अरे छोटी .. आओ … आज तो बहुत दिनो बाद याद आई अपनी दीदी की… रंभा ने राम्या (अपनी देवरानी) को बोला जो आज पूरे एक महीने बाद अपनी जेठानी के घर आई थी।
हां दीदी बच्चों के एग्जाम चल रहे थे तो थोड़ी बिज़ी थी .. आज कुछ काम से बाजार आई थी तो सोचा मिलती चलूं
हां सही किया तुमने .. और आज मैने तुम्हारी पसंद के गोभी के पकोड़े भी बनाकर रखे हैं खाकर जाना… तब तक मैं चाय चढ़ाती हूं तुम बैठो मैं अभी आई … कहकर रंभा रसोई में चली जाती है और राम्या उसके घर को देखती है और सोचती है…
अरे नया सोफ़ा. नई टीवी …वाह दीदी ने तो अलग होते ही सब ले लिया ….
देखो… क्या ऐश हो रहे हैं .. अच्छा हुआ जो मैं आ गई नही तो मुझे तो पता ही नही चलता राम्या ईर्ष्या के भाव से भर गई
राम्या और रंभा वैसे दोनो सगी बहनें थी पर आपस मे देवरानी , जेठानी भी थी। एक रंभा थी जो दूसरों को खुश देखकर बहुत खुश हो जाती तो दूसरी तरफ राम्या जो मुंह की तो मीठी थी पर दूसरों की खुशी उससे हजम नही होती। उसको हमेशा लगता कोई उससे ज्यादा खुश कैसे है?
बस एक यही कारण था दोनो बहनों के अलग होने का नही तो राजीव और संजीव दोनो भाईयो में बहुत प्रेम था पर राम्या के चिड़चिड़े स्वभाव की वजह से घर का माहोल आए दिन खराब होता रहता। रंभा जहां राम्या को देवरानी नही अपनी बहन समझती थी वहीं राम्या उसे जेठानी समझ कर उससे परायों जैसा बर्ताव करती थी।
राम्या बचपन से ही गोरी, देखने में सुंदर और होशियार थी उसे अपने आप पर हमेशा गुरूर था पर ईर्ष्यालु स्वभाव की थी ।क्लास में इस डर से किसी की मदद नही करती कि कोई उससे ज्यादा नंबर नही ले आए और वो पीछे नही रह जाए और कभी कोई उससे ज्यादा नंबर ले भी आता तो उसे अच्छा नही लगता और वो उसके लिए कभी खुश नहीं होती घर आकर सिर पकड़ कर बैठ जाती तो हर कोई समझ जाता आज जरूर कुछ हुआ है स्कूल मे… जबकि रंभा देखने में जरूर सावली थी पर स्वभाव से सीधी सादी ,दूसरों की परेशानी समझने वाली, दूसरों के दुख में दुखी और सुख में सुखी रहने वाली थी इसलिए परिवार के हर सदस्य की प्रिय थी । गुरूर नाम की चीज़ से कोसों दूर थी। इसलिए हर कोई उससे मिलकर खुश होता, उसकी तारीफ करता पर राम्या को ये भी अच्छा नही लगता।
वो मुंह पर तो कभी नही बोलती पर मन ही मन रंभा से ईर्ष्या जरूर करती थी।
पर किस्मत में दोनो बहनों को एक ही ससुराल मिलना लिखा था इसलिए रंभा की शादी के बाद राम्या भी उसके देवर संजीव की दुल्हन बनकर घर आ गई क्योंकि संजीव और राम्या एक ही ऑफिस में काम करते थे और एक दूसरे से प्यार भी करने लगे थे इसलिए घर वालों की रजामंदी से दोनो की शादी हो गई
अब दो बहने जेठानी, देवरानी बन गई
रंभा बहुत खुश थी और राम्या की छोटी मोटी गलतियों को हमेशा नजरंदाज करती आई थी क्योंकि वो जानती थी उसका स्वभाव ।
