अपने आप तो बाबूजी और माँजी चले गए , इस रूपा को सारी ज़िंदगी हम झेलें , पैंतालीस की हो चुकी …. अब तो शादी होने से रही ……तुम्हारा छोटा भाई परिवार को लेकर नौकरी पर चला गया । एक मैं और मेरे बच्चे, हम निभाते रहे सारे रिश्ते… .
पुष्पा! रूपा दीदी इस घर की बेटी है और जितना संपत्ति पर हम दोनों भाइयों का हक़ है उतना ही इनका भी है । तुम जो रात- दिन का राग अलापती रहती हो , बंद कर दो । बाबूजी ने दीदी की शादी की बहुत कोशिश की , अब कहीं बात नहीं जमी तो क्या , किसी से भी ब्याह करके घर से निकाल देते ?
अपनी लड़की की कमी तो बाबूजी और माँजी को कभी दिखाई नहीं दी …..
दिखाई दी थी, इसलिए उन रिश्तों पर भी गौर किया गया जो किसी भी लिहाज़ से रूपा दीदी के लायक़ नहीं थे । सिर्फ़ एक हाथ न होने के कारण, क्या किसी भी जुआरी – नशेडी या लालची के साथ अपनी बेटी को भेज देते ?
मेरे भाई ने कई रिश्ते बताए पर क्या आप लोगों ने ध्यान दिया? अरे ! अभागी है ये , नहीं तो एक हाथ क्यों कटता ?
ज़बान मत खुलवाओ मेरी , रूपा दीदी से बीस साल बड़े दहेजू के साथ शादी का रिश्ता बताया था तुम्हारे भाई ने …..
अपने कमरे में बैठी रूपा के कानों तक भाई- भाभी के झगड़े की आवाज़ पहुँच रही थी । क्या शादी के बिना लड़की का कोई अस्तित्व नहीं है? ऐसे कैसे किसी के भी साथ शादी कर लेती ? समझौते भी किए पर फिर भी कोई माँ- बाबूजी के मन को नहीं जँचा? नौकरी है मेरी ….भगवान! मेरा सीधा हाथ क्यूँ छीना , लेना था तो उल्टा लेता । हालाँकि वह अपने सारे काम उल्टे हाथ से करने की आदत बना चुकी थी ।
देखते ही देखते रूपा की आँखों से आंसुओं की अनवरत धारा बह चली । आज फिर भाभी ने उसे अभागी कह दिया ….. क्या केवल एक विवाहिता ही सौभाग्यवती होती है ? रूपा के दिलोदिमाग़ में बहुत से प्रश्न उठ रहे थे । अगर ऐसा था तो क्यों दादी अक्सर कहती थी—-
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सौभाग्यवती है मेरी रूपा , अपने पीछे दो भाई लेकर आई है । बस हाथ छीनकर , न जाने कौन से जन्म की सजा दी भगवान ने।
उसे याद है वो दुर्घटना, जब सड़क पार करती पाँच साल की छोटी सी रूपा को बेक़ाबू ट्रक ने रौंद डाला था । काश ! उसका स्कूल ड्राइवर उस दिन ग़लत दिशा में बस रोककर , उसे दौड़कर सड़क पार करने को न कहता …. ….
शायद ट्रक वाला भी छूट गया हो , बस ड्राइवर भी अपने हिस्से का दंड भोग चुका हो पर रूपा को तो आजीवन यह सजा भोगनी थी। जिस दिन वह अस्पताल से लौटकर घर आई थी तो पोती के एक हाथ को देखकर दादी दहाड़े मारकर रोती हुई बोली थी—-
इससे तो अच्छा भगवान इसे उठा लेता , दो-चार दिन रोपीटकर बैठ जाते । लड़की की जात , कौन ब्याह करेगा , कैसे गुज़ारा होगा ?
दादी की बातों ने माँ और बाबूजी के दिल पर छुरियाँ चला दी थी । माँ ने अपनी बेटी को अपने आँचल में छुपा लिया और बाबूजी रूआँसे होकर बोले थे —-
ऐसा मत कहो माँ , भगवान ने मेरी बच्ची की जान बख्श कर अहसान किया है । ये तो सौभाग्यवती है जो एक हाथ पर ही ग्रह टल गए । देखना ….. जब ये पढलिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी तो रिश्तों की लाइन लग जाएगी ।
काश! दादी की इच्छा पूरी हो जाती तो आज यूँ अपने छोटे भाई- भाभी के सामने तिरस्कृत न होती । रूपा ने उसी समय काग़ज़ निकालकर अपने तबादले के लिए आवेदन कर दिया —
निर्णय तो करना ही पड़ेगा, आख़िर कब तक आत्मसम्मान खोकर जियोगी ?
रूपा आँसू पोंछती जा रही थी और कलम चलाती जा रही थी । उसका तबादला बिहार के नवोदय स्कूल में कर दिया गया । भाई तो दुखी था —-
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दीदी .. अकेली कैसे करोगी ? अरे , इसके कहने को दिल से लगा लिया , अपने भाई के मन को नहीं देखा ?
—-हरीश, भाई के मन को देखकर ही साहस आया है, अब मैं सही अर्थों में अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूँ । कोई परेशानी होगी तो बताऊँगी । नवोदय स्कूल का अपना अलग कैंपस होता है, एक तरह से परिवार ही बन जाएगा ।
अपनी अपाहिज बहन को रेलगाड़ी में बैठाते समय हरीश की आँखों में आँसू थे पर रूपा के चेहरे पर एक आभा थी । रूपा ने बहुत जल्दी नए स्थान पर एक नई पहचान बना ली । अब वह खुलकर जीना सीख गई थी । उसके सहकर्मियों ने उसे कृत्रिम अंगों की सर्जरी के बारे में सोचने के लिए कहा । ख़ैर एक दिन उसने मन बना ही लिया कि वह पटना के सबसे अच्छे सर्जन से मिलेगी और अपने खोए हाथ को पुनः पा लेगी ।
पूरे स्टाफ़ ने उसे महसूस भी नहीं होने दिया कि वह अकेली है ।
और जब गर्मी की छुट्टियों में हरीश उसे लेने आया तो रूपा दीदी के दोनों हाथों को देखकर और उन्हें छूकर उसकी आँखों से आँसू बह निकले ।
काश! हम लोग कई साल पहले दीदी के लिए लड़का देखने से पहले मेडिकल रिसर्च पर ध्यान देते । कैसे कहे कि दीदी! जीवन में एक जीवन साथी के बारे में, अब सोच लीजिए ।
पर चाहते हुए भी हरीश के मुँह पर दिल की बात ना आ सकी । लेकिन आज उसे तसल्ली थी कि गुमसुम रहने वाली उसकी बड़ी बहन जीना सीख चुकी है, वे अपने पैरों पर सही अर्थों में खड़ी हो चुकी हैं और अगर उन्हें कोई अच्छा और सच्चा साथी मिला तो वे उसे अवश्य जीवनसाथी के रूप में अपना लेंगी ।
वास्तव में आज भी न जाने ऐसे कितने क्षेत्र हैं जहाँ जागरूकता की आवश्यकता है ।
# निर्णय तो करना पड़ेगा आख़िर कब तक घुट घुटकर जियोगी #
करुणा मलिक