Post View 570 बाहर बीती रातों का अधूरा चाँद गोल हो आया था । भीतर सूना एकांत फैलता जा रहा था । जो हर नये दिन बढ़ता ही जाता था । रेंगते अकेलेपन को छिटकते हुए छुटके बोला -“नींद आने से पहले भी कितना सोचना होता है न !” -“हाँ शायद” पास ही लेटी मनु … Continue reading दूसरी औरत – अनिल कान्त
Copy and paste this URL into your WordPress site to embed
Copy and paste this code into your site to embed