एक छोटी सी ख़्वाहिश – संगीता त्रिपाठी : Moral Stories in Hindi

सुबह की भगादौड़ी के बाद सुमन ने अपने लिये एक कप चाय बना,बालकनी में रखें झूले पर आकर बैठ गई, आज मन थोड़ा उदास था, दिन भर काम में लगे रहने पर भी उसके कामों की कोई कीमत नहीं… जो घर में बैठे लैपटॉप पर काम करते, मोटी सैलरी पाते, सिर्फ उनके काम की ही कीमत है।

कल पति शरद के शर्ट का बटन टूटा हुआ मिला, बस उसकी मुसीबत आ गई, “तुमसे इतना भी नहीं होता शर्ट की बटन चेक कर लिया करो, आखिर सारे दिन तुम करती ही क्या हो..”
कपड़ों के शौक़ीन पति को कह नहीं पाई, दो -चार शर्ट होते तो वो देख लेती,..। लेकिन शर्ट के भंडार को कितना चेक करेंगी,..।

अब तो उम्र हो चली पर जिम्मेदारियाँ खत्म नहीं हुई, क्योंकि उसको छोड़ कर बाकी सब कामकाजी है,। उस दिन ही तो बहू से कुछ पूछने गई तो वो भी बिफर गई “माँ, थोड़ा देख तो लिया करिये, मेरा कॉल चल रहा है …आप बीच में आ कर डिस्टर्ब कर देती, ऑफिस के लोगों पर खराब इम्प्रैशन पड़ता है..”

बहू की बात सुन,सुमन सकते में आ गई.., कमरा बंद कर वर्क फ्रॉम होम से काम कर रही बहू की कई बार खिलखिलाहट उसने सुनी, जब दोस्तों से बात करती थी…, पर वो लैपटॉप पर काम करती है,पैसे कमाती है, और बिचारी सुमन… वो तो घर का काम करने वाली एक साधारण गृहणी है…..।

दिन भर मन अनमना रहा, शाम को तबियत ठीक नहीं थी सुमन की, बेटे से बोली “बेटा सुबह के लिये सब्जी नहीं है, पास की दुकान से ला दो,…”

“क्या माँ, आप खुद भी तो ला सकती थी, खाली ही तो रहती है…, या फिर ऑनलाइन माँगा लिया करिये, “कह कर खिसक लिया..।

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सुमन कुछ नहीं बोली.. शरद बोले,”अभी वो ऑफिस से थका -हारा आया है और तुम उससे सब्जी मंगवा रही हो,ये सब छोटे -मोटे काम तुम खुद भी कर सकती हो…,तुम्हे क्या पता, बाहर कितना काम होता है..”

अब सुमन की सहनशक्ति जवाब दे दी… “आप को पता है घर में कितना काम होता है,बिना कोई काम किये ही आप लोगों को समय पर मनपसंद नाश्ता -खाना मिल जाता, घर की सफाई हो जाती, कपड़े धोबी के पास प्रेस के लिये भेजना हो जाता, वहाँ से आने के बाद आप सबके कमरे और अलमीरा में चला जाता,

राशन, सब्जी और फल ला कर साफ कर रखना हो जाता मेहमानों की आवभगत हो जाती,समय -बेसमय मांगे चाय -कॉफी का दौर भी हो जाता… क्या कभी आपको मेरे कामों की अहमियत दिखती है,आप लोग बाहर से परेशान होकर आते, मुझे पर गुस्सा उतराते हो, आप सब का पंचिंग बैग मैं ही हूँ …

 अरे आप लोगों को तो हफ्ते में एक दिन छुट्टी का भी मिलता है, आप लोग आराम करते है, पर मेरी कौन सी छुट्टी का दिन होता है .., आप लोग घूमने -फिरने की छुट्टी ले लेते, मुझे तो कहीं आने -जाने के बाद घर आ दुगना काम करना पड़ता है…,कभी सोचा है….” हमेशा की शांत सुमन के गुस्से को देख शरद ही नहीं बेटा -बहू सब हैरान थे…गुस्से में सुमन बोल कर कमरे में जा दरवाजा बंद कर ली।