यहां ससुराल में भी राम्या को लगता कि सब उससे ज्यादा रंभा को पसंद करते हैं क्योंकि अपने स्वभाव के मुताबिक वो यहां भी अकेला रहना पसंद करती , सबकी खुशी में शामिल नहीं होती जबकि रंभा को बस पता लगने की देर होती की पड़ोस के या रिश्तेदारी के फलाने घर में शादी तय हो गई या बच्चे की नौकरी लग गई या नया घर या सामान लिया बस वो या तो बधाई देने पहुंच जाती या फिर फोन करके अपनी खुशी जाहिर करती। रंभा के इसी अपनेपन के तो दीवाने थे सब लोग पर राम्या को लगता कि उसकी बहन चापलूसी करती है ।
राम्या कभी कभार पूछती भी कि दीदी आप इतना चापलूसी क्यों करती हो सबकी? इतना खुश क्यों हो जाती हो? किसी के यहां कुछ भी हो उससे हमे क्या? किसी की शादी हो या माता का जागरण, आप बिना बुलाए ही नाचने गाने लगती हो , मुझे अच्छा नही लगता ये सब …
अरे तो इसमें बुराई क्या है ? कोई इतना खर्चा कर रहा है , इतनी मेहनत कर रहा है अपने शादी या जागरण पर और हम मुफ्त में अपनी खुशी भी जाहिर न कर पाएं तो फिर अपना होने का क्या फायदा… बता हमारा कौनसा पैसा या धेला लग रहा है जो हम नाचने , गाने या मस्ती करने और खुश रहने में भी कंजूसी करे।
और फिर खुद की खुशी में तो सब शामिल होते ही हैं मजा तो दूसरों की खुशियों में शामिल होने में है। एक बार तू भी शामिल होकर देख सबके साथ उनकी खुशियों में.. देखना कितना आनंद आएगा..
दीदी रहने दो आप … खुद तो आप गंवार हो ही अब मुझे भी अपने जैसा बनाना चाहती हो
ये क्या कह रही हो राम्या तुम… पीछे से संजीव उसके पति की आवाज़ से वो चौंक गई
अरे कुछ नही भैया .. ये हम दोनो बहनों के बीच की बात है आप रहने दीजिए… रंभा ने राम्या का बचाव करते हुए कहा
नही भाभी मैं देख रहा हूं रंभा का व्यवहार कैसा है आपके प्रति ,एक आप ही तो हो जिसने पूरे परिवार को एक सूत्र में पिरो रखा है वरना मां का स्वभाव तो आप जानती थी वो भी कहां किसी की खुशी में शामिल होती थी कहीं , सबसे मन मुटाव चलते थे उनके। आपके आने के बाद उनके मना करने के वावजूद आपने सबसे संबंध बनाए रखे। पहल करके सबसे मिलना जुलना जारी रखा और अब देखो हमारा संयुक्त परिवार कितना अच्छा लगता है साथ में ( रंभा का ससुराल बड़ा था दो चाचा ससुर, दो बुआ सास , दो ननद सभी का भरा पूरा परिवार था)
संजीव आप बात मत बढ़ाओ । मैं वो ही बोल रही हूं जो सही है.. राम्या ने कहा
तो क्या भाभी गंवार है? अरे तुम जब तक अपना स्वभाव नही बदलोगी तब तक सामने वाला इंसान तुम्हे गंवार ही लगेगा क्युकी तुम समझती हो तुम्हारे बराबर कोई अक्लमंद नही है तुम्हे अपनी पढ़ाई, सुंदरता पर गुरूर है पर ऐसे गुरूर का क्या जो अपनों को ही अपनों से दूर कर दे।
तुम कभी आगे से बढ़कर गई हो किसी की खुशी में शामिल होने कभी?
