प्रभात उठो न कितनी देर हो गई देखो न दिन चढ़ आया। बच्चों को छोड़ना है दूध लाना है,और तुम्हें ताज़ी सब्जियां खाने का शौक है तो उन्हें भी लाना है।
फिर कहीं जाके दफ्तर जा पाओगे, कहती हुई बालों में उंगली फेरती सुधा धीरे से बिल से उठी और सीधे बाथरूम में चली गई।
हां उसे पता है कि वो इतनी जल्दी उठने वाला नहीं,कभी नहाकर निकलो तो पूजाघर से तो कभी अलगनी पर टांगती कपड़े और ज्यादा हुआ तो रसोई से टिफिन बनाते बनाते भी उसे कई बार जगाना पड़ता है।
वर्षों से यही तो करती आई है,और वो भी जैसे इन्हीं अहसासों का आदी हो गया है।इसके बिना उसकी नींद ही नहीं खुलती।
संयुक्त परिवार को लेकर चलने वाले प्रभात के चेहरे पर कभी झुंझलाहट नहीं दिखी,जबकी परिस्थितियां बहुत विपरीत आई।
फिर अब तो एकल परिवार ही रह गया। बस यही बात तो सुधा को भा गई।
और वो उससे बेइंतहा प्यार करने लगी।
कभी कभी सोचती है कि कौन कहता है विवाह के बाद मोहब्बत नहीं होती। ये एक समझौता है ,अरे होती है अब उसी को ले लो। आखिर उसे हुआ न।
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उसे तो याद भी नहीं कि ब्याह के बाद कभी भी दो दिन जाके मायके रही हो।
जब भी गई साथ और आई भी साथ।
यही आपसी सामंजस्य ही तो उन दोनों को एक दूसरे को बांधे है।
नहीं ….. नहीं बांधे नहीं बल्कि प्यार के अहसासों में डूबोए है।
हां डुबोए।
सच , तभी तो कभी एक ही कमाई पर पूरा घर चलता था पर बदले वक्त के साथ इच्छाओं और जरूरतों ने उसे भी जब एकल परिवार के होते हुए भी घर से निकलने पर मजबूर किया।
तो उसने भी सहमति दे दी।
फिर क्या था, पढ़ी लिखी तो थी ही एक स्कूल में अध्यापिका के पद पर नौकरी करने लगी। जिंदगी आराम से कटने लगी।
सब कुछ अच्छा चल रहा , बच्चे भी बड़े हो गए, कहीं न कहीं वो भी कुछ न कुछ कर ही रहे।
पर ये क्या अरे टिफीन बनाते बनाते इतनी मशरूफ हो गई कि वो नहीं उठा इसका अंदाज़ा ही नहीं रहा।
भागकर वो उसे बेडरूम में जगाने गई।
अरे कितना सोते हैं उठिए देर नहीं नहीं बहुत देर हो रही।
आज तो लगता है मुझे अपने आप ही जाना पड़ेगा।
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इस पर वो उठा और बांहों में भर कर बोला।
अरे डार्लिंग मेरे रहते तुम भला आटो रिक्शा से क्यों जाओगी।
मैं हूं न , पर सुनो न आज आज मेरे पास पैसे नहीं हैं क्या कुछ दोगी क्या , इस पर वो बोली हां हां दे दूंगी पर पहले आप उठिए तो।
कहती हुई बाहों से खुद को छुड़ाती हुई किचन में चली गई।
और लगाते लगाते ये सोच रही।
हर बार वो सोचती है कि अगली तनख्वाह आएगी तो मैं ये करूंगी ,वो करूंगी।
अपने ऊपर खर्च करूंगी।पर हर बार कुछ ऐसा होता है कि सब अपनों के बीच ही खर्च हो जाता है।
वो समझ ही नहीं पा रही कि अगली तनख्वाह की प्रतिक्षा कभी खत्म होगी कि नहीं।
जिसे बाथरूम से निकल कर तौलिए से बाल सुखाते हुए पति देव ने देखा और विचारों में खोई पत्नी की मनोदशा को पढ़ लिया।
फिर उन्हें समझते देर न लगी कि वो क्या सोच रही।
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और तुरंत ही आकर बोले।सुनो न इस बार तुम्हारी तनख्वाह आए तो कुछ अपने लिए निकाल लेना हर बार सोचती हो कि कुछ अपने लिए करोगी पर खर्च की अधिकता के कारण कर नहीं पाती।
जिसे सुन परांठे पर हाथ रखी पत्नी चैतन्य मुद्रा में होते हुए बोली ।
अरे नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं सब ठीक है खर्च पूरा होना भी तो जरूरी है।
बात आई गई खत्म हुई सब अपने अपने काम पर गए।
पर पतिदेव के मन में तो उसकी सुबह वाली सूरत चढ़ी हुई है।
सो शाम को लौटा तो जितनी तनख्वाह उसे मिलती है उतना ही ला करके हथेली पर रखा और कहा लो अगली तनख्वाह का इंतज़ार तुम्हारा खत्म हुआ।
इसे अपने हिसाब से अपने ऊपर खर्च करो।कहीं और मत खर्च करना।
स्वरचित
कंचन श्रीवास्तव आरज़ू