नयी बहू की मुँह दिखाई का कार्यक्रम चल रहा था, मधुर, ससुराल में रिश्तेदारों से घिरी हुई थी,तभी उसके मोबाईल की रिंगटोन बजी। “भाभी मोबाईल उठा लीजिए , शायद आपकी मम्मी का फोन हो।”ननद ने फोन उसके हाथ में दे दिया।”हाँ बहुरिया, बात कर लो। माँ को फिकर होगी।”ददिया सास ने मधुर के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। फोन सुधा का था। मधुर की अंतरंग सहेली “यार मैं शादी में नहीं आ पायी, पूरी तैयारी थी मेरी, पर अचानक माँ की तबियत बिगड़ गई , उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा, अब ठीक है। तू बता, ससुराल में सब अच्छे हैं न, तेरी सास, ननद, हमारे प्यारे मनोहर जी?”
“सुधा ,तुम आंटी का ख़्याल रखो, बाद में बात करते हैं।”मधुर ने धीरे से कहा और मोबाईल स्विच ऑफ़ कर दिया। वह जानती थी सुधा को लम्बी बात करने की आदत है। और यह समय नहीं है सुधा से बात करने का।
मधुर और मनोहर की मधु यामिनी,मधुर का उसकी ननदें,श्रृंगार कर रहीं,भाभियाँ सेज सजा रहीं। बहुत सुन्दर लग रही है मधुर। दमकता रंग, सोहाग भरी माँग, बेंदा,कजरारी ऑंखें, जुही मोहरे के फूलों से गुंथी बालों की केश राशि, जैसे मेनका उतर आई हो धरती पर , भाभियाँ उससे, उसके रूप और खुशबू से महकती रात को लेकर चुहलबाजी करतीं और मधुर लाज से लाल होती।
मनोहर के आते ही सब औरतें कमरे से बाहर आ गईं। जाते- जाते एक भाभी ने कंदर्प -बाँण छोड़ ही दिया “लाला, आज़ की रात चाँदनी पसरी है सेज पर, फूलों की बारात के साथ। ये रात सोने के लिए नहीं, सहेजने के लिए है। “
मनोहर मुस्करा दिया।अद्भुत,अद्वितीय यह सद्य खिले गुलाब सा रूप,सच है या सपना?कुछ पल तो मनोहर एकटक निहारता रहा उसे। मधुर ने अपनी आमंत्रित करती मुस्कान उसकी ओर बिखेर दी। ,असहनीय हो उठे दूरी के पल, अंतरंग मिलन की ज्वाला उद्दीप्त हो उठी। एक दूसरे में समा जाने को आतुर हो उठे दो बदन।दो शरीर एक प्राण होना चाहते थे, सुहाग- रात के रसपान को मात्र छटपटाहट में खोना दोनों में से एक को भी बर्दाश्त नहीं हो रहा। मनोहर ने मधुर को अपनी बाँहो में समेट लिया, मदहोश,पागलों की तरह उसके माथे, होंठ, गाल और शरीर के संवेदनात्मक अंगों पर अपने प्यार की मुहर जड़ने लगा। लेकिन उत्तेजना के असीम पल पर अवरोध कैसा —-?