तुम्हे कैसे पता होगा कि आंनद आता है या नही आता संजीव गुस्से में बोला
चलो छोड़ो संजीव तुम भी क्या छोटी सी बात को तूल दे रहे हो, रंभा ने बोला
संजीव कुछ और बोलता उससे पहले रंभा ने उसे इशारों में चुप करा दिया
राम्या ये सब देख रही थी और उसे अच्छा नही लगा कि संजीव रंभा के कहने से बिलकुल चुप हो गया ( शायद कुछ गलतफहमी उसके मन में जन्म ले चुकी थी)
अब आए दिन घर का माहोल खराब ही रहता क्योंकि संजीव और रंभा का आपस में बोलना भी अब राम्या को अखरने लगा था
इसी का परिणाम था कि रंभा अपने पति राजीव और बच्चों के साथ किराए के मकान में शिफ्ट हो गई आखिर राम्या छोटी बहन थी उसकी इसलिए उसने सबकी भलाई का सोच अलग घर बसाने के बारे में सोच लिया था।
घर में कोई बड़ा था नही जो कुछ सुझाव देता क्योंकि ससुर जी तो रंभा की शादी से पहले ही चल बसे थे और सासू मां भी उसकी शादी के तीन साल बाद लकवे का शिकार हो गई और दो साल बाद वो भी चल बसी।
अब दोनो बहने अलग हो गई । रंभा को लगा शायद अब राम्या खुश रहेगी पर गुरूर के चलते अब भी आदतन वो किसी की बढ़ती तरक्की को जल्दी पचा नहीं पाती। असल में वो किसी की भी खूबियां ढूंढने के बजाय उसकी खामियों पर ज्यादा ध्यान देती इसलिए हमेशा तनाव या सिरदर्द का शिकार हो जाती। उसकी ख्वाहिशें कभी पूरी नहीं होती । हमेशा कुछ ज्यादा की चाह में उसका मन विचलित होता रहता।
आज भी रंभा के घर से आने के बाद अपना सिर पकड़ कर बैठ सोच ही रही थी कि संजीव आ गया ।
उसने पूछा आज क्या हुआ? किसी ने तुमसे अच्छा कुछ खरीद लिया या किसी के यहां कोई खुश खबरी है( उसे पता था राम्या सिर पकड़ कर तभी बैठती है जब कोई उससे ज्यादा खुश इंसान उसे मिल जाता है या फिर उससे कम पैसे वाले ने कोई कीमती सामान खरीदा हो जिससे उसके गुरूर को झटका लगा हो)
तुम्हे पता है दीदी ने नया सोफ़ा और नया टीवी ले लिया , देखने में काफी महंगा लग रहा था। पता नही इतने रुपए कैसे जमा किए उन्होंने..
हां मुझे पता है और सोफ़ा उन्होंने सेकंड हैंड लिया है जबकि टीवी किश्तों पर ली है कल ही भैया से बात हो रही थी मेरी
पर तुमने तो बधाई भी नही दी होगी उनको…
खेर छोड़ो.. तुम्हे समझाने का कोई फायदा नही कहकर संजीव अंदर चला गया
राम्या किसी से खुश नहीं होती तो संजीव ने अब उसे बताना ही छोड़ दिया था
वो अपना सा मुंह लेकर रह गई बेचारी…
उसे अपने आप पर गुरूर था शायद इसलिए वो कभी भी अपनी गलती मानने के लिए तैयार नहीं थी और किसी से आगे होकर बोलने में अपनी तौहीन समझती थी फलस्वरूप सबसे दूर होती जा रही थी। दूसरों की खुशियों में शामिल होने के बजाए वो उनसे ईर्ष्या करती थी।
यही अंतर था दोनो बहनों में राम्या को खुश होने की कोई वजह नहीं दिखती थी इसलिए वो हमेशा दुखी रहती थी जबकि रंभा छोटी छोटी चीजों में ही खुश हो जाती थी जैसे कभी उसको मनपसंद तरबूज खाने को मिल जाता या कभी उसकी नींद पूरी हो जाती या जब सारा परिवार इकठ्ठा होता या कभी उसके किसी अपने रिश्तेदार या पड़ोसी की तरक्की हो जाती
उसके लिए हर छोटी चीज़ बहुत मायने रखती इसलिए उसे कभी खुश होने की वजह ढूंढनी नही पड़ती और वो हमेशा खुश रहती
गुरूर या अभिमान करना उसने कभी सीखा ही नही था
दोस्तों जिंदगी छोटी सी है इसे खुश रहने और खुशियां बांटने में व्यतीत करना चाहिए ना कि गुरूर को खुद पर हावी होने देना चाहिए जिससे रिश्तों में दूरियां पनप जाए
अपने विचार साझा करके मेरा उत्साहवर्धन करना ना भूलिए
धन्यवाद
निशा जैन
कथा बहोत अच्छा लगी. आपकी कहानिया हमेशा कुछ नया पैलू उजगार करती हैं. कहते हैं ये तो मानवी स्वभाव हैं जिसे बदलना मुश्किल होता हैं. रंभा और रम्या उसीके चलते खूश और नाखुष हैं.
ये नयी कहानी गुरुर काफी रोचक हैं जों मनुष्य के स्वभाव पर रोशनी डाल ती हैं. कीं कैसे कोई अपने स्वभाव के चलते सब को साथ लेके चलता हैं तो कोई उसीके चलते नाखुष और अकेला पड जाता हैं.