तीन बहन थी। तीन बहनों के बाद वो पैदा हुआ था तो पूरे परिवार का काफ़ी लाडला था। पर कहते हैं ना कि प्यार के साथ-साथ कई लोग जिम्मेदारियां भी अपनी किस्मत में लिखवा कर आते हैं। ऐसा ही कुछ वेदांत के साथ था।

हालांकि वो अपनी बहनों से बहुत छोटा था पर बहुत ही कम उम्र में अपने परिवार की जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ले ली थी। वो पढ़ता और साथ-साथ एक छोटी सी परचून की दुकान को देखता। उसके माता-पिता का स्वास्थ्य अक्सर खराब रहता। जिस कस्बे में वो पैदा हुआ था वहां अच्छे कॉलेज भी नहीं थे पर पढ़ाई के प्रति भी उसने अपनी ललक को कम नहीं होने दिया।

वो दिन में अपनी पढ़ाई के लिए कस्बे के पास सटे हुए शहर जाता और रात को दुकान संभालता। देखते-देखते उसकी तीनों बहनों की शादियां हो गई। सबके लिए एक से एक रिश्तेँ उसके पिताजी और उसने खोजे थे। कहने को वो छोटा था पर बहनों की विदाई उसने बड़ा भाई बनकर की थी। बहनों के तो घर बस गए थे

पर वेदांत ने अपनी मेहनत के बल पर इंजीनियरिंग पूरी की और एक जगह अभी नौकरी पकड़ ली। इस बीच एक सुशील और घरेलू लड़की दिव्या से उसकी शादी हो गई। शादी के लगभग दो साल बाद ही वेदांत की मां काफ़ी बीमार पड़ी।अपनी नई नौकरी से किसी तरह से छुट्टियां लेकर वो दिन-रात मां के साथ हॉस्पिटल में रहता उधर उसकी पत्नी ने घर-गृहस्थी की ज़िम्मदारियां उठा ली।

वेदांत ने अपनी मां की तबियत सुधारने के लिए दिन-रात एक कर दिए। दिल्ली में जिस हॉस्पिटल में मां एडमिट थी,वहां रात को मरीज के पास घर के लोग नहीं रुक सकते थे तो वो हॉस्पिटल के बाहर ही जो गार्डन था उसकी बेंच पर ही रात गुजार देता क्योंकि आस पास कमरे बहुत महंगे थे। वो इन सब पैसों को बचाकर सिर्फ मां को अच्छे से अच्छा इलाज़ देना चाहता था।

मां का एक ऑपरेशन होना था। पैसे की थोड़ी समस्या आ रही थी। ऐसे में सारे रिश्तेदारों में सबसे बड़ी बहन और उनके पति ने अपनी तरफ से मदद का हाथ बढ़ाया। पर इधर वेदांत को पत्नी भी बहुत सुलझी हुई मिली थी उसने उसको कहा कि किसी से मदद लेने से अच्छा है कि उसके जो शादी के गहने हैं वो गिरवी रखकर भी मांजी का ऑपरेशन कराया जा सकता है।

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इस तरह सबसे बड़ी शादीशुदा बहन से मदद लेने की आवश्यकता तो नहीं पड़ी पर वेदांत के मन में अपनी बहन और अपने जीजाजी के लिए इज्ज़त बहुत बढ़ गई थी। ऐसे समय में संवेदना के दो बोल और उनकी तरफ से मदद का वास्ता ने वेदांत के मन में उनकी छवि बिल्कुल माता-पिता वाली बना दी थी।खैर मां का ऑपरेशन तो ठीक हुआ पर शायद उनको ज्यादा जीना नहीं था।

अपने बेटे-बहू से वो अपने पति और अपनी बेटियों का मायके में मान सम्मान का वचन लेकर ऑपरेशन के तीन दिन बाद ही संसार से विदा हो गई। मां तो चली गई पर उनके जाने के लगभग छः महीने बाद वेदांत के सरकारी विभाग में इंजीनियर के पद पर नियुक्ति की खबर आई। कुछ समय की ट्रेनिंग के बाद एक बड़े शहर में वेदांत की नियुक्ति हो गई।

अब पूरा परिवार जिसमें वेदांत के पिता भी शामिल थे वो भी वेदांत के साथ ही रहने के लिए आ गए। ज़िंदगी थोड़ी संभलने लगी थी। वेदांत और उसकी पत्नी दिव्या अपनी सारी जिम्मेदारियां अच्छी तरह निभा रहे थे। कोई भी तीज त्यौहार होता पर तीनों बहनों के ससुराल में अपनी सामर्थ्यनुसार भाई भाभी की तरफ से शगुन,फल और मिठाई पहुंच जाते।

दोनों के चेहरे पर ये सोचकर जरा भी शिकन नहीं आती थी कि वो लोग तीनों बहनों से उम्र में काफ़ी छोटे हैं तो वो क्यों सब रिश्तेदारों निभाएं,बल्कि वो तो खुशी खुशी सब करते थे। यहां तक की अब तीनों बहनों के बच्चों की शादी की भी उम्र हो गई थी। उनकी शादी में भात का इंतजाम भी वेदांत ने बहुत मन से किया था।

अपने कर्तव्य तो वो निभा ही रहा था पर वो अपने कमाए वेतन में से जो बचत होती थी वो अपनी सबसे बड़ी बहन और जीजाजी के पास जमा करवा रहा था क्योंकि जिस शहर में वेदांत की नियुक्ति थी वो लोग उसमें ही रहते थे। वैसे भी वेदांत अपनी सबसे बड़ी बहन को मां समान मानता था।