यह क्या, पीड़ा के आँसुओं से भीगा मधुर का चेहरा और पसीने से तरबतर मनोहर,उसकी कुंजी अनंत सुख का ताला खोलने की अथक कोशिश के बाद भी सफल न हो पायी । हताश मनोहर ने सेज छोड़ दी,कमरे का दरवाजा खोल बाहर निकलाऔर बाहर बैठक तक पहुँचते-पहुँचते बेहोश हो गया।
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आधीरात को कोहराम मच गया घर में।
आनन फानन में डॉ को बुलाया गया। बीपी बहुत लो हो गया था मनोहर का । मेडिसिन दी गई। मनोहर ने ऑंखें खोली दो घूँट पानी पिया,फिर आँखें बंद कर ली। मनोहर की स्तिथि ऐसी नहीं थी कि कुछ बोल सके। धीरे – धीरे वह गहरी नींद में सो गया। डॉ ने सबको हिदायत दी, “कोई इनसे कुछ न पूछे। स्ट्रेस लेना मरीज के दिमाग़ को नुकसान पहुँचा सकता है। इन्हें आराम की सख्त जरूरत है।अगर कोई बात हो तो मुझे कॉल कर लीजियेगा।”
अचानक ऐसा क्या हुआ? मधुर से किसी की पूछने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। वह सुहाग सेज पर दर्द से बेहाल सिमटी सिकुड़ी भयभीत हिरणी सी, गुमसुम, उदास दीवारों को ताकती स्थिर बैठी थी। पूरा दिन ऐसे ही बीत गया। शादी में आये मेहमानों से यही कहा गया कि अधिक थकान के कारण मनोहर की तबियत बिगड़ गई, बहू भी मनोहर के स्वास्थ्य की वज़ह से परेशान है। शाम को डॉ आये, उन्होंने मनोहर का चेकअप किया सब नार्मल था, डॉ ने मनोहर से कुछ प्रश्न किये पर उनकी किसी भी बात का उसने जवाब नहीं दिया। चुप्पी साध ली मनोहर ने । डॉ ने परिवार वालों से इज़ाज़त लेकर मधुर से बात करनी चाही पर वह केवल रोती रही, एक शब्द मुँह से नहीं बोला उसने।
तक़रीबन एक हफ्ते बाद मनोहर मानसिक रूप से स्वस्थ हुआ , उस समय मनोहर ने जो डॉ को बताया, उसे जानकर परिवार स्तब्ध रह गया।फिर डॉ की सलाह पर मधुर को कुछ दिनों के लिए मायके भेज दिया गया।
मधुर, माता-पिता की इकलौती संतान,बहुत मनौतियों के बाद जन्मी, लेकिन खुशी एक तरफ रह गई जब नर्स ने बताया कि बच्चे की योनि मार्ग बंद है।
“क्या मतलब ” माँ ने घबराकर पूछा?
“मतलब यह , न यह लड़की है न लड़का।”
माँ पर तो बज्रपात सा हुआ,आँसुओं की धार बह निकली, अगर बच्चा मरा पैदा होता तो भी उन्हें इतना दुःख न होता। जब वह थोड़ा संभली तो उन्होंने बच्चे को छाती से लगा लिया, ममता की धार फूट कर बह निकली। माँ, धरती की तरह होती है, वह कटीले झाड़ भी वैसे ही पालती है जैसे फूलों की बगिया।
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जैसे-जैसे मधुर की उम्र बढ़ती गई माँ का प्रेम भी गहराता गया। बहुत इलाज़ किया गया मधुर का पर निराशा ही हाथ लगी। मधुर बहुत प्यारी दिखती, तीखे नाक नक्श, घुँघराले लम्बे बाल, मीठी आवाज़, कोमल त्वचा, ट्रांसजेंडर के लक्षण तो उसमें दिखते ही नहीं थे।
माँ- पापा के कलेजे से लगी, लाड़ प्यार से बड़ी होने लगी मधुर। माँ-पापा ने मधुर के राज की किसी को कानो कान ख़बर न होने दी। चौदह वर्ष की उम्र पर मधुर का दिखावटी नारीत्व उत्सव भी धूमधाम से मनाया। मधुर ने बायोलॉजी पढ़ी और अपने आप को समझ लिया था कि वह न ही माँ बन सकती है न ही किसी पुरुष को शारीरिक सुख दे सकती है। उसने अपना लक्ष्य साध लिया था, पढ़ लिख कर उसे अपना केरियर बनाना है, पति -बच्चा -परिवार उसके भाग्य में विधाता ने लिखा ही नहीं।
