अभी अभी रीमा का फोन आया कि वह अपनी माँ के पास चली आई है।हमेशा के लिए ।
सीमा के घर से थोड़ी दूर ही था उसका घर । उसका मन नहीं माना वह उसी समय रीमा से मिलने पहुंच गई ।
रीमा उसे देख कर भावुक हो गयी ।कहने लगी,’ अब सब कुछ खत्म हो गया ।कितनी भी कमियाँ रहीं हो उनमें पर मैं उन्हें धोखा तो नहीं दे सकती ।इतने वर्षों बाद फिर से विजय से मिलकर मेरी सारी भावनाएं जाग्रत हो गयी । मैने उसे टूट कर चाहा था ।अगर उसके पिता ने दखल नहीं दिया होता तो हमारी शादी हो गयी होती ।” सीमा ने कहा,”पर अब तो उसकी शादी हो चुकी है न?”
‘तो क्या हुआ वह अभी भी मुझे चाहता है । अपने पापा के काम को बहुत आगे बढा लिया हे।बहुत
बड़ा बिजनेस है ।
हर बुधवार छुट्टी के दिन मुझ से मिलने आता था । जब से उसे पता चला कि मै उसी शहर मे आगयी हूँ बहुत खुश था ।मैं निखिल से झूठा रिश्ता नहीं रख सकती। हर रिश्ते में ईमानदारी ज़रूरी है ।मैं हमेशा सच के रास्ते पर चलीं हूँ ।”
सच,ईमानदारी,रिश्ते ,,,,कितनी उलझ गयी थी सीमा!’पर तेरा घर ,तेरा भविष्य,उसका क्या? विजय तो शादी शुदा है ।उस का परिवार है,बच्चे है ।अपना घर क्यों तोड़ रही है?
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,”अब मेरा वहां दम घुटता है। निखिल का व्यवहार विचित्र हो गया है ।अक्सर पी कर अभद्र हो जाते है ।जब से मैंने सच बताया है वह अपने आप को संभाल नहीं पा रहे है।”
निखिल ने अपनी बहन की लडकी को गोद ले लिया था।बहुत प्यार करता था उसे।
” चिन्की कहाँ है?”सीमा ने पूछा ।
” पता नहीं , सुना है कि निखिल छोड़ आयेगा अपनी बहन के पास ।अकेले कैसे सँभालेगा।”
सीमा भारी मन से घर को चल दी।
तभी अचानक रास्ते में निखिल मिल गये वह उन्हे अपने साथ घर ले आई ।
सीमा देखकर अचम्भित रह गई थी।कितने कमजोर हो गये थे निखिल ।कहने लगे ,” मीना बहुत भोली है , वह समझ नहीं पा रही है ,विजय का परिवार है बच्चे हैं, अपने परिवार से वह बहुत प्यार करता है।यह अपना जीवन खराब कर रही है।
देखना मैं चिन्की के बिना जी नहीं सकूँगा ।”
उसे तसल्ली देने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे।
कुछ दिन बाद पता चला कि बेटी को छोड़ कर आते समय
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निखिल ने रास्ते में रेल के पहियों के नीचे अपनी जिंदगी ,अपनी सारी तकलीफें खत्म कर दी ।
सीमा के मन मे विचारों का मंथन चल रहा था। सच्चाई,ईमानदारी,वफा सब के अर्थ बदल गये।
किस काम के ये सब अगर इनकी वज़ह से निखिल का इतना मानसिक उत्पीड़न हुआ कि उसने अपना जीवन समाप्त कर लिया।दो जीवन बर्बाद हो गये । भावनाओं का उतार चढ़ाव तो आता जाता रहता है ।
थोड़ी सी सच्चाई को उजागर न करके खुद उसने भी तो अपने जीवन को बिखरने से बचाया था ।क्या उसने गलत किया था? अपनी भावनाओं के उद्वेग में बहकर किसी दूसरे को और खुद को भी मानसिक यन्त्रणा देना कहाँ तक उचित है? मन तो शान्त हो ही जाता है धीरे धीरे,जरूरत है थोडे नियंत्रण की।
फिर सच झूठ, वफा,बेवफा, उचित ,अनुचित, ,बेईमानी, ईमानदारी,,,,सब की परिभाषा बदल नही गयी?
आज एक सच ने कितनी जिंदगियां बर्बाद कर दीं ।
सुधा शर्मा
मौलिक स्वरचित