अपने वेतन की बचत का एक हिस्सा बड़ी बहन के पास जमा करते करते अब उसको काफ़ी समय बीत गया। अब उसका बेटा भी बड़ा हो गया। उसको इंजीनियरिंग की तैयारी करनी थी। उसकी कोचिंग के लिए वेदांत को पैसे जमा करवाने थे। वेदांत को पूरा विश्वास था कि उसके जो रुपए बड़ी बहन के पास जमा हैं वो इस वक्त काम आ जायेंगे। 

बेटे की कोचिंग की सारी बात करके जब वेदांत बड़ी बहन के पास अपना पैसा लेने गया तब पहले तो उसकी बहन और उसके पति उससे इधर उधर की बात करने लगे और यहां तक कहने लगे कि क्या आवश्यकता है बच्चे की कोचिंग पर इतना खर्च करने की। वैसे भी बच्चा मेहनती है घर पर एक साल लगकर पढ़ाई करेगा तो बिना कोचिंग के भी परीक्षा निकाल लेगा।

तब वेदांत ने कहा कि नहीं मैं अपने बेटे को सारी सुविधा देना चाहता हूं,कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता।जब वेदांत उन लोगों की बातों में नहीं आया तब उन्होंने कहा कि अभी उनके पास वेदांत के जमा कराए पैसे नहीं हैं क्योंकि बीच में व्यापार में आवश्यकता पड़ी थी तो उन्होंने उसमें वो पैसा लगा दिया। वेदांत ने कहा पर आप लोगों को एक बार तो मेरे से बताना चाहिए था।

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उस पर भी उन लोगों ने कहा कि पैसा किसी गैर के लिए नहीं बल्कि उसके भांजों के व्यापार के लिए ही लगा है। जैसे ही मुनाफा होना शुरू हो जाएगा वो सब चुका देंगे इतने अपने बेटे के लिए वो कहीं और से पैसे का इंतज़ाम कर ले। उनका इस तरह का व्यवहार वेदांत का दिल तोड़ गया।इन सब बातों को सुनकर वेदांत को बहुत धक्का लगा क्योंकि उसकी बहन और जीजा ने उसका जमा किया  पैसा व्यापार में लगाने से पहले एक बार भी उससे पूछा नहीं था।

वेदांत को बेटे का भविष्य अंधकारमय लग रहा था। उसको समझ नहीं आ रहा था कि कैसे वो घर पर अपने बेटे का सामना करेगा। भारी कदमों से वो बहन के यहां से उठा और सिर्फ इतना ही कह पाया कि ”तुम पर विश्वास करना मेरी सबसे बड़ी गलती थी”आज वहां पर उसे किसी ने रुकने के लिए भी नहीं कहा।

किसी तरह वो घर पहुंचा,उसके पहुंचते ही बेटे ने बड़े उल्लास से पूछा कि पापा कब से जाना है मेरे को कोचिंग? उससे कुछ कहते नहीं बना। उसकी हालत देखकर दिव्या को लग गया कि अवश्य ही कुछ बात हुई है,उसने बेटे को कहा कि पापा अभी थोड़ा थके हैं अभी थोड़ी देर में बता देंगे। बेटा तो वहां से चला गया पर आज वेदांत अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाया वो दिव्या के सामने फूट फूटकर रोते हुए उसने सब बताया।

दिव्या ने उसको समझाते हुए कहा कि सब ठीक हो जायेगा। आपने थोड़े समय पहले बताया था कि आपके यहां बच्चों की शिक्षा के लिए कुछ राशिनिधि एडवांस में देने की योजना बनी है। हम थोड़े समय के लिए उस राशि से काम चला लेंगे फिर दीदी ने भी कहा है कि व्यापार में मुनाफा होते ही वो पैसे दे देंगे।

वो ये कह ही रही थी इतने में वेदांत के पिताजी उनकी बातें सुनते हुए उनके पास आए बोले कि बेटा आवश्कता से अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए कभी,चाहे खून के रिश्तें ही क्यों ना हो,वैसे अपने पोते के लिए कुछ ज़िम्मेदारी तो मेरी भी बनती है। मैं जब से यहां आया हूं,

तुम मेरे को भी हर महीने कुछ पैसा देते थे जो मेरे को आज तक खर्च करने की नौबत नहीं आई।इससे अच्छी बात क्या होगी कि अब वो पैसा मेरे पोते के काम आएगा।वेदांत को थोड़ा सहारा मिला। उसके बहन और जीजा की नीयत में तो फर्क आ गया था उन्होंने उसका पैसा थोड़ा-बहुत किसी तरह लौटाया पर पूरा वापिस नहीं किया। 

वेदांत ने तो हमेशा उन लोगों को अपने माता-पिता के समान इज्ज़त दी थी,इसलिए उसने सब बातें वक्त और भगवान पर छोड़ दी। बहन और बहनोई ने किसी की ईमानदारी का पैसा मारकर व्यापार में लगाया था तो उनको बरकत नहीं मिली। उनके बच्चे भी जीवन में आगे नहीं बढ़ पाए। बहन और बहनोई भी आखिरी समय गंभीर बीमारियों से जूझते रहे।उधर वेदांत का बेटा आगे चलकर बहुत बड़ा सरकारी अफसर बना। कई बार ईश्वर का न्याय सारा हिसाब चुकता कर देता है। वक्त ने स्वयं ही सबका भुगतान उनकी करनी के हिसाब से कर दिया था।

 

डॉ. पारूल अग्रवाल,

नोएडा

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#तुम पर विश्वास करना मेरी सबसे बड़ी गलती थी

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