सौरभ उठो ना ,देखो तो मम्मी जी कहाँ रह गयी हैं , नौ बजने वाले हैं ,अभी तक नहीं आयीं वैसे तो रोज आठ बजे तक आ जाती थीं पर इधर दो तीन दिन से रोज आधा घंटा देर से आती हैं पर आज तो एक घंटा हो गया अभी तक नही आयीं |
नेहा ने अपने पति सौरभ से कहा|
कहाँ गयी होंगी अभी आ जायेंगी,तुम परेशान न हो | सौरभ ने उत्तर दिया|
अरे परेशान कैसे न होऊँ अभी नाश्ता भी तैयार नही है और बाकी सारा काम भी वैसै ही पड़ा है, और अभी कामवाली भी नही आई है | अब मै काम देखूँ या आफिस जाऊँ| मेरे आफिस का भी टाइम हो रहा है ,और मेरा टिफीन नाश्ता वगैरह कुछ भी तैयार नही है ,हद है लापरवाही की भी! नेहा खीझकर बोली|
सौरभ- तुम परेशान मत हो ,लाओ मैं तुम्हारी मदद करता हूं वरना तुम्हे आफिस के लिए लेट हो जाएगा|
नेहा- मेरी मदद की छोड़ो ,अपनी माँ की फिक्र करो पता नहीं कहाँ रह गयी हैं ,मैं तो कहती हूं आज ही उनसे बात करो की ये सब क्या है,कहाँ जाती हैं आजकल !!
सौरभ- जाऐंगी कहाँ ,कही बातचीत में व्यस्त हो जाती होंगी |
नेहा – क्या पता ? आजकल तो किसी को भी कुछ कहा नही जा सकता ,जवान की तो छोड़ो बूढों के भी रंग ढंग अलग हैं |
सौरभ गुस्से में -” मतलब!क्या कहना चाहती हो तुम”?
नेहा – मै कुछ नही कह रही ,अपनी माँ से बात करो कहां रहती हैं इतनी देर आजकल ! कहते हुए नेहा अपने काम में लग गयी|
ये बात हो रही है शारदा जी के बारे में ,जो पति के देहावसान के बाद गांव से शहर अपने बेटे बहु के साथ रहने आई हैं, गांव में अकेले कैसे रहोगी ये कहकर उनका बेटा उन्हे अपने साथ शहर ले आया था,जब से शारदा जी आई थीं
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धीरे -धीरे घर के सारे काम की जिम्मेदारी उनपर ही आ गयी थी ,सौरभ उनका इकलौता बेटा और नेहा उनकी बहू दोनो ही मल्टीनेशनल कम्पनी मे नौकरी करते थे और वंश उनका ढाई साल का पोता प्ले स्कूल जाता था | उसे छोड़ने और लाने की जिम्मेदारी भी शारदा जी के ही कंधो पर ही आ गई थी | पहले तो घर के सभी कामों के लिए कामवाली आती थी और एक फुल टाइम मेड रखी हुई थी जो पोते वंश की भी देखभाल करती थी |पर एक के बाद एक करके सबकी छुट्टी कर दी गयी थी कि वो सही से काम नही करती हैं | बस एक बर्तन और साफ सफाई वाली आती है |खैर शारदा जी अपना ही घर है बेटा बहु है पोता है ये सोचकर पूरे घर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी थी | पर इतना सब करने के बाद भी उनकी घर मे इज्जत ना थी ,नेहा तो कभी सीधे मुंह बात ही ना करती थी उसे तो सिर्फ उनके काम से ही मतलब था ,अपने बेटे सौरभ के मुंह से प्यार के दो बोल सुनने को भी तरस कर रह जाती थी |
पर एक दिन तो नेहा को फोन पर बात करते हुए उन्होने जो सुना वो उनके लिए असहनीय हो गया था ,वो फोन पर किसी से हंस कर बात कर रही थी कि अरे अब बहुत आराम है ,वंश की भी चिन्ता नही रहती सौरभ की मां ने बहुत अच्छे से घर संभाल रखा है ……अरे इसलिए ही तो उनको गांव से यहां ले आए कि उनको पैसा भेजना और यहां कामवालियों के पैसे दोनो बच रहे हैं और काम भी अच्छा हो रहा है और वंश की देखभाल भी ,वो भी बिल्कुल मुफ्त ! फ्री में फुलटाइम की मेड मिल गयी है वरना इन मेड के नखरे तो उफ ! तंग आ गई थी मै |तब हम लोगो ने ये रास्ता निकाला …..इसके आगे तो शारदा जी सुन न सकीं थीं |