आँसू बह कर तकिया गीला कर रहे थे,. “मेरी तो छोटी सी ही ख्वाहिश है, मेरे कामों की अहमियत को घर के लोग समझें, इसमें मै गलत कहाँ हूँ…, क्या मै रुपये नहीं कमाती तो सम्मान की अधिकारी नहीं हूँ….”सुमन मन में सोचती -सोचती सो गई, सुबह नींद खुली तो शरद बेड पर नहीं दिखे घड़ी की सुईयां सात बजा रही थी,याद आया रात मे वो गुस्से में कमरा बंद कर के सो गई थी..।

सुमन ने तय कर लिया आज कोई काम नहीं करेंगी, पर रसोई से आती खटर -पटर की आवाजें.. उसे बेचैन कर दी..। रसोई में पहुँची तो आश्चर्यचकित हो गई, शरद चाय बना रहे थे, बहू रानी कप ट्रे में लगा रही थी, तभी बेटा सब्जी का थैला लेकर आया…

“देखो माँ मै सब्जियां ठीक लाया हूँ….. अब से सब्जियां मै लाया करूँगा,… सॉरी माँ..निःसंदेह एक हॉउसवाइफ सबसे ज्यादा काम करती है, उसकी कोई कीमत नहीं लग सकती, इसीलिये तो बेशकीमती है वो…, पूरे घर को संभालती है, कल से पहले हमने ध्यान ही नहीं दिया था, बिना कहे ही हमलोगो की जरूरतों का आप इतना ध्यान रखती हो, तभी तो हम सुकून से काम कर पाते है…”बेटे ने सुमन के गले में हाथ डाल कर कहा…।

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 .”सच माँ, मै भी औरत होकर भी आपके योगदान को देख नहीं पाई, आपकी वजह से ही मुझे घर का काम नहीं करना पड़ता और मैं अपने ऑफिस का काम अच्छे से कर पाती हूँ, आपके बगैर तो ये मुमकिन नहीं था, आज से मै भी आपका हाथ बटाया करुँगी., हर सैटरडे आप आराम करोगी और हम और सोहम रसोई संभालेंगे, जिससे आपको भी अपने लिये थोड़ा समय मिल सके…बड़ी वाली सॉरी माँ…”बहू ने सुमन के गले लगते हुये कहा…।

चाय का कप सुमन को थमाते शरद बोले “सॉरी सुमन…हमें पता है,तुम्हारे अनगिनत काम जिनकी कोई सीमा और समय नहीं है, जो सुबह पांच बजे से शुरु होते और रात में खत्म होते… अपने कामों में डूबे हम स्वार्थी हो गये थे…, हाँ तुम रूपया नहीं कमाती तुम रिश्ते कमाती हो .. जो रूपये से नहीं ख़रीदे जा सकते….बस इतना कहूंगा “तुम हो तो सबकुछ है “..।

सुमन भीगी आँखों संग ये बदलाव देख रही थी, आखिर उसकी ख्वाहिश पूरी हो गई, उसके कामों की कीमत परिवार ने समझ ली…।


दोस्तों, ये सत्य है घर में रहने वाली गृहणी के कार्यों की कोई कीमत नहीं समझता…, जबकि एक गृहणी घर में रह कर भी एक समय में अनेक काम करती है, जरूरत पड़ने पर अपने परिवार का हौंसला अफजाई भी करती है… फिर भी उसके कामों को वो सम्मान नहीं मिलता जो बाहर काम करने वाले पुरुष या महिला को मिलता है…। आप क्या कहते हो, अपनी राय जरूर बतायें..।


…… संगीता त्रिपाठी

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