**घर जमाई** – श्याम कुंवर भारती : Moral Stories in Hindi

मालिनी कॉलेज के पुस्तकालय में अकेली बड़ी उदास बैठी थी।उसके आंखों से आंसू बह रहे थे।व्यक्ति जब बहुत ही विकट परिस्थिति में पहुंच जाता है और किसी से अपना दुख साझा नहीं कर पाता है तो इसी तरह अकेले अपने आंसू बहाकर अपना दुख हल्का करने जा प्रयास करता है।

तभी उसे ढूंढता हुआ प्रणय पहुंच गया ।उन दोनो का विवाह होना तय हुआ था।उसे मालिनी की उदासी और आंखों में आंसू देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ।उसने उसकी उदासी का कारण पूछा ।तुम यहां अकेली बैठी हो और मैं तुम्हे कहा _कहा ढूंढ रहा था।

तुम इतनी उदास क्यों हो ।मुझे भी चिंता हो रही है ।शीघ्र ही हम दोनो का विवाह होने वाला है और इस खुशी के अवसर पर तुम्हारी उदासी और आंखों में आंसू मुझे व्यथित कर रहे है।

मालिनी चुप रही ।उसकी आंखो से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

तुम चुप क्यों हो बोलो क्या बात है।मुझसे रहा नहीं जा रहा है।हम दोनो एक दूसरे को प्यार करते हैं।है दोनों का सुख दुख सब एक है ।प्रणय के बहुत जिद करने पर मालिनी ने बताया कि उसके पिता ने प्रणय के पिता के द्वारा मांगे गए दहेज के रुपयों के अपना घर और जमीन गिरवी रख दिया है।विवाह उपरांत अगर मेरे पिता ने कर्ज के रुपए नहीं चुकाए तो  वे बेघर हो जाएंगे और भूखे मरेंगे।इसलिए न चाहते हुए भी मैं अब इस विवाह को नहीं करना चाहती ।

सुनकर प्रणय को बड़ा आश्चर्य हुआ और दुख भी हुआ ।उसने दहेज के रुपयों के बारे में पूछा _ दहेज की रकम कितनी है।मालिनी ने बताया पूरे दस लाख रुपए है।

प्रणय ने कहा _ तुम चिंता मत करो रुपयों का इंतजाम मै कर दूंगा तुम अपने पापा को दे देना और जैसा मैं कहता हूं वैसा करो।

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विवाह बड़े धनधाम से संपन्न हो गया।मालिनी के पिता ने विवाह से पूर्व ही दहेज के रुपए प्रणय के पिता को दे दिए थे।वे एक बड़े उद्योग पति थे ।रूपयो की कोई कमी नहीं थी।

प्रणय उनका इकलौता बेटा था।प्रणय की जिद और उसके  प्यार के चलते उन्होंने मालिनी के साथ रिश्ता स्वीकार किया था।

विवाह उपरांत दुल्हन की विदाई के समय प्रणय ने दुल्हन की विदाई को रोकते हुए कहा दुल्हन बिदा नहीं होगी बल्कि मैं अब अपने ससुराल में ही  रहूंगा  घर जमाई बनकर।क्योंकि दुल्हन के पिता ने मुझे दस लाख रुपए में मेरे पिता से खरीद लिया है।

उसकी बात सुनकर उसके पिता, बाराती और घराती सभी दंग रह गए।

उसके पिता ने उसे बहुत समझाया बेटा यह हमारे समाज का वर्षों से चला आ रहा रिवाज है इसलिए मैने भी वही किया।अब तुम जिद मत करो और दुल्हन को बिदा कर अपने घर चलो।

रिवाज अगर किसी को बेघर और भूखा कर दे तो क्या ऐसे रिवाज को मानना चाहिए पापा ।अगर आपको रिवाज निभाना है तो दहेज के नाम पर  एक रुपया लेकर बाकी रुपए लौटा दे तभी दुल्हन की विदाई होगी ।

आपके पास पैसे की कोई कमी नहीं है।

उसकी जिद के आगे उसके पिता मजबूर होकर दहेज के सारे रुपए मालिनी के पिता को लौटा दिए।

मालिनी रोते हुए प्रणय के हृदय से लग गई।

लेखक

श्याम कुंवर भारती

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