असहनीय पीड़ा थी , क्षुब्ध हो गया था उनका मन यह सोच कर कि जिससे वह अपना घर बेटा बहू समझ रही थी उनके लिए उनका कोई महत्व ही ना था , उनकी स्थिति घर मे सिर्फ एक फुलटाइम मेड की थी | बहु को क्या दोष दे उनका खुद का बेटा भी उनका सम्मान ना करता था | कितने प्यार और उत्साह से वो इस घर को संभाल रही थी पर नेहा की बात सुनकर वे अत्यंत दु:खी हो गयी थी ,वो चुपचाप बिना नेहा को आभास कराए कि वो उसकी बात सुन चुकी हैं अपने काम में लग गई थीं |
शारदा जी के पति सुरेन्द्र जी एक किसान थे ,दूसरे की जमीन पर खेती का काम करते थे उसी के मेहनताने से उनका घर चलता था |खुद की कोई जमीन जायदाद थी नही,एक दो कमरे का छोटा सा अपना मकान ही था|
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सौरभ उनकी इकलौती संतान शादी के ग्यारह सालों बाद काफी मन्नतों के बाद हुवा था| वे दोनों सौरभ की परवरिश मे कोई कमी नही चाहते थे , अपना पेट काटकर भी उसकी सारी इच्छा पूरी करते थे,वे दोनो चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ लिख जाए और बहुत बड़ा आदमी बन जाए ,और सौरभ भी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरा था | गांव के स्कूल हमेशा पढ़ाई में अव्वल आता था ,स्कूल की पढ़ाई के बाद शहर आ गया कालेज मे दाखिला लिया ,पढ़ाई मे अव्वल रहने के कारण स्कॉलरशिप मिलती थी ,कालेज के बाद इन्जीनियरिंग करी और एक मल्टीनेशनल कम्पनी मे बतौर इन्जीनियर सिलेक्ट हो गया |सौरभ ने फोन कर उन्हे बताया था नौकरी के बारे मे जिसे सुनकर वे दोनो बहुत खुश थे | शारदा जी ने उससे कहा कि बेटा अब तो कुछ दिन के लिए घर आ जा कितने दिन हो गये हैं तुम्हे देखे हुए |
सौरभ -क्या माँ ! अभी तो नौकरी मिली है अभी से छुट्टी ना मिलेगी, छः महीने बाद देखता हूं ,छुट्टी मिलते ही आऊंगा |करीब आठ महीने बाद सौरभ आया दो दिन के लिए माँ बाबू जी के लिए खुशखबरी लेकर कि वो एक लड़की को पसंद करता है और उससे अगले महीने दोनो शादी कर रहे है |शादी की बात सुनकर दोनो पति पत्नी अवाक रह गये थे | अपने इकलौते बेटे की शादी को लेकर उन दोनो के सारे अरमान धरे के धरे रह गए थे |
पर सौरभ की खुशी के लिए वह दोनों मान गए, ना मानने का प्रश्न ही नहीं था क्योंकि सौरभ ने अपना फैसला सुना दिया था |
अरे बेटा इतनी जल्दी शादी का इंतजाम कैसे होगा! शारदा जी ने सौरभ से पूछा |
मां तुम्हें इंतजाम कर लेकर परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है ,शादी शहर में होगी वहां नेहा के पिता ही शादी का सारा इंतजाम कर रहे हैं अगले महीने आप दोनों को वहां आशीर्वाद देने चलना है |
खैर अगले महीने शहर जाकर विवाह सम्पन्न कराकर दोनो गांव लौट आए थे, उसके बाद शहर जाना ना हुआ ,वे दोनो पति पत्नी अकेले ही रहते थे |
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सौरभ हर माह कुछ पैसे भेज देता था पर दोनो कभी भी गांव नही आते थे | बस फोन से ही बात होती थी कभी कभी |खैर दोनो इस उम्र में भी एक दूसरे के साथ के सहारे जीवन गुजार रहे थे पर पति की मृत्योपरांत सौरभ गांव का मकान बेचकर उन्हे अपने साथ शहर लिवा लाया था कि अब वो शहर मे उसके साथ रहेंगी |
आज भी शारदा जी अपने पोते वंश को छोड़ने प्ले स्कूल गई थी तब से एक घंटा हो गया अभी तक नहीं आई थी इसी कारण से नेहा खीझ रही थी क्योंकि अभी तक कोई भी काम नहीं हुआ था |
तभी शारदा जी ने घर मे प्रवेश किया |
अरे , मां ! कहां रह गई थी आप हम दोनों कितने परेशान थे
,सौरभ ने कहा |
हां बेटा! परेशान तो हो ही गए होगे तुम लोग क्योंकि अभी तक घर का कोई काम जो नहीं हुआ , शारदा जी ने कहा |
अरे मां यह कैसी बातें कर रही हैं आप ! मुझे तो इस बात की चिंता हो रही थी कि इस अनजान शहर में इतनी देर कहां लगा दिया आपने , कहीं रास्ता तो नहीं भूल गई , सौरभ ने कहा |
मुझे खुशी हुई ये सुनकर बेटा कि तुझे अपनी बूढ़ी मां की इतनी चिन्ता है ,जुग जुग जियो मेरे लाल ,पर अब अपने घर को संभालो तुम लोग क्योंकि मैं जा रही हूं ,शारदा जी ने सपाट लहजे मे उत्तर दिया |
जा रही हैं मगर कहां और क्यों,सौरभ और नेहा एक साथ बोल उठे |
शारदा जी के जाने की बात सुनकर नेहा और सौरभ दोनो ही चौंक गए थे |
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नेहा के तो चेहरे का रंग ही जैसे उड़ गया था ये सोचकर कि अब घर और वंश को कौन संभालेगा और सारे काम कैसे होंगे |
जबसे शारदा जी आई हैं तब से तो वो घर मे तिनका भी नही हिलाती थी ,सारे काम और वंश की देखभाल सब शारदा जी ही करती थी और वे दोनो निश्चितं थे और कामवालियों को दिया जाने वाला पैसा भी बच रहा था |
पर मां!आप कहां जाएंगी ? अब तो गांव का मकान भी नहीं है और इस उम्र में आप अकेले कहां रहेंगी , और आपको यहां क्या परेशानी है , सौरभ ने पूछा |
बेटा तुम्हे इस सबकी चिन्ता करने की कोई जरुरत नही है ,मेरे रहने और खाने पीने सबकी व्यवस्था हो गयी है |
क्या ! कहां रहेंगी आप ?सौरभ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा |
वो मुझे एक डे केअर मे काम मिल गया है ,वेतन भी अच्छा देंगे और साथ ही साथ रहने खाना भी ,तो कल से मै वहीं जा रही हूं |
क्या आप डे केअर में काम करेंगी ,और वहीं रहेंगी ये आप क्या कह रही हैं मां !कम से कम मेरी इज्जत के बारे मे तो सोचा होता ,शहर मे मेरी कितनी इज्जत है और उसे धूल मे मिला रही हैं , सौरभ गुस्से मे बोला |
अच्छा मां जी ! इसी वजह से आजकल आपको देर हो रही थी ,आपको अगर यहां कोई परेशानी है तो हमे बताइए , पर आप यहीं रहिए , क्यों इस तरह के काम कर के हमारी बदनामी कराना चाहती हैं आप ,नेहा भी सौरभ के सुर मे सुर मिलाते हुए बोली |
नेहा की बात सुनकर शारदा जी मुस्कुराई और बोली ,बहु काम तो काम होता है और फिर वहां काम कर के मैं सम्मान के साथ रह सकूंगी और फिर फुलटाइम मेड से तो मुझे ये काम ज्यादा अच्छा लगा जितने घंटे की नौकरी उतने ही घंटे काम करना होगा |
शारदा जी की बात सुनकर नेहा के चेहरे का रंग उड़ गया था वो एक भी शब्द ना बोल पाई |
और हां!तुम लोग अपनी बदनामी की चिंता मत करो आखिर तुम्हारी मां हूं अपने बच्चों की बदनामी हो ऐसा कैसे सोच सकती हूं ,मैं इस शहर से दूर दूसरे शहर जा रही हूं जहां तुम्हे कोई नही जानता ,शारदा जी सौरभ और नेहा की ओर मुखातिब होकर बोलीं और अपने कमरे मे चली गई ,और सौरभ नेहा अवाक खड़े देखते रह गये थे |
रिंकी श्रीवास्तव