कॉलेज में उसकी मुलाक़ात मनोहर से हुई। मनोहर मधुर से सीनियर था। उसने एक बार लाइब्रेरी में मधुर को देखा, उसका शांत सौम्य चेहरा मनोहर को मोहित कर गया।किसी न किसी बहाने से वह मधुर से मिलता ।शुरू में तो मधुर ने मनोहर से मात्र मित्र भाव ही रखा लेकिन इस दिल का कोई क्या करे। हृदय की प्रेम भावनाएँ,शारीरिक कमी पर भारी पड़ गईं । उसका हृदय मनोहर की तरफ झुकने लगा।
मनोहर और मधुर के बीच एक कड़ी ने भी दोनों को जोड़ने में अपना योगदान दिया,वह थी सुधा । सुधा मधुर की शरीर-रचना के संबंध से अनभिज्ञ थी पर दोस्ती में दोनों के बीच आत्मिक अनुबंध था। कभी कभी मधुर का मन करता था कि सुधा से अपना ढका हुआ रहस्य खोल दे, पर फिर माँ की हिदायत याद आ जाती।
मधुर को उसके मायके भेज देने के बाद मनोहर का परिवार, मनोहर के दूसरे विवाह की फ़िक्र करने लगा। सभी उस पर दूसरे विवाह के साथ ही मधुर से तलाक लेने पर ज़ोर देने लगे।मनोहर ने साफ कह दिया वह मधुर को तलाक नहीं देगा न ही दूसरा विवाह करेगा। मधुर से उसने प्यार किया है और अब भी करता है। उसे याद आया कॉलेज के दिनों में उसने वेलेंटाइन डे पर मधुर को प्रपोज़ किया था। हाथ में गुलाब लेकर कहा था
“मेरी प्रियतमा, मैं तुम्हे दिलोजान से प्यार करता हूँ, अगर तुम इज़ाज़त दो तो यह गुलाब तुम्हारे बालों में लगा दूँ।”मधुर की स्वीकृति पर फूल उसके बालों में लगाकर बिना कोई भूमिका बाँधे बोला “मधुर मुझसे शादी करोगी?” मधुर एकदम चौंक गई उसने कहा – “मनु,मैं आपसे बहुत प्यार करतीं हूँ, पर विवाह मेरी किस्मत में है ही नहीं “। मेरे बहुत पूछने पर उसने कहा “मैं माँ नहीं बन सकती।”और फिर मैंने बेफिक्री से कहा ” ये कोई समस्या नहीं, मैं तुम्हें माँ बना दूँगा।हम बच्चा गोद ले लेंगे, और तुम माँ बन जाओगी मैं पापा।’
बहुत से संतानहीन लोग बच्चे अडॉप्ट करते हैं। मुझे तो मधुर चाहिए, संतान न भी हो, क्या फर्क पड़ता है। मैंने ही उसे विवाह बंधन में बाँध लिया। मधुर की केवल एक ही ग़लती रही, उसने सच तो बताया लेकिन आधा सच। अगर वह पूरा सच बताती तो क्या मैं उससे विवाह करता? शायद नहीं —शायद हाँ क्योंकि प्रेम और शरीर दोनों अलग है। प्रेम आत्मिक है शरीर भौतिक। मैं मधुर के बिना नहीं रह सकता। उसे तलाक देना, दूसरा विवाह करना, मेरी निगाह में मधुर के साथ बेवफाई है।
मधुर को दो माह हो गए मायके में रहते। लोंगो की सवालिया निगाह उठने लगी। क्या जवाब दे, झूठ की भी एक उम्र होती है। मधुर ने आगे पढ़ने का मन बना कर बी एड में एडमिशन ले लिया । पर वह रात याद आते ही, उस समय का दर्द याद आते ही पसीना शरीर से छूटने लगता। उसे पहिले ही मनोहर से पूरा सच कह देना चाहिए था। मनोहर का दोष नहीं। मैं ही भावनाओं में बह गई। मन कहाँ वश में रहता है उत्तेजनाओं का ज्वार प्रिय की बाहों में समा कर अपने वेग को रोक नहीं पाता। ओह मनोहर, काश तुम मेरे जीवन में आते ही नहीं।
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मनोहर की ज़िद के आगे परिवार ने घुटने नहीं टेके। उसके दूसरे विवाह के लिए लड़की तलाशते रहे।
उन्होंने एक मध्यम वर्गीय परिवार की साधरण रूप रंग की घरेलू लड़की निधि को पसंद कर लिया । मनोहर के साथ हुई घटना की जानकारी भी उसे और उसके परिवार को दे दी गई। अब समस्या यह कि मनोहर को कैसे राजी किया जाय ।मनोहर अपने जीजाजी का बहुत आदर करता था, यह मोर्चा उन्होंने संभाला। उसे समझाया “मनोहर, हम सब जानते है मधुर बहुत अच्छी लड़की है, उसके साथ ईश्वर ने जो किया उसका हम सभी को दुःख है। पर ज़िन्दगी एक दो दिन की बात नहीं, लम्बा सफ़र है।
यहाँ भावुकता से काम नहीं चलता व्यवहारिक होना पड़ता है। तुम्हारा मधुर के लिए आत्मिक प्रेम सराहनीय है लेकिन अपने इस शरीर की भूख का क्या कोरोगे? आज़ नहीं तो कल, कभी न कभी तो यह भूख तुम्हें व्याकुल करेगी। स्वस्थ जवान लड़के हो तुम, शरीर की स्वाभाविक भूख सताएगी तब कहाँ जाओगे?इन सबके लिए ही विवाह संस्था का समाजिक नियम बना है। तुम समझदार हो, अच्छे से विचार कर लो।
क्या तुम्हारा प्रेम इतना प्रबल है कि प्रेम के सहारे पूरी ज़िन्दगी काट लोगे, फिर माँ बाबू के लिए भी तुम्हारा कोई कर्तव्य बनता है कि नहीं?देखो निधि पारिवारिक लड़की है।तुम चाहो तो उससे बात कर अपने और मधुर के प्रेम सम्बन्ध की जानकारी उसे दे सकते हो,साथ ही मधुर से भी बात कर लो। हम लोग पूरे एक माह का तुम्हें समय दे रहे है। सोच विचार कर अपना निर्णय बताना।”
उस दिन मधुर कॉलेज नहीं गई, पापा को लेकर उसे उनका रेगुलर चेकअप करवाने हॉस्पिटल जाना था। मनोहर उनके घर पहुँचा। अचानक मनोहर को देख मधुर के मम्मी पापा और ख़ुद मधुर भी आश्चर्य में पड़ गई । लेकिन मनोहर के सामान्य व्यवहार ने स्तिथि को संभाल लिया।वह मधुर और उसके पापा के साथ हॉस्पिटल गया।उसने डॉ से पापा के स्वास्थ्य संबंधित पूरी जानकारी ली। घर लौट कर सबने एक साथ खाना खाया।
औपचारिक बातें होतीं रहीं।मधुर के मम्मी पापा के मन में अनेक दुश्चिन्ताएँ जन्म ले रहीं थीं,पर मनोहर किसी को भुलावे में नहीं रखना चाहता था।, सबके साथ बैठकर उसने अपने आने का मंतव्य बिना लाग -लपेट के बताना शुरू किया “मेरे माँ -पिता मेरा दूसरा विवाह करना चाहतें हैं। उन्होंने लड़की भी देख ली है। मैं आप लोंगो की राय जानना चाहता हूँ, लेकिन मधुर की सहमति के बिना मैं दूसरा विवाह नहीं करूँगा।”
कुछ देर तक कमरे में शांति छाई रही इस मौन को मधुर ने तोड़ा “आप दूसरा विवाह कर सकतें है।मेरी सहमति है।अगर तलाक चाहतें है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”कहते हुए उसका गला भर आया।
“नहीं,मैं तुम्हें अपने से अलग नहीं कर सकता, हम सब साथ ही रहेंगे।”मनोहर के इन शब्दों से मधुर के माँ पिता के चेहरे पर संतोष की झलक दिखने लगी।
वापिस लौटते वक़्त मनोहर के हाथों में मधुर ने एक लिफाफा लाकर रख दिया। मनोहर ने भावुक होकर, मधुर को अपनी बाहों में भर लिया। दोनों एक दूसरे से लिपट, जी भर कर रोये।
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अपने घर पहुँच मनोहर ने लिफाफा खोला। उसमें मधुर का लिखा एक पत्र और मेडिकल रिपोर्ट थी। लिखा था -प्रिय, आपकी मनोदशा को मैं बहुत अच्छे से समझ रही हूँ। पर परिस्थितिवश हम दोनों ही मजबूर हैं। आपके दूसरे विवाह से मुझे दुःख नहीं होगा यह झूठ मैं नहीं बोलूँगी। लेकिन आपका हित मेरे लिए, अपने दुःख से अधिक महत्वपूर्ण है। आपको मेरे प्यार की सौगंध है आप अपने परिवार के लोगों की बात मान लें। आपकी अपनी –मधुर
पत्र के साथ उसने एक छोटा सा नोट भी अपने हस्ताक्षर के साथ लिखकर रख दिया था।जो इस प्रकार था -मैं, श्रीमती मधुर मनोहर कुमार,अपने पति श्री मनोहर कुमार के दूसरे विवाह से मुझे कोई आपत्ति नहीं । मेरी मेडिकल रिपोर्ट संलग्न है।”
निधि बहुत सुलझी हुई लड़की थी। मनोहर ने उससे वचन लिया -“इस घर पर मधुर का उतना ही हक़ है जितना तुम्हारा। इस घर के दरवाजे और मेरा हृदय हमेशा मधुर का इंतज़ार करेंगे।तुम्हें मेरे साथ मधुर को भी स्वीकारना होगा।” निधि ने आजीवन इन वचनों का निर्वाह किया।वह अक्सर फोन पर मधुर से घर आने और साथ ही रहने का इसरार करती।
समय बीतता गया।मधुर ने बीएड के बाद प्राइवेट स्कूल में टीचर का जॉब ज्वाइन कर लिया। मनोहर दो बेटों का पिता बन चुका था। निधि और मनोहर दोनों मधुर से पूर्ववत जुड़े रहे । निधि बार-बार मधुर को साथ रहने के लिए आग्रह करती पर मधुर अपने मम्मी- पापा को, उनके बुढ़ापे और अस्वस्थता के कारण उन्हें अकेला छोड़ना नहीं चाहती थी।
वक्त कभी किसी के लिए नहीं ठहरता,वह बिना किसी की परवाह किये सदैव गतिमान रहता है।निधि दोनों बच्चों मनु और मयंक को लेकर कभी-कभी मधुर के पास आ जाती। मधुर का निष्कपट प्यार बच्चों को बाँध लेता। वे निधि को भूल मधुर से लाड़-लड़ियाते। मधुर दोनों बच्चों की बड़ी माँ बन गई।
बच्चे बड़े हुए, स्कूल और स्कूल से कॉलेज पहुँचे।कभी मधुर को बच्चों का प्यार, बच्चों के पास खींच लाता कभी निधि और बच्चे, मधुर के यहाँ पहुँच जाते। वहाँ बच्चों को बड़ी माँ के अलावा नाना-नानी के रूप में मधुर के मम्मी पापा का दुलार मिलता।संबंधों की भीनी खुशबू से साथ दोनों घर आकंठ डूबे हुए भविष्य की ओर बढ़ रहे थे।
मधुर के पापा के देहांत के एक साल बाद मम्मी भी नहीं रही। अब मधुर का अकेले रहने का कोई तर्क निधि,मनोहर और बच्चों के सामने न चला। उसे सबके साथ अपने घर लौटना पड़ा । मनु इंजिनियरिंग सैकेंड इयर और मयंक एम बी ए में पढ़ाई कर रहे थे ।मधुर और मनोहर के अपने-अपने जॉब, निधि का परिवार की देखभाल,सभी अपने कार्यक्षेत्र में संलग्न थे।एक दिन निधि की तबियत थोड़ी अस्वस्थ होने पर, मनोहर उसे डॉ को दिखाकर स्कूटर से घर लौट रहा था,तभी सड़क दुर्घटना में मनोहर की स्पॉट पर डेथ हो गयी और निधि अस्पताल पहुँचने से पहिले रास्ते में ही चल बसी।
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मधुर, दोनों बच्चों की बड़ी माँ तो थी ही अब वह उनके लिए निधि और मनोहर की कमी भी पूरी करने लगी।
बच्चों के साथ तीन रोल निभाते निभाते उसे याद नहीं कब मनु और मयंक उसे माँ कहने लगे।
कई सालों बाद आज़ सुधा, मधुर से मिलने आयी है। दोनों सहेलियों के बालों में सफेदी और चेहरे पर उम्र के साथ अनुभवों की लकीरें दिखने लगी है।कितनी बातें, कितनी यादें जमा हो गईं एक दूसरे से कहने के लिए।
बातों के बीच कभी आँखें बरसने लगतीं,कभी हँसी रुकने नाम नहीं लेती।
” माँ —मधुर को आवाज़ लगाते हुए मनु कमरे में आया और मधुर के पैर छू लिए। उसके पीछे-पीछे मयंक ने आकर खुशखबरी दी “माँ, भाई का एम.एन. सी. में केम्पस सिलेक्श हो गया।”
सुधा ने मधुर की तरफ देखते हुए आश्चर्य से कहा -“माँ —!
“हाँ सुधा। बच्चे मुझे माँ कहतें हैं।पता है,मनोहर ने मुझसे विवाह से पहिले एक बार कहा था, मधुर मैं तुम्हें माँ बना दूँगा। और देखो उसने मुझे माँ बना ही दिया,वह भी एक नहीं दो बच्चों की माँ।”
सुधा ने मधुर का हाथ अपने हाथों में लेकर मुस्कराते हुए कहा – मधुर, जब तुम आंटी के पास रहकर बीएड कर रहीं थीं, तब उन्होंने तुम्हारे बारे में मुझे सबकुछ बताया था। वे तुम्हारे लिए चिंतित हो गयीं थीं, फोन पर मुझसे अक्सर तुम्हारी बातें करतीं रहतीं।
कुछ देर तक सुधा, मधुर के हाथों को सहलाती रही फिर बोली –
“मधुर ईश्वर बहुत दयालु है अगर वह हमसे कुछ लेता है तो बदले में कई गुना देता भी है।”
समाप्त
सुनीता मिश्रा
भोपाल